विश्व महिला दिवस 2026: महिला सुरक्षा से जुड़ी ये 4 अहम बातें हर किसी को जानना जरूरी
Antarrashtriya mahila diwas 2026: 08 मार्च 2026 को विश्व महिला दिवस मनाया जा रहा है लेकिन यदि हम महिला सुरक्षा की बात करें तो भले ही कितने ही कानून बन गए हों लेकिन महिलाएं आज भी भारत या विश्व में उतनी ही असुरक्षित है जितनी की किसी अन्य काल में हुआ करती थी। अब तो यह आधुनिक युग है चलिए जानते हैं कि इस युग में कहां पर महिओं को होना चाहिए सबसे ज्यादा सुरक्षित?
1. घरेलु सुरक्षा:
महिलाओं के साथ सबसे पहली हिंसा उनके घर और परिवार में ही होती रही है। बचपन में या टीनएज में उनके साथ कई तरह के शोषण हो सकते हैं। इसलिए जरूरी है महिलाओं की सुरक्षा सबसे पहले उसके घर और परिवार सुनिश्चित करेंगे। परिवार में एक महिला ही दूसरी महिला की सुरक्षा की जिम्मेदारी ले सकती है। खासकर मां और बहनों को एक दूसरे की सुरक्षा की जिम्मेरियों को समझना होगा।
2. सामाजिक सुरक्षा:
घर या परिवार में महिलाएं सुरक्षित हैं तो यह देखा गया है कि उन्हें उनका समाज आगे बढ़ने से रोकता है। सामाजिक प्रतिबंध भी एक तरह से असुरक्षा को जन्म देते हैं। जब कोई महिला सामाजिक बंधन को तोड़ती है तो उसके साथ हिंसा होने का खतरा भी बढ़ जाता है। कई ऐसे समाज है जो कि कट्टरपंथ की श्रेणी में आते हैं। सामाजिक स्तर पर सोच में बदलाव भी लाया जा सकता है पर यह लम्बी प्रक्रिया होगी जिसमे आधी सदी भी लग सकती है। जिस दिन से माताएं अपने बेटे और बेटियों की परवरिश में अंतर करना छोड़ देंगी उस दिन से सामाजिक स्तर पर सोच में बदलाव का बीज पड़ जाएगा। अधिकांश महिलाओं की बचपन से परवरिश ही इस तरह की जाती है कि उन्हें घरेलू सामंजस्य या रीति रिवाज/परिपाटी के नाम पर जिंदगी भर बस सहन करते रहना है। इस जन्म घुट्टी के साथ पली बढ़ी महिलाएं घरेलू हिंसा को भी अपनी नियति मान खामोशी से सहन करती चली जाती हैं।
3. सार्वजनिक स्थान सुरक्षा:
ऐसे कई क्षेत्र हैं जहां पर महिलाओं के साथ अभद्रता होती है। फिर चाहे वह सार्वजनिक स्थान हो, सड़क हो या कि गली चौराहे। यहां उन पर अश्लिल कमेंट करने वाले या अश्लिल नजर डालने वाले लोग होते हैं। जब किसी महिला के साथ कोई घटना घट रही होती है तो जनता मुक दर्शक बनकर देख रही होती है। ऐसे में उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी तय करना जरूरी है।
4. बाजारवाद से सुरक्षा:
बाजारवादी सोच महिलाओं को एक प्रॉडक्ट समझती है। उन्होंने महिलाओ की देह को अपने प्रॉडक्ट बचने की वस्तु बना दिया है जिसके चलते भी महिलाओं की पहचान और सुरक्षा खतरे में है। महिलाओं के माध्यम से ये कंपनियां अश्लिलता परोस रही है। बॉलीवुड की बालाओं को भी बॉलीवुड ने एक उपभोग की वस्तु बनाकर छोड़ दिया है। कुत्सित मानसिकता वाले लोगों द्वारा स्त्री आज भी महज देह ही मानी जाती है, इंसान नहीं।