क्या दर्शकों ने थिएटर जाना छोड़ दिया है? फिल्मों को नहीं मिल पा रही है ओपनिंग, छोटी फिल्मों की खाली सीटें इंडस्ट्री के लिए खतरे की घंटी
