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Wed, 5 Aug 2026

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संवत्सरी पर्व पर 'मिच्छामी दुक्कड़म' कहकर मांगेंगे क्षमा...

Samvatsari : Micchami Dukkadam
क्षमा, अहिंसा और मैत्री का पर्व संवत्सरी
 

 
संवत्सरी पर्व पर जैन धर्मावलंबी जाने-अनजाने हुई गलतियों के लिए एक-दूसरे से क्षमा मांगते हैं। क्षमा, अहिंसा और मैत्री का पर्व है संवत्सरी। गौरतलब है कि जैन धर्म के श्वेतांबर पंथ में पर्युषण पर्व संपन्न हुए हैं और क्षमावाणी दिवस मनाया जा रहा है। 
 
जैन धर्म की परंपरा के अनुसार पर्युषण पर्व के अंतिम दिन क्षमावाणी दिवस पर सभी एक-दूसरे से 'मिच्छामी दुक्कड़म' कहकर क्षमा मांगते हैं, साथ ही यह भी कहा जाता है कि मैंने मन, वचन, काया से जाने-अनजाने आपका दिल दुखाया हो तो मैं हाथ जोड़कर आपसे क्षमा मांगता हूं।
 
जैन धर्म के अनुसार 'मिच्छामी' का भाव क्षमा करने और 'दुक्कड़म' का अर्थ गलतियों से है अर्थात मेरे द्वारा जाने-अनजाने में की गईं गलतियों के लिए मुझे क्षमा कीजिए। 
 
आचार्य महाश्रमण के अनुसार- क्षमापना से चित्त में अह्लाद का भाव पैदा होता है और आह्लाद भावयुक्त व्यक्ति मैत्री भाव उत्पन्न कर लेता है और मैत्री भाव प्राप्त होने पर व्यक्ति भाव विशुद्धि कर निर्भय हो जाता है। जीवन में अनेक व्यक्तियों से सम्पर्क होता है तो कटुता भी वर्ष भर के दौरान आ सकती है। व्यक्ति को कटुता आने पर उसे तुरंत ही मन में साफ कर देनी चाहिए और संवत्सरी पर अवश्य ही साफ कर लेना चाहिए।
 
'मिच्छामी दुक्कड़म' प्राकृत भाषा का शब्द है। प्राकृत भाषा में काफी जैन ग्रंथों की रचना ही हुई है। पर्युषण महापर्व जैन धर्मावलंबियों में आत्मशुद्धि का पर्व है। इस तरह पर्युषण पर्व आत्मशुद्धि के साथ मनोमालिन्य दूर करने का सुअवसर प्रदान करने वाला महापर्व है।   
 
इस दौरान लोग पूजा-अर्चना, आरती, समागम, त्याग-तपस्या, उपवास आदि में अधिक से अधिक समय व्यतीत करते हैं। पर्युषण पर्व के आखिरी दिन 'मिच्छामी दुक्कड़म' कहने की परंपरा है। इसमें हर छोटे-बड़े से 'मिच्छामी दुक्कड़म' कहकर क्षमा मांगते हैं। इस पर्व का आखिरी दिन क्षमावाणी दिवस के रूप में मनाया जाता है जिसमें हर किसी से 'मिच्छामी दुक्कड़म' कहकर क्षमा मांगते हैं। 

 
 
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