Narak Chaturdashi
Sun, 8 Nov 2026

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पं. मदनमोहन मालवीय : प्रोफाइल

Pt. Madan Mohan Malviya
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रणेता महामना पंडित मदनमोहन मालवीय को 2014 में मरणोपरांत भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' दिया गया। 
जन्म और शिक्षा : मालवीयजी का जन्म 25  दिसंबर, 1861 को इलाहाबाद में हुआ था। वे भारत के पहले और अंतिम व्यक्ति थे जिन्हें 'महामना' की सम्मानजनक उपाधि से विभूषित किया गया। पत्रकारिता, वकालत, समाज सुधार, मातृभाषा तथा भारत माता की सेवा में अपना जीवन समर्पित करने वाले मालवीयजी ने राष्ट्र की सेवा के साथ ही साथ नवयुवकों के चरित्र-निर्माण के लिए और भारतीय संस्कृति की जीवंतता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना की। 
 
मालवीयजी के विचारों में राष्ट्र की उन्नति तभी संभव है, जब वहां के निवासी सुशिक्षित हों। वे जीवनभर गांवों में शिक्षा के प्रचार-प्रसार में जुटे रहे। मालवीयजी का मानना था कि व्यक्ति अपने अधिकारों को तभी भलीभांति समझ सकता है, जब वह शिक्षित हो। उनका मानना था कि संसार के जो राष्ट्र उन्नति के शिखर पर हैं, वे शिक्षा के कारण ही हैं।
 
मालवीयजी ने हिन्दी अंग्रेजी समाचार पत्र 'हिन्दुस्तान' का 1887 से संपादन करके दो ढाई साल तक जनता को जगाया। वे 1924 में दिल्ली आकर हिन्दुस्तान टाइम्स के साथ जुड़े। हिन्दी के उत्थान में मालवीयजी की भूमिका ऐतिहासिक रही है। 
 
हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रथम अधिवेशन (काशी-1910) के अध्यक्षीय अभिभाषण में हिन्दी के स्वरूप निरूपण में उन्होंने कहा कि हिंदी को फारसी-अरबी के बड़े-बड़े शब्दों से लादना जैसे बुरा है, वैसे ही अकारण संस्कृत शब्दों से गूंथना भी अच्छा नहीं है। उनकी भविष्यवाणी थी कि एक दिन हिन्दी ही देश की राष्ट्रभाषा होगी। मालवीयजी संस्कृत, हिन्दी तथा अंग्रेजी तीनों ही भाषाओं के ज्ञाता थे। वे अपने सरल स्वभाव के कारण लोगों के बीच प्रिय थे। मालवीयजी का निधन 1946 में हो गया था और वे देश को स्वतंत्र होते नहीं देख सके थे।