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फ्रांस में हिंसक छात्र प्रदर्शन, हर तीन में से एक स्कूल प्रभावित

France Protest
France student protests: भारत में छात्रों की तिलचट्टा (कॉक्रोच) पार्टी के उग्र प्रदर्शनों पर यूरोप में जो लोग तालियां पीट रहे थे, मोदी सरकार को बुरा-भला कह रहे थे, वे अब फ्रांस के स्कूली छात्रों के हिंसक प्रदर्शनों से सन्नाटे में आ गए हैं। वहां लगभग 2,000 गिरफ्तारियां हो चुकी हैं। हालत भारत में हुए प्रदर्शनों से कहीं अधिक व्यापक और गंभीर है।
 
फ्रांस के स्कूलों में लगभग एक सप्ताह से हो रहे विरोध-प्रदर्शन बेकाबू होते जा रहे हैं। प्रदर्शनों का हिंसक होते जाना एक राजनीतिक मुद्दा बन गया है, जिसके कारण राष्ट्रपति इमानुएल माक्रों की सरकार भारी दबाव में है।
 
फ्रांस के स्कूली छात्रों का विरोध-प्रदर्शन अब विश्वविद्यालयों तक भी फैल गया है। जब से विरोध-प्रदर्शन शुरू हुए हैं, सुरक्षा बलों ने लगभग 2000 लोगों को गिरफ्तार किया है। शुक्रवार, 2 अक्टूबर को करीब 400 स्कूल बंद रहे। एक दिन पहले, छात्रों के विरोध-प्रदर्शनों को लेकर एक तीखी बहस छिड़ गई कि इस उग्र आंदोलन के पीछे कहीं वामपंथी लोकलुभावन पार्टी "ला फ्रांस इंसौमिस" (La France Insoumise LFI) का हाथ तो नहीं है।
 
सरकार ने इस दावे के समर्थन में खुफिया रिपोर्टों का हवाला दिया, जबकि LFI ने इस आरोप को खारिज कर दिया। गृह मंत्रालय के अनुसार, उस दिन शाम तक 1,949 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका था और 305 पुलिस अधिकारी व जेंदार्मां (विशेष पुलिस बल) घायल हो गए थे।

सुरक्षा बलों को बनाया बारूदी आतिशबाज़ी का निशाना

गृह मंत्री लोरांद न्युइनेस ने इस "बेकाबू हिंसा" की निंदा की। उन्होंने कहा कि स्थिति बिगड़ गई थी और "इसका छात्रों की मांगें सही तरीके से पेश करने से कोई लेना-देना नहीं था।" उन्होंने कहा कि सुरक्षा बलों को आतिशबाजी का निशाना बनाया गया, सरकारी इमारतों में आग लगा दी गई और दुकानों में लूटपाट की गई।
 
गृह मंत्रालय के अनुसार, गुरुवार 1 अक्टूबर को देश के लगभग 3,700 सेकेंडरी स्कूलों में से 1,027 स्कूल विरोध-प्रदर्शनों से प्रभावित हुए—यानी लगभग हर तीन में से एक स्कूल। 222 स्कूलों के रास्ते रोके गए। फ्रांस का हर विभाग इन विरोध प्रदर्शनों से प्रभावित हुआ। शिक्षकों की कमी, खचाखच भरी कक्षाएं, जर्जर इमारतें: फ्रांस के स्कूलों में सुविधाओं की भारी कमी है। परिणामस्वरूप, विरोध-प्रदर्शन बढ़ रहे हैं। 300 से ज़्यादा संस्थान इन प्रदर्शनों से प्रभावित हुए हैं।

गुप्तचर एजेंसियां : यह एक "सुनियोजित चाल" है

गुप्तचर एजेंसियों का उल्लेख करते हुए, प्रधानमंत्री सेबास्तियें लेकोर्न्यु (Sébastien Lecornu) के कार्यालय ने इस विरोध आंदोलन को "LFI और उसके घोर-वामपंथी सहयोगियों की एक सुनियोजित चाल" बताया। LFI के संयोजक मानुएल बांपार्द ने इस दावे को ठुकरा दिया और इसे "स्कूलों की अस्वीकार्य हालात के जवाब में शुरू हुआ स्वतःस्फूर्त विरोध आंदोलन" बताया। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि वह किसी "साज़िश थ्योरी का सहारा न ले।"
 
वामपंथी LFI पार्टी के नेता जाँ-ल्यूक मेलेंशों ने सरकार पर "दमन" का आरोप लगाया और कहा कि उनकी पार्टी ने "अहिंसक तरीके से संघर्ष" करने का आह्वान किया था। दैनिक समाचार पत्र "ले फ़िगारो" (Le Figaro) के लिए किए गए एक सर्वे में, 62 प्रतिशत लोगों ने छात्रों के विरोध प्रदर्शनों को सही ठहराया। वहीं, 61 प्रतिशत लोगों का कहना था कि LFI पार्टी इसमें शामिल होकर अपनी भूमिका का विस्तार कर रही है।

देश भर में हिंसक विरोध प्रदर्शन

पूरे देश में हिंसा भड़क उठी : पश्चिमी फ्रांस में एक स्कूल का प्रवेश हॉल जल गया, जबकि मार्से (दक्षिणी फ्रांस) में कई बसों और एक अग्निशमन वाहन को आग के हवाले कर दिया गया। लिल, ब्रेस्त और स्त्रासबुर्ग में स्कूलों के बाहर कूड़ेदानों में आग लगा दी गई। पेरिस में दो स्कूलों के दरवाज़ों को जला दिया गया और ग्रेटर पेरिस इलाके के 55 स्कूलों में हिंसा की घटनाएं हुईं। ल्यों शहर के 10 स्कूलों में पटाखे फोड़ने और कचरे के डिब्बों में आग लगाने जैसी घटनाएं हुईं।
 
