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Written By WD Feature Desk
Last Updated : बुधवार, 5 नवंबर 2025 (15:04 IST)

कवि दिनकर सोनवलकर की यादें

Dinkar Sonwalkar
- प्रस्तुति: सीमा पुराणिक, पुणे
 
यादों के गलियारे से…
 
आज यादों के गलियारों से गुजरते हुए अनेक बातें, किस्से आंखे नम कर गए साथ ही जिंदगी के दिए अनमोल पलों के लिए पलकें झुक कर कृतज्ञता व्यक्त करती महसूस हुईं। ऐसी ही अनमोल, अविस्मरणीय यादों में एक महत्वपूर्ण और दिल के करीब रहने वाली याद है 'सोनवलकर काका' की याद।

प्रसिद्ध कवि दिनकर सोनवलकर,  हां हम उन्हें 'काका' ही संबोधित करते थे और जब उनसे परिचय हुआ तब तो उस भोली, नादान उम्र को 'कवि' शब्द का अर्थ भी नहीं मालूम था। कुछ आठ-नौ बरस की उम्र रही होगी, जब उस परिवार से परिचय हुआ और जल्द ही यह परिचय अपनेपन और स्नेह के मजबूत बंधन में बदल गया जो आज भी बरकरार है।
 
जितना सहज, सरल स्वभाव काका का उतना ही मिलनसार और मृदुभाषी व्यक्तित्व मावशी का (श्रीमती सोनवलकर)। इसी कारण बहुत जल्दी यह दंपत्ती जावरा जैसे छोटे कस्बे में लोकप्रिय हो गए और हम मराठी भाषी परिवारों में आदर, और कुतुहल मिश्रित चर्चा का विषय भी बने।
 
कुछ ही वर्षों में जावरा के प्रत्येक कार्यक्रम में उनकी उपस्थिति जैसे अनिवार्य हो गई। हिंदी, मराठी, अमीर, गरीब हर कोई उनके साथ अपनापन महसूस करता था। शकर मिल के मालिक तोदीजी हों या बड़े व्यवसायी नाहटाजी, सांसद हो या विधायक, डॉक्टर हो या इंजीनियर, कलेक्टर हो या तहसीलदार, ऑफिसर हो या बाबू, अरदली हो या चायवाला, मोची हो या तांगेवाला हर किसी के साथ उनका मित्रता का संबंध था। 
 
हमेशा वे सभी की मदद करने को तत्पर रहते थे। हर स्तर के लोगों के साथ काका इस तरह घुल-मिल गए थे कि हर एक व्यक्ति अपने अत्यंत निजी या पारिवारिक कार्यक्रम में भी उन्हें शामिल करना चाहता था और वे भी बिना किसी भेदभाव के शामिल होते थे, होने की पूरी कोशिश किया करते थे।
 
कहते थे,
है
इतनी सी अभिलाषा
बस मेरी कि
जीवन में अर्थ
मिले ना मिले
जीवन को अर्थ मिले।
 
मेरे पिता के कार्यालयीन स्थानां‍तरण के कारण 1974 से 1980 के बीच उनसे यदा-कदा ही मिलना हो पाता था फिर भी आत्मीयता में कोई कमी नहीं आई थी। शायद इसीलिए 1981 में जब फिर से हम जावरा आ गए तो घनिष्ठता गहरी होती गई। इस समय तक काका कितनी बड़ी हस्ती हैं ये हम अच्छी तरह समझने लगे थे। लेकिन उन्होंने कभी अपने व्यवहार से महसूस नहीं होने दिया बल्कि अब ज्यादा खुलकर सभी विषयों पर वे बातचित करते थे। 
 
देश के तमाम अखबारों में छाए रहने वाले सोनवलकर काका लोगों के दिलों पर भी छाए रहते थे। 81 से 84 मेरे विवाह होने तक मुझे सोनवलकर परिवार का सानिध्य प्राप्त हुआ। उन दिनों उनके साथ जावरा, रतलाम में आयोजित लगभग हर कवि सम्मेलन को पहली पंक्ति में बैठकर सुनने का सौभाग्य मिला। 
 
उनके घर आने वाले करीब करीब सभी कविवर्यों से परिचय, बातचीत के अवसर प्राप्त हुए। प्रसिद्ध व्यंग्यकार शरद जोशी जी, बालकवि बैरागीजी, शैल चतुर्वेदी जी, प्रभा ठाकुर जी, माया गोविंद जी इन सबके साथ बैठकर चाय जलपान का आनंद लिया है। 
 
