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खमेनेई के बाद ईरान: कितनी बदल जाएगी मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था

Mojtaba Khamenei
शबनम फॉन हाइन
ईरान के नए सर्वोच्च नेता मुज्तबा खमेनेई को एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था विरासत में मिली है जिसे उनके पिता ने दशकों की कड़ी मेहनत से बिल्कुल अपने सांचे में ढाला और तैयार किया था। ALSO READ: जर्मनी में गर्मी की वजह से इस साल 5,100 लोगों की मौत
 
इस्लामी गणराज्य ईरान एक नए राजनीतिक युग में प्रवेश कर रहा है। गुरुवार को ईरानी लोग मारे गए अपने पूर्व सर्वोच्च नेता अयातोल्लाह अली खमेनेई को उत्तर-पूर्वी ईरान में स्थित उनके गृहनगर मशहद में सुपुर्द-ए-खाक करने की तैयारियों में जुटे थे।
 
खमेनेई के अंतिम संस्कार के कार्यक्रम में दुनिया भर के लोग आए। ईरान के करोड़ों लोग सड़कों पर उतर कर श्रद्धांजलि देने निकले, लेकिन उनके बेटे और उत्तराधिकारी मुज्तबा खमेनेई अभी भी लोगों की नजरों से दूर हैं। 28 फरवरी को ईरान युद्ध की शुरुआत में हुए अमेरिकी हवाई हमले में उनके पिता की मौत हो गई थी और वे खुद भी उस हमले में बुरी तरह घायल हो गए थे, जिससे उनका चेहरा बिगड़ गया था। मुज्तबा खमेनेई 1979 की क्रांति के बाद इस्लामिक गणराज्य के तीसरे सर्वोच्च नेता बने हैं। हालांकि, अपने पिता के लिए आयोजित आधिकारिक शोक समारोहों में वे कहीं भी दिखाई नहीं दिए।
 
ईरान में हुआ यह सत्ता परिवर्तन सिर्फ सरकार के शीर्ष स्तर पर किसी एक नेता के बदलने भर का मामला नहीं है। असल में, यह उस बड़े और गहरे संस्थागत बदलाव का नतीजा है जो अली खमेनेई के लगभग चालीस साल के शासनकाल के दौरान धीरे-धीरे पूरे सिस्टम में किया गया था।
 
राजनीतिक विश्लेषक रजा तालेबी ने कहा कि खमेनेई ने धीरे-धीरे इस्लामी गणराज्य (ईरान) के पूरे पावर स्ट्रक्चर यानी सत्ता के ढांचे को ही बदल कर रख दिया। उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, "अयातोल्लाह रुहोल्लाह खौमेनी ने 1979 की क्रांति के बाद एक ऐसा सिस्टम बनाया था जो पूरी तरह से क्रांति की साख और उनकी अपनी व्यक्तिगत धाक पर टिका था। उनके उलट, अली खमेनेई ने सत्ता संभालते ही बहुत ही सोची-समझी योजना के साथ उस पूरे सिस्टम का ढांचा अंदर से बदलना शुरू कर दिया था।”
 
तालेबी आगे बताते हैं, "पिछले 37 सालों में, मुख्य राजनीतिक फैसलों पर बड़े धर्मगुरुओं और शिया मदरसों का असर लगातार कम हुआ है। इसकी जगह, देश की सुरक्षा से जुड़ी संस्थाओं, सर्वोच्च नेता के दफ्तर और उससे जुड़े राजनैतिक व सैन्य नेटवर्क का दबदबा पूरे सिस्टम पर बहुत तेजी से बढ़ गया है।” ALSO READ: मिस्र के रेगिस्तान में मिला सैंकड़ों साल पुराना शहर
 

राष्ट्रपति की भूमिका कम होती नजर आई

इस बड़े बदलाव ने ईरान की चुनी हुई संस्थाओं की भूमिका को भी पूरी तरह बदल दिया है। तालेबी का मानना है कि अब वहां के राष्ट्रपति चुनाव धीरे-धीरे महज ऐसे मुकाबले बनकर रह गए हैं, जो पहले से तय दायरे ‘पॉलिटिकल फ्रेमवर्क' के भीतर ही लड़े जाते हैं।
 
तालेबी ने कहा, "भले ही अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं के राष्ट्रपति अपनी घरेलू प्राथमिकताओं, मसलन देश के अंदर के छोटे-मोटे मुद्दों पर अपने हिसाब से काम करने में कामयाब रहे, लेकिन जब बात विदेशी मामलों, परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय विवादों जैसे बड़े रणनीतिक फैसलों की आई, तो उनके हाथ पूरी तरह बंधे हुए थे और उनके पास फैसले लेने की बहुत कम आजादी थी।”
 
ध्यान देने वाली बात यह है कि अली खमेनेई के लिए रखे गए छह दिनों के राजकीय शोक के कार्यक्रमों में, इस्लामी गणराज्य के तीन पूर्व जीवित राष्ट्रपतियों हसन रूहानी, महमूद अहमदीनेजाद और मोहम्मद खातमी में से कोई भी सत्ता के बाकी बड़े नेताओं के साथ कहीं नजर नहीं आए। इसके बजाय, आधिकारिक तस्वीरों में पूरा ध्यान सुरक्षा तंत्र के प्रतिनिधियों, खासतौर पर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) के कमांडरों और मौजूदा राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान पर ही रहा।
 