पेरिस के उपनगर साँ-देनिस और अन्य जगहों पर प्रदर्शनकारी छात्रों की पुलिस के साथ हिंसक झड़पें हुईं। कई जगहों पर स्कूलों के प्राध्यापकों के साथ मौखिक या शारीरिक मारपीट की गई। अधिकारियों ने स्त्रासबुर्ग और मार्से में कुछ समय के लिए ट्राम सेवाएं रोक दीं।

प्रदर्शनों का कारण

एक हफ़्ते पहले शुरू हुए इन उग्र विरोध प्रदर्शनों का कारण स्कूलों की जर्जर इमारतें, शिक्षकों की भारी कमी, ज़रूरी सामानों का अभाव और पढ़ाई के दिनों में देर शाम तक चलने वाले लंबे स्कूली दिन बताए गए। इसके पीछे की राजनीति को लेकर आम असंतोष और निराशा की भावना है, खासकर सामाजिक रूप से फ्रांस के पिछड़े इलाकों में। 1 अक्टूबर को विश्वविद्यालय छात्र भी इस आंदोलन में शामिल हो गए और उन्होंने करीब 30 विश्वविद्यालय कैंपसों में काम-धाम जाम कर दिया। एक शिकायत यह भी है कि फ़्रांसीसी सरकार शिक्षा बजट की तुलना में अपने भारी कर्ज़ का ब्याज चुकाने पर कहीं अधिक पैसा खर्च करती है। फ्रांस भारी कर्ज में डूबा हुआ देश है।

वामपंथी नेता जाम किए गए स्कूलों में पहुंचे

फ्रांस के छात्रों का विरोध प्रदर्शन जल्द ही एक राजनीतिक प्रसंग बन गया। वामपंथी LFI पार्टी के कई नेता उन स्कूलों में पहुंचे जिन्हें ब्लॉक किया गया था। प्रधानमंत्री लेकोर्न्यु ने 1 अक्टूबर को ही वामपंथी LFI नेताओं पर "गैर-ज़िम्मेदाराना तरीके से तनाव बढ़ाने" का आरोप लगाया था। शिक्षा मंत्रालय के अनुसार, विरोध प्रदर्शन शुरू होने के बाद से 119 छात्र, शिक्षक और निरीक्षक स्टाफ़ के सदस्य घायल हुए हैं।
 
फ़्रांस के प्रधानमंत्री लेकोर्न्यु का लक्ष्य भारी राष्ट्रीय कर्ज़ के कारण सरकारी ख़र्च में 56 अरब यूरो की कटौती करना है; ऊंची ब्याज-दरें सरकार के वित्तीय लचीलेपन को बहुत सीमित कर रही हैं। शिक्षा मंत्री जेफ़्रे ने सुधार का वादा किया है, जबकि छात्रों के प्रतिनिधि विरोध प्रदर्शन जारी रखना चाहते हैं।

पूरे फ्रांस में विरोध-प्रदर्शन और हिंसा

पूरे फ्रांस के स्कूलों में छात्रों का विरोध-प्रदर्शन जारी है और साथ ही हिंसा भी जारी है। पूर्वी फ्रांस के शहर बेलफ़ोर्ट में एक पुलिस अफ़सर पर बेरहमी से हमला किया गया। गृह मंत्री लोरांद न्युइनेस ने बताया कि यह हत्या का प्रयास भी हो सकता है, इसलिए इस मामले की जांच चल रही है। 2 अक्टूबर तक के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, कम से कम 300 सुरक्षाकर्मी, 170 युवा और स्कूली स्टाफों के 65 सदस्य घायल हुए थे।
 
न्याय मंत्री जेराल्द दर्मानिन ने RTL रेडियो को बताया कि विरोध प्रदर्शन अब सार्वजनिक व्यवस्था का मुद्दा बन गया है। इस अशांति में एक "सक्रिय और हिंसक अल्पसंख्यक" समूह शामिल था। कुछ मामलों में, यह साफ़ नहीं था कि शामिल लोग छात्र थे भी या नहीं। "जब लोग बसों पर हमला करते हैं और स्कूलों में आग लगाते हैं, तो यह सिर्फ़ विरोध-प्रदर्शन नहीं रह जाता।" न्याय मंत्री ने यह भी मांग की कि बच्चों द्वारा किए गए नुकसान के लिए उनके माता-पिता को ज़िम्मेदार ठहराया जाए।
 
फ्रांस के न्याय मंत्री का यह सुझाव एक ऐसा सुझाव है, जिसे यदि भारत में अपनाया जाए, तो तैं है कि स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक के छात्र ही नहीं, उनके माता-पिता भी सड़कों पर उतर जाएंगे। 
लेखक के बारे में
राम यादव
राम यादव डायचे वेले हिन्दी (जर्मनी) के पूर्व प्रमुख हैं। देश-विदेश की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक घटनाक्रम पर इनकी अच्छी पकड़ है। आधी सदी से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता एवं लेखन के क्षेत्र में सक्रिय हैं। .... और पढ़ें
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