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BRICS Summit से भारत को क्या मिला? जानिए 10 बड़े पॉइंट्स में पूरा लेखा-जोखा

Briks summit
BRICS Summit outcomes: हाल ही में संपन्न हुए ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन में भारत ने एक बार फिर वैश्विक मंच पर अपनी मजबूत कूटनीतिक और आर्थिक स्थिति दर्ज कराई है। बहुध्रुवीय विश्व (Multipolar World) की दिशा में बढ़ते कदमों के बीच इस सम्मेलन से भारत को कई रणनीतिक, आर्थिक और कूटनीतिक फायदे हासिल हुए हैं। 'ग्लोबल साउथ' की आवाज बनने से लेकर सदस्य देशों के बीच व्यापार को सुगम बनाने तक, ब्रिक्स सम्मेलन भारत के लिए बेहद सफल साबित हुआ है। खास बात यह है कि इस आयोजन के बाद भारत को अमेरिका के 100 फीसदी टैरिफ दबाव से उभरने में भी मदद मिलेगी। आइए जानते हैं ब्रिक्स सम्मेलन में भारत को हासिल हुई 10 प्रमुख उपलब्धियां... 
  • 'ग्लोबल साउथ' के निर्विवाद नेता के रूप में मान्यता : भारत ने विकासशील और गरीब देशों (Global South) की चिंताओं को प्रमुखता से उठाया। खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा संकट और जलवायु वित्त (Climate Finance) जैसे मुद्दों पर भारत की राय सर्वसम्मति से स्वीकार की गई। इससे भारत को 'ग्लोबल साउथ' के निर्विवाद नेता के रूप में भी मान्यता मिली। 
  • स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा : सदस्य देशों के बीच राष्ट्रीय मुद्राओं (Local Currencies) में व्यापार करने की सहमति बनी। इससे भारतीय रुपए (INR) को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूती मिलेगी और डॉलर पर निर्भरता कम होगी। हालांकि इससे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को मिर्ची लग सकती है। 
  • सीमा पार भुगतान प्रणाली (Cross-Border Payments) : 'ब्रिक्स पे' (BRICS Pay) और भारत के यूपीआई (UPI) जैसे डिजिटल पेमेंट सिस्टम को आपस में जोड़ने पर प्रगति हुई, जिससे सदस्य देशों के बीच व्यापारिक लेनदेन तेज और सस्ता होगा। BRICS Pay ब्रिक्स संगठन (भारत, रूस, चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और अन्य नए सदस्य देश) द्वारा विकसित किया जा रहा एक डिजिटल सीमा-पार भुगतान प्रणाली है।
  • आतंकवाद पर कड़ा संदेश : सम्मेलन के साझा घोषणापत्र में सीमा पार आतंकवाद और आतंकवादियों की फंडिंग (Terror Financing) के खिलाफ सख्त रुख अपनाया गया, जो भारत की सुरक्षा रणनीति की एक बड़ी जीत है।
  • संयुक्त राष्ट्र (UNSC) सुधारों पर समर्थन : ब्रिक्स देशों ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में भारत जैसी उभरती शक्तियों को स्थायी सदस्यता देने और व्यापक सुधारों की आवश्यकता पर बल दिया। भारत लंबे समय से UNSC में सुधार की मांग करता रहा है। 
  • न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) से फंडिंग : ब्रिक्स बैंक (NDB) के माध्यम से भारत को इंफ्रास्ट्रक्चर (बुनियादी ढांचे), क्लीन एनर्जी और शहरी विकास से जुड़ी परियोजनाओं के लिए आसान शर्तों पर ऋण और निवेश प्राप्त होगा।
  • सप्लाई चेन (Supply Chain) को मजबूती : वैश्विक अस्थिरता के बीच ब्रिक्स देशों के साथ व्यापारिक समझौते मजबूत होने से भारत को क्रूड ऑयल, उर्वरक (Fertilizers) और आवश्यक धातुओं की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित हुई है। 
  • तकनीक और एआई (AI) सहयोग : आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), अंतरिक्ष अनुसंधान और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) के क्षेत्र में सदस्य देशों के साथ आपसी सहयोग और डेटा शेयरिंग को लेकर अहम सहमतियां बनीं।
  • द्विपक्षीय कूटनीति का मंच : सम्मेलन के इतर भारतीय नेतृत्व ने चीन, रूस और अन्य प्रमुख देशों के शीर्ष नेताओं के साथ द्विपक्षीय बातचीत की, जिससे आपसी सीमा तनाव और व्यापारिक मतभेदों को सुलझाने का अवसर मिला।
  • जलवायु परिवर्तन और सतत विकास : हरित ऊर्जा (Green Energy) और नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में निवेश बढ़ाने के लिए सहमतियां बनीं, जो भारत के 2070 तक 'नेट-जीरो' उत्सर्जन लक्ष्य को हासिल करने में मददगार होंगी।
हालांकि ब्रिक्स सम्मेलन के बाद भारत पर अमेरिकी दबाव कम होगा या बढ़ेगा, इसका जवाब एक शब्द में हां या ना में नहीं दिया जा सकता। यह एक बेहद जटिल कूटनीतिक स्थिति है, जहां कुछ मोर्चों पर भारत को राहत मिल सकती है, जबकि कुछ विषयों पर अमेरिकी दबाव और बढ़ सकता है। दरअसल, अमेरिकी प्रशासन (विशेष रूप से ट्रंप प्रशासन) ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि ब्रिक्स देश डॉलर को हटाकर अपनी नई करेंसी लाते हैं या डॉलर पर निर्भरता कम करते हैं, तो उन पर 100% तक का टैरिफ लगाया जा सकता है। हालांकि भारत ने ब्रिक्स करेंसी के विचार का समर्थन नहीं किया है, फिर भी स्थानीय मुद्राओं (रुपया-रूबल या रुपया-दिरहम) में व्यापार को बढ़ावा देने पर अमेरिका की नजर बनी रहेगी। हालांकि फिलहाल ट्रंप के लिए सबसे बड़ी चिंता नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनाव हैं। 
 
दूसरी ओर, ब्रिक्स के मंच पर भारत का रूस के साथ रणनीतिक और आर्थिक सहयोग (जैसे सस्ता क्रूड ऑयल खरीदना) जारी रहना अमेरिका को रास नहीं आता। रूस पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बीच भारत का यह कदम अमेरिकी विदेश नीति के लिए एक चुनौती बना रहता है। अमेरिका और भारत के बीच व्यापार घाटे और टैरिफ नीतियों को लेकर मतभेद लंबे समय से हैं। अमेरिका अपने घरेलू उद्योगों को बचाने के लिए भारत के आयात पर अतिरिक्त शुल्क का दबाव बनाए रख सकता है। हालांकि इसमें कोई संदेह नहीं कि ब्रिक्स में जो फैसले हुए हैं, उससे ट्रंप पर दबाव जरूर रहेगा।
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