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80s retro look trend : 80 के दशक के रेट्रो लुक से स्मृति और नॉस्टेल्जिया तक

retro look
यह बात मान लेनी चाहिए कि हम अपने अतीत से कितना स्नेह रखते हैं। हम वहाँ सुखद अनुभूति करते हैं, सुरक्षित महसूस करते हैं। अतीत हमारे वर्तमान की ख़ाली जगहों को भरता है। वह बार-बार याद आता है, बावजूद इसके कि हमें सिखाया गया है कि भविष्य की योजनाएँ बनानी चाहिए और उसी पर फ़ोकस करना चाहिए।

लेकिन अतीत में लौटना, यादों में जीना या नॉस्टेल्जिक होना कई मर्तबा यह भी बताता है कि जिस भविष्य को हम अपने लिए गढ़ रहे हैं, उसमें कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ है। यदि भविष्य हमें उतना ही आश्वस्त करता, तो शायद हम उसकी तरफ़ लौटते। मगर हम बार-बार पीछे जाते हैं। क्यों?

स्मृति और अतीत मनुष्य के जीवन का केंद्रीय आयाम हैं। नॉस्टेल्जिया महज़ ‘स्मृति-मोह’ नहीं है। यह आत्म-चेतना को टटोलने की एक प्रक्रिया है—समय के दो आयामों के बीच खड़े होकर यह देखने की कि हम कहाँ से कहाँ आ गए!

हम धीरे-धीरे एक सरल और सुंदर समय से निकलकर एक कठिन और भयावह दौर में प्रवेश करते हैं। शायद पीछे लौटना उसी यात्रा को एक बार फिर देखने की कोशिश है।

अतीत और भविष्य में एक बुनियादी फ़र्क़ है। अतीत में हमारे पास दृश्य हैं, आवाजें हैं, गंध हैं, चेहरे हैं। हमारे पास उसके साक्ष्य हैं। हम उसके साक्षी हैं। भविष्य के पास इसके बरअक्स सिर्फ़ अनुमान हैं—योजनाएँ हैं, आशंकाएँ हैं, उम्मीदें हैं। अतीत घट चुका है, भविष्य अभी घटा ही नहीं है। इसलिए अतीत निश्चित है और भविष्य काल्पनिक।

यह भी सच है कि कई लोगों के लिए अतीत एक बोझ रहा होगा। कुछ लोग अपनी स्मृतियों का वज़्न उठाकर भविष्य की ओर बढ़ते हैं। लेकिन यही स्मृतियाँ उन्हें यह समझने की क्षमता भी देती हैं कि आने वाले संकट से कैसे निपटना है। अतीत केवल बोझ नहीं है, वह अनुभव भी है।

हम अपने वर्तमान में अकेले नहीं होते। हम अपने पुरखों के देखे हुए सपनों के भोक्ता भी होते हैं। भविष्य के लिए उन्होंने जो किया, उसका फल हमें मिलता है और उसका भुगतान भी हमें ही करना पड़ता है। हमारे वर्तमान में बहुत सारा अतीत जमा होता है। इसलिए मैं अतीत को जीवन के लिए एक सहूलत मानता हूँ।

हम अतीत और उसकी स्मृतियों की मदद से अपनी दुनिया को टटोलते हैं। हमारा अतीत ही हमें सबसे बेहतर तरीक़े से बताता है कि हम वास्तव में कौन हैं। अगर हम अपनी स्मृतियों में लौटना छोड़ दें तो शायद यह सिर्फ़ अतीत को छोड़ना नहीं होगा, यह अपनी पहचान का एक हिस्सा खो देना होगा।

यह बात उस आदमी से पूछिए जिसने अपनी याददाश्त खो दी है। उसके लिए परिचित दृश्य और आवाज़ें अचानक अजनबी हो जाती हैं। दुनिया वही रहती है, लेकिन उसके भीतर उससे जुड़ने वाला आदमी बदल जाता है।

निर्मल वर्मा ने इसी अर्थ में पूछा था कि एक मनुष्य के भीतर से उसका सारा अतीत और स्मृतियाँ निकाल दी जाएँ तो उसके पास क्या बचेगा, जिसे वह दिखा सके?

स्मृति हमारे जीवन का नैसर्गिक अंग है। हम मनुष्य हैं तो याद करेंगे। लेकिन यहीं भारतीय दर्शन एक विचित्र विरोधाभास खड़ा करता है। हमारे संतों, योगियों और मनीषियों ने कहा कि अपने संचित विचारों और स्मृतियों से मुक्त होना ही मुक्ति है। तो क्या हम अपनी स्मृतियों से मुक्त होना चाहते हैं या अपने उस ‘मैं’ से, जो स्मृतियों से बना है? क्या विचार और जीवन एक ही चीज़ हैं? क्या स्मृति से मुक्ति वास्तव में जीवन से मुक्ति है?