उन्होंने दर्शन शास्त्र केवल पढ़ा या पढ़ाया नहीं बल्कि जिया। शायद इसीलिए वे इतने सहज, सरल और जमीन से जुड़े हुए थे। शासकीय आवास में रहते हुए उनकी सादगी अपने आप में एक मिसाल थी। किसी भी सामान्य सी मुलाकात को उनकी आत्मीयता और सहजता एक यादगार पल में बदल देती थी। 
 
अक्सर शाम को जब कभी हम सपरिवार उनके घर जाते तो कुछ देर इधर उधर की बातें करते करते अचानक अपना हारमोनियम निकालते और सबको प्रेम भरे आग्रह से गवाते और खुद भी बहुत ही तन्मयता से मुकेश के गीत सुनाते। हमारी वह बैठक एक संगीत की महफ़िल बन जाती थी। 
 
गीत गाने के साथ उन्हें पुराने अर्थपूर्ण गीत और ग़ज़लें सुनने का भी बहुत शौक था। उन दिनों 'ग़ुलाम अली' भारत में लोकप्रिय नाम थे। काका के पास 'रिकार्ड प्लेयर' था, तो वे ग़ुलाम अली जी के साथ साथ 'मेहंदी हसन' की भी कुछ रिकार्ड ले आए। फिर हमें सपरिवार बुलाया और बड़े आनंद से ग़ज़लें सुनाई।

ग़ज़लों में मेरी रुचि को देखकर उन्होंने मुझे प्लेयर पर रिकॉर्ड लगाना सिखाया और कहा 'जब तुम्हारा जी चाहे तब आओ और जो चाहो वो सुनो' इस खुली छूट ने मुझे जो आनंद दिया वो मेरे जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है। और एक बात कि मुझे छूट देकर छोड़ नहीं दिया।

दो चार दिनों में जैसे ही मुलाकात होती उनका पहला प्रश्न होता था 'क्या क्या सुना? और क्या समझा?' ग़ुलाम अली तो फिर भी समझ आ जाते थे लेकिन मेंहदी हसन जी की ग़ज़लें उर्दू शब्दों की अधिकता के कारण ठीक से समझ नहीं आती थी। 
 
उन्हें जब यह परेशानी बताई तो महत प्रयासों से एक 'उर्दू से हिंदी' शब्दकोश लेकर आए और एक डायरी और पेन साथ में रखकर मुझे कड़ा आदेश दिया कि 'जो शब्द समझ में ना आए उसे इस शब्दकोश में खोजो और इस डायरी में लिखकर रखो। यदि एक शब्द भी छूटा तो कभी तुमसे बात नहीं करूंगा।' अपनी तमाम व्यस्तताओं के
बावजूद वे उस डायरी को पढ़ते और उर्दू भाषा की गहराई, अदब और मिठास को समझकर हम बच्चों को भी समझाते। 
 
इतना प्यार, इतना अपनापन मिला उस पूरे परिवार से की अपने भाग्य पर गर्व करने को जी चाहता है। उनके दोनों बच्चे भी ताई ही कहकर पुकारते हैं आज भी। उफ़ याद ही नहीं रहता कि प्रतीक अब हमारे बीच नहीं है।
 
संवेदनशील इतने की किसी ने अपनी परेशानी, दुःख साझा किया तो सब कुछ भूलकर उसकी सहायता में लग जाते। आर्थिक तंगी की बात हो तो उस क्षण उनकी जेब में जितना कुछ हो सब दे देते थे। उनके बारे में याद करती हूं तो फिल्म आशीर्वाद के जोगी ठाकुर की याद आती है। वैसे ही हर उम्र, हर स्तर के लोगों के साथ समरस हो जाने वाले व्यक्ति थे सोनवलकर काका। ऐसी अनगिनत यादें हैं।
'क्या भूलूं, क्या याद करूं'
ऐसी स्थिति में है मन।
काका के ही शब्दों में कहूं, तो..
देखते देखते
सात साल बीत गये जावरा में
मालवा के एक कस्बे में
वक्त ने
उम्र के कीमती सात साल छीन लिए
लेकिन दे गया बदले में
तुजुर्बा एहसासों की बेशकीमती दौलत
कैसे कैसे वरदान मिले।
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