कभी इंडियन प्रीमियर लीग के कारण बॉलीवुड के निर्माता फिल्में रीलीज नहीं करते थे और इस सत्र हाल यह है कि इंडियन प्रीमियर लीग खुद अपने दर्शकों को ढूंढ रहा है। शुरुआत से ही IPL 2026 सत्र में वह मजा नहीं था लेकिन इसको प्रमाणित करने वाले आंकड़े मौजूद नहीं थे। अब आंकड़ो ने भी साफ साफ बता दिया है कि इंडियन प्रीमियर लीग की लोकप्रियता 25 फीसदी घट चुकी है।
इस साल दर्शकों की संख्या 25 फीसदी कम रही यह आंकड़ा तो कल सोशल मीडिया पर सबके सामने आ गया लेकिन इसके पीछे कुछ प्रमुख कारण यह रहे -
1) महेंद्र सिंह धोनी की अनुपस्थिति- पूरे सत्र में खेल प्रेमी थाला का इंतजार करते रह गए। सीएसके ने इस सत्र में अपने पूर्व कप्तान के बिना 11मैच खेले हैं। फ्लेमिंग ने कहा कि शुरू में उम्मीद थी कि धोनी कुछ हफ्तों में ठीक हो जाएंगे लेकिन पिंडली की चोट के बढ़ने के कारण ज्यादा सावधानी से रिहैबिलिटेशन प्रक्रिया अपनानी पड़ी। उस पर अभ्यास मैच के दौरान पिंडली में फिर से चोट लग गई। ऐसे में यह तय हो गया कि वह पूरे सत्र से बाहर हो गए। 2008 से यह पहला सत्र है जिसमें महेंद्र सिंह धोनी किसी एक भी मैच में मैदान पर नहीं उतरेंगे। अब चेन्नई के सिर्फ 3 मैच बाकी है और मैदान पर उनके उतरने की संभावना नग्णय है।
2) इम्पैक्ट प्लेयर नियम के कारण मैचों में हुआ रोमांच कम- IPL के इतिहास में बहुत ज़्यादा पीछे जाने का कोई फ़ायदा नहीं है; तब यह खेल बिल्कुल अलग तरह का था। लेकिन Impact Player नियम लागू होने से पहले के तीन सालों और उसके बाद के तीन सालों के आंकड़ों की तुलना करें, तो ये आंकड़े एक सार्थक तस्वीर पेश करते हैं। 2020 और 2022 के बीच, 39.7 प्रतिशत मैचों का फ़ैसला आखिरी ओवर में हुआ। मौजूदा दौर में, यह आंकड़ा 32.5 प्रतिशत है। यानी लगभग सात प्रतिशत अंक कम। अब लक्ष्य का पीछा करने वाली टीमें आखिरी ओवर से काफी पहले ही, ज़्यादा निर्णायक तरीके से मैच जीतती या हारती हैं। और यह निर्णायकता तब सबसे ज़्यादा साफ़ दिखती है, जब टीमों के सामने 200 से ज़्यादा रनों का लक्ष्य होता है।
आंकड़े एक दिलचस्प कहानी बताते हैं। 2021 में, 45 प्रतिशत आईपीएल मैचों का नतीजा आखिरी ओवर तक तय नहीं हो पाया था।2024 में यही आंकड़ा 28.6 प्रतिशत था। 2025 में, 29 प्रतिशत और 2026 में अब तक, यह 30.6 प्रतिशत है।
3) बल्लेबाज गेंदबाज पर बुरी तरह हावी, 225 स्कोर भी सुरक्षित नहीं- गेंदबाज ने क्रिकेट को हाशिए पर धकेल दिया है। यह तो हम कई बार सुनते हैं लेकिन इस सत्र में यह खुलकर सामने आया है। सनराइजर्स हैदराबाद के कोच मुथैया मुरलीधरन ने कहा कि पिच इतने फ्लैट है कि मुझे भी आराम से छक्के पड़ते। कई कोचिंग स्टाफ ने मुखर होकर कहा कि गेंदबाज को रखना ही क्यों है बॉलिंग मशीन ही एक छोर पर रख दो।
ज़रा सोचिए कि बड़े लक्ष्यों का पीछा करने के मामले में क्या बदलाव आया है। 2020-22 के दौर में, टीमों के सामने 200-219 रनों के 21 लक्ष्य आए। उनमें से उन्होंने सिर्फ़ तीन मैच जीते – यानी जीत का औसत 14.3 प्रतिशत रहा। 2023 से अब तक, उनके सामने ऐसे 60 लक्ष्य आए और उन्होंने 22 मैच जीते; यानी जीत का औसत 36.7 प्रतिशत रहा। यह आंकड़ा दोगुने से भी ज़्यादा है।
220 से ज़्यादा रनों के लक्ष्य वाले मैचों की संख्या में तो और भी बड़ा उछाल आया है: 2020-22 के दौर में ऐसे सिर्फ़ 8 मैच हुए थे, जबकि उसके बाद के तीन सालों में यह संख्या बढ़कर 45 हो गई। अप्रैल महीने में ही सनराइज़र्स हैदराबाद ने वानखेड़े स्टेडियम में मुंबई इंडियंस के 243 रनों के लक्ष्य को 19वें ओवर में ही हासिल कर लिया। इस सीजन में 200 से ज़्यादा रनों का लक्ष्य सफलतापूर्वक हासिल करने का यह 10वां मौका था; इस तरह, उन्होंने 2025 के पूरे सीजन के रिकॉर्ड को तोड़ दिया।इस सत्र में ही 21 बार 200 से ज्यादा के लक्ष्य का पीछा हो चुका है और अभी प्लऑफ खेलने बाकी है।
4) बैंगलूरू और टीम इंडिया की जीत:- पिछले साल रॉयल चैलेंजर्स बैंगलूरू की जीत हुई जिन्होंने 18 साल बाद इंडियन प्रीमयर लीग के खिताब को हाथ लगाया। ऐसा लगा कि यह किसी फिल्म का क्लाइमैक्स था। इसके बाद भारतीय टीम ने 8 मार्च को टी-20 विश्वकप पर कब्जा जमाया। यह तय हो गया कि भारत इस फॉर्मेट में सर्वश्रेष्ठ है और कोई दूसरी टीम आस पास भी नहीं है। ऐसे में दर्शकों के लिए कुछ और देखना बाकी ही नहीं रहा।
5) 10 टीमों के कारण बोझिल हुआ टूर्नामेंट - सोशल मीडिया पर फैंस की मानें तो 10 टीमों का टूर्नामेंट काफी बोझिल हो गया है। साल 2022 में शामिल हुई गुजरात और लखनऊ जैसी टीमें अब तक अपना फैन बेस नहीं बना पाई है। सुनने में यह आ रहा है कि अगला सत्र 94 मैचों का होगा। ऐसे में दर्शकों की बोरियत होना लाजमी है।
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