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कागज से नहीं, भ्रांतियों से बचने की आवश्यकता है

राष्ट्रीय कागज़ दिवस 31 जुलाई पर विशेष

National Paper Day
-गगन गुप्ता
National Paper Day: प्रतिवर्ष 1 अगस्त को राष्ट्रीय कागज़ दिवस मनाया जाता है। यह दिवस केवल कागज़ उद्योग या व्यापार से जुड़े लोगों का नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का है, क्योंकि कागज़ हमारे ज्ञान, शिक्षा, संस्कृति और सभ्यता का आधार है।
 
आज जब पर्यावरण संरक्षण पूरी दुनिया की सबसे बड़ी चिंता बन चुका है, तब कागज़ को लेकर अनेक भ्रांतियां भी तेजी से फैल रही हैं। सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि कागज़ का अधिक उपयोग करने से जंगल समाप्त हो रहे हैं, जबकि वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है।
 
भारत में बनने वाले कागज़ का लगभग 75 प्रतिशत पुनर्चक्रित (रद्दी) कागज़, 10 प्रतिशत कृषि अवशेषों (जैसे गन्ने की खोई, गेहूं एवं धान की भूसी) तथा केवल 15 प्रतिशत विशेष रूप से लगाए गए पेड़ों (Plantation Wood) की लकड़ी से तैयार किया जाता है। यह लकड़ी प्राकृतिक या सरकारी वनों से नहीं, बल्कि किसानों द्वारा उगाए गए वृक्षों और सामाजिक वानिकी (Social & Farm Forestry) के माध्यम से प्राप्त होती है। यही कारण है कि कागज़ उद्योग देश में वृक्षारोपण को बढ़ावा देने, किसानों की आय बढ़ाने तथा हरित आवरण के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
 
दूसरी ओर, सार्वजनिक वनों से काटे जाने वाले अधिकांश पेड़ों का उपयोग इमारती लकड़ी, फर्नीचर और निर्माण कार्यों में होता है। इसलिए यदि पर्यावरण संरक्षण की बात की जाए, तो हमारा ध्यान उन क्षेत्रों पर अधिक होना चाहिए जहां प्राकृतिक वनों पर वास्तविक दबाव पड़ता है।
 
कागज़ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह 100 प्रतिशत पुनर्चक्रण योग्य (Recyclable) और जैव-अवक्रमणीय (Biodegradable) है। उपयोग के बाद इसे बार-बार पुनः कागज़ में बदला जा सकता है। यही कारण है कि विकसित देशों में भी कागज़ के पुनर्चक्रण और जिम्मेदारीपूर्ण उपयोग को बढ़ावा दिया जाता है।
 
शिक्षा, न्याय व्यवस्था, बैंकिंग, चिकित्सा, प्रशासन, शोध, साहित्य, धार्मिक ग्रंथ, संविधान, अभिलेख, मानचित्र और करोड़ों विद्यार्थियों की पढ़ाई इन सभी का आधार आज भी कागज़ है। डिजिटल तकनीक ने जीवन को आसान बनाया है, लेकिन ज्ञान के स्थायी संरक्षण और विश्वसनीय दस्तावेज़ीकरण में कागज़ की भूमिका आज भी अपरिवर्तनीय है।
 
कागज़ का विवेकपूर्ण उपयोग पर्यावरण के विरुद्ध नहीं, बल्कि उसके पक्ष में है। जितनी अधिक मांग होगी, उतना ही अधिक नियोजित वृक्षारोपण होगा, किसानों को अतिरिक्त आय मिलेगी और हरित क्षेत्र का विस्तार होगा। इसलिए आवश्यकता कागज का बहिष्कार करने की नहीं, बल्कि "कम करें, पुनः उपयोग करें और पुनर्चक्रण करें" की भावना को अपनाने की है।
 
इन्हीं तथ्यों को समाज तक पहुंचाने के उद्देश्य से इंदौर पेपर ट्रेडर्स एसोसिएशन पिछले कई वर्षों से विद्यालयों में जागरूकता सेमिनार, चित्रकला प्रतियोगिताएं, वृक्षारोपण अभियान, सोशल मीडिया के माध्यम से जन-जागरूकता तथा विभिन्न सामाजिक गतिविधियों का आयोजन करता आ रहा है।
 
राष्ट्रीय कागज दिवस पर आइए, हम सभी यह संकल्प लें कि कागज़ का विवेकपूर्ण उपयोग करेंगे, अधिक से अधिक पुनर्चक्रण को अपनाएंगे और वृक्षारोपण को बढ़ावा देंगे। पर्यावरण संरक्षण का वास्तविक मार्ग कागज़ का बहिष्कार नहीं, बल्कि वैज्ञानिक सोच, जिम्मेदार उपयोग और अधिक से अधिक हरित आवरण के निर्माण से होकर गुजरता है।
 
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम भ्रांतियों के स्थान पर तथ्यों को स्वीकार करें। कागज़ पेड़ों को समाप्त नहीं करता, बल्कि नियोजित वृक्षारोपण को प्रोत्साहित करता है। जितना अधिक कागज़ पुनर्चक्रित होगा और जितनी अधिक उसकी जिम्मेदारीपूर्ण खपत होगी, उतना ही अधिक वृक्षारोपण, किसानों की आय, हरित आवरण और पर्यावरण संरक्षण को बल मिलेगा।
 
आइए, इस राष्ट्रीय कागज़ दिवस पर यह संदेश जन-जन तक पहुंचाएं- "पेड़ काटकर नहीं, पेड़ लगाकर कागज़ बनता है।" "कागज़ का जिम्मेदारीपूर्ण उपयोग ही हरित, समृद्ध और सतत भविष्य की मजबूत नींव है।"
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