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कोजागिरी पूर्णिमा व्रत पौराणिक कथा

kojagiri vrat katha
मगध का प्रकांड पंडित वलित ज्ञान में तो महान था, पर उसका भाग्य बिल्कुल कंगाली पर अड़ा था। जो बिना मांगे मिल जाए, उसी में पेट भर लेता। पर उसके सीधेपन के ठीक उलट थी उसकी पत्नी- क्लेश की साक्षात देवी!
 
दिन-रात तानें मारना उसका नियम था- "मेरी बहन सोने-चांदी से लदी घूमती है और एक तुम हो!" उसने कसम ही खा ली थी कि जब तक घर में दौलत नहीं आती, पति की हर बात का उल्टा ही करेगी। बात यहाँ तक पहुँच गई कि उसने वलित को राजकोष में चोरी करने तक को कह डाला!
 
फिर आया पितृपक्ष। घर में श्राद्ध की सामग्री तो थी, पर वलित डर रहा था कि पत्नी फिर क्लेश करेगी। तभी उसके एक चतुर दोस्त ने सलाह दी—"जब वो हर काम उल्टा ही करती है, तो तुम भी उससे वही कहो जो तुम नहीं चाहते!"
 
वलित ने पैंतरा बदला। शाम को घर पहुँचकर गंभीर होकर बोला—"सुनो! परसों मेरे पिता का श्राद्ध है। उन्होंने मेरे लिए कोई जायदाद तो छोड़ी नहीं, इसलिए तुम कोई तैयारी मत करना। और करो भी, तो नगर के दुराचारी और जुआरी ब्राह्मणों को ही बुलाना, ज्ञानी ब्राह्मणों को तो बिल्कुल नहीं!"
बस फिर क्या था! उल्टा करने की धुन में पत्नी ने तरह-तरह के पकवान बनाए और नगर के सबसे श्रेष्ठ ब्राह्मणों को बुलाकर विधि-विधान से श्राद्ध करवा दिया। लेकिन श्राद्ध के अंत में जब वलित ने कहा कि पिंडों को संभालकर रखना, तो पत्नी ने चिढ़कर सारे पिंड उठाकर सीधे शौचालय के गड्ढे में फेंक दिए!
 
वलित का हृदय टूट गया। वह उसी रात कसम खाकर घर से निकल पड़ा—"जब तक माता लक्ष्मी की कृपा नहीं मिलेगी, घर नहीं लौटूंगा!"
वह सीधे 'धर्म नदी' के तट पर जा बैठा और लगातार तीस दिनों तक घोर तपस्या में लीन रहा। वही आश्विन पूर्णिमा की पावन रात (कोजागरी) आई।
 
नदी किनारे कालीय नाग के वंश की कन्याएं माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए व्रत कर रही थीं। पूजा-पाठ के बाद नियम अनुसार जुआ खेलने की बारी आई, पर उन्हें चौथे खिलाड़ी की तलाश थी। तभी उनकी नजर तपस्वी वलित पर पड़ी। उन्होंने कहा—"हे श्रेष्ठ! आइए, हमारे साथ लक्ष्मी जी के नाम पर दांव लगाइए।"
 
जुआ शुरू हुआ। नाग कन्याओं ने तो बहुमूल्य रत्न दांव पर लगाए, पर वलित के पास क्या था? उसने पहले अपनी लंगोट लगाई, हार गया। जनेऊ लगाया, वह भी हार गया! अंत में उसने खुद को ही दांव पर लगा दिया और वह भी हार गया।
आधी रात को भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी ब्रह्मांड भ्रमण पर निकले। उन्होंने देखा कि उनका एक भक्त बिना वस्त्रों के अत्यंत निराश बैठा है। प्रभु विष्णु ने मुस्कराकर लक्ष्मी जी से कहा—"देवि! आपका व्रत करने वाले इस ब्राह्मण की ऐसी दुर्दशा? इस पर अपनी कृपा बरसाएं।"
 
माता लक्ष्मी ने वलित पर अपनी करुणा दृष्टि डाली। पलक झपकते ही उसकी सारी कंगाली गायब हो गई और उसका रूप कामदेव जैसा दिव्य और मनमोहक हो गया!
 
उसका यह रूप देखकर नाग कन्याएं मोहित हो गईं और बोलीं—"हे विप्रवर! हमने जुए में आपको जीता है, इसलिए अब आप हमारे पति हैं।" वलित ने सहर्ष उनका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। गंधर्व विवाह के बाद वह असीम धन-दौलत और अपनी नई पत्नियों के साथ वापस अपने घर लौटा।
 
घर पहुँचकर वलित ने अपनी पहली पत्नी का बड़े आदर से धन्यवाद किया—"तुम्हारे उसी उल्टे स्वभाव और तिरस्कार की वजह से आज मुझे महालक्ष्मी का आशीर्वाद मिला है।"
 
पति का यह सम्मान देखकर पत्नी का हृदय पिघल गया और वह जीवन भर के लिए उसकी आज्ञाकारी बन गई। इस तरह कोजागर व्रत के प्रभाव से वलित का जीवन सुख, समृद्धि और आनंद से भर गया।
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