आम तौर पर यह माना जाता है कि पेजेश्कियान और मुज्तबा खमेनेई के बीच करीबी कामकाजी संबंध रहे हैं। उन्होंने ईरान युद्ध को खत्म करने के मकसद से हुई बातचीत और समझौतों में अहम भूमिका निभाई थी। यह संघर्ष 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिका और इस्राएल के हमलों के साथ शुरू हुआ था और करीब छह हफ्ते बाद एक कमजोर युद्धविराम के साथ खत्म हुआ। इसके बाद कूटनीतिक बातचीत का रास्ता खुला, जिसे आखिरकार मुज्तबा खमेनेई ने भी अपनी मंजूरी दे दी।
 
इससे पहले, सरकारी मीडिया की ओर से जारी उनके एक बयान के मुताबिक, वह ‘सैद्धांतिक रूप से' बिल्कुल अलग सोच रखते थे। बयान में कहा गया है कि वह (मुज्तबा खमेनेई) इस बातचीत के लिए तब तैयार हुए, जब सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के चेयरमैन के तौर पर राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने उन्हें यह भरोसा दिलाया कि वह "ईरानी जनता के हक और एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस के हितों की रक्षा करेंगे।” ALSO READ: फ्रांस की धुर दक्षिणपंथी नेता की सजा घटी लेकिन चुनौतियां नहीं
 

आईआरजीसी का बढ़ा मनोबल

राष्ट्रपति पेजेश्कियान के साथ-साथ, आईआरजीसी के पूर्व कमांडर और पार्लियामेंट के मौजूदा स्पीकर मोहम्मद बाघेर कलीबाफ ने भी अमेरिका के साथ बातचीत में अहम भूमिका निभाई है। 14 जून, 2026 को, अमेरिका और ईरान बड़े समझौते पर बातचीत के आधार के तौर पर बनाए गए एक ड्राफ्ट मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (एमओयू) पर सहमत हुए।
 
हालांकि, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में हालिया तनाव बढ़ने के बाद, अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने तेहरान के साथ बातचीत के भविष्य पर संदेह जताया है। साथ ही, अपने अगले कदमों के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी है।
 
ईरान की विदेश और सुरक्षा नीति के जानकार हामिदरेजा अजीजी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स' पर लिखा, "ईरान, समझौते (एमओयू) की धारा-5 का मतलब यह निकाल रहा है कि 'इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान जरूरी इंतजाम करेगा' वाक्यांश का सीधा सा अर्थ यह है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को दोबारा खोलने के लिए सारी शर्तें तय करने और व्यवस्था बनाने का हक सिर्फ ईरान के पास है।”
 
ईरान, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर अपने नियंत्रण को सबसे बड़ा रणनीतिक मोहरा यानी मोल-भाव का जरिया मानता है। इसलिए, तेहरान यह सुनिश्चित करना चाहता है कि उसकी मंजूरी के बिना कोई भी दूसरा वैकल्पिक समुद्री रास्ता न बने। जैसे, ओमान के समुद्री इलाके से गुजरने वाले रास्ते, जिनमें अमेरिका या कोई अंतरराष्ट्रीय संगठन शामिल हो।
 
अमेरिका के साथ बढ़ते टकराव में आईआरजीसी ने निर्णायक भूमिका निभाई है। फ्रांस में रहने वाली और उभरते हुए राजनीतिक व सामाजिक आंदोलनों की विशेषज्ञ शोधकर्ता मुज्तबा नजफी के मुताबिक, अमेरिका, इस्राएल और ईरान के बीच हुए इस युद्ध ने एक राजनीतिक और सामाजिक ताकत के रूप में आईआरजीसी के आत्मविश्वास को बहुत ज्यादा बढ़ा दिया है। ALSO READ: ब्रिटेन का शाही परिवार कहां से और कैसे धन कमाता है
 

क्या सत्ता के लिए अंदरूनी लड़ाई जारी है?

इस संकट का मतलब यह नहीं है कि नरमपंथी गुटों का रसूख बढ़ गया है, जिसमें 2015 में परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले पूर्व राष्ट्रपति हसन रूहानी के समर्थक भी शामिल हैं।
 
नजफी ने डीडब्ल्यू को बताया, "इस बात की पूरी संभावना है कि आने वाले समय में हमें रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के अंदर ही सत्ता के लिए आपसी लड़ाई देखने को मिले। ईरान का भविष्य आगे किस दिशा में जाएगा, यह काफी हद तक इसी बात के इर्द-गिर्द तय होगा।”
 
उनके आकलन के मुताबिक, ईरान की मौजूदा सत्ता को अभी ऐसा कोई कारण नहीं दिखता कि वह अपने समूह से बाहर के उदार नेताओं के सामने झुके या उन्हें बड़ी छूट दे।
 
यह देखना अभी बाकी है कि क्या इस्लामी गणराज्य का मजबूत और पुराना सत्ताधारी गुट मुज्तबा खमेनेई के पीछे खड़ा होगा और उन्हें देश को एक नई दिशा देने देगा या फिर गंभीर रूप से घायल बताए जा रहे मुज्तबा खुद इन्हीं सत्ता केंद्रों के हाथों की कठपुतली बनकर रह जाएंगे।
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