इन सवालों का कोई आसान जवाब नहीं है। क्योंकि यादें जानलेवा भी हैं और पोषक भी। वे हमें वर्तमान के संकट और भविष्य के भय से कुछ देर के लिए बाहर निकालती हैं। वे एक exit gate हैं—जहाँ से हम थोड़ी देर पीछे जा सकते हैं और फिर आगे की ओर देख सकते हैं। शायद इसीलिए हमें पत्रों से प्रेम है। गंध से प्रेम है। पुराने गीतों से प्रेम है। तस्वीरों से प्रेम है। उन फ़िल्मों से प्रेम है जिन्हें हम बार-बार देखते हैं। उन स्वरों और दृश्यों से प्रेम है जो अब हमारे जीवन में नहीं हैं। हमें उन चीज़ों से प्रेम है जो खो चुकी हैं और उन चीजों से भी जो खो रही हैं।

अगर अतीत इतना ही ख़राब होता तो हम बार-बार उसकी तरफ़ लौटते क्यों? क्यों अपनी पुरानी तस्वीरें देखते? क्यों किसी पुराने गीत को सुनते ही किसी बीते हुए समय में पहुँच जाते? क्यों कोई गंध अचानक वर्षों पुराना दृश्य हमारे सामने ला खड़ा करती है? क्योंकि शायद अतीत में हम सिर्फ़ समय को नहीं खोजते। हम अपने उस रूप को खोजते हैं जो अब कहीं नहीं है।

मैंने अब तक कोई कविता ऐसी नहीं लिखी जिसमें भविष्य का ज़िक्र हो। मेरी सारी कविताएँ स्मृतियों से उपजी हैं। कोई समय रहा होगा जिसे मैं याद करता हूँ। उस समय में कोई शख़्स रहा होगा, जिसे मैंने प्रेम किया होगा या जिससे घृणा की होगी। कविता शायद उसी समय में लौटने का एक रास्ता है। यह सिर्फ़ व्यक्तिगत स्मृति नहीं है। इसका एक सामूहिक रूप भी है।

साल 2026 में हम तस्वीरों के जरिए 1980 के दशक में क्यों लौटना चाहते हैं? 80 के दशक की पॉप-संस्कृति—बड़े हेयरस्टाइल, नियॉन-ब्राइट और वार्म कलर्स, एनालॉग टेक्सचर, बेलबॉटम, रंग-बिरंगी बुशर्ट और मोटे फ़्रेम का चश्मा—हमें आज भी क्यों लुभाते हैं? जिस चीज को उसके समय में देखकर हमें थोड़ी शर्म आती थी, आज उसी को हम स्टाइल और सौंदर्य की तरह क्यों वापस ला रहे हैं? और जब हमारे पास भविष्य की अनंत तकनीकी संभावनाएँ हैं, तब हम एआई को रेट्रो ट्रेंड के प्रॉम्प्ट देकर बार-बार 80 के दशक में क्यों भेज रहे हैं? शायद इसलिए कि तकनीक हमें भविष्य दे सकती है, लेकिन स्मृति हमें वह दुनिया देती है जिसमें हम कभी रह चुके हैं।

भविष्य में संभावनाएँ हैं। अतीत में प्रमाण हैं।

शायद इसी वजह से मनुष्य वहाँ होता ही नहीं है, जहाँ वह है। उसका शरीर वर्तमान में होता है, लेकिन उसका मन एक साथ कई समयों में रहता है। वह उस जगह भी रहता है जहाँ कभी रहा था।

दरअस्ल, हम मनुष्य अपने अतीत के निशान हैं—गुज़र चुके जीवन के अवशेष। अतीत हमें वहाँ दुबारा पहुँचने की मोहलत देता है, जहाँ हम कभी जी चुके हैं। वह जगह भले ही लौटकर न मिले, लेकिन उसकी स्मृति मिल जाती है। भविष्य के पास ऐसा कोई आश्वासन नहीं।

भविष्य एक संभावना है। अतीत एक अनुभव।

मनुष्य शायद हमेशा उस चीज़ की तरफ़ अधिक आश्वस्त होकर लौटता है, जिसके बारे में वह कह सकता है—हाँ, मैं वहाँ था। भविष्य के बारे में हम कितना भी सोच लें, उसकी अंतिम निश्चितता शायद सिर्फ़ इतनी है—हम बूढ़े होंगे और एक दिन मर जाएँगे।
लेखक के बारे में
नवीन रांगियाल
नवीन रांगियाल DAVV Indore से जर्नलिज्‍म में मास्‍टर हैं। वे इंदौर, भोपाल, मुंबई, नागपुर और देवास आदि शहरों में दैनिक भास्‍कर, नईदुनिया, लोकमत और प्रजातंत्र जैसे राष्‍ट्रीय अखबारों में काम कर चुके हैं। करीब 15 साल प्रिंट मीडिया में काम करते हुए उन्‍हें फिल्‍ड रिपोर्टिंग का अच्‍छा-खासा अनुभव है। उन्‍होंने अखबार.... और पढ़ें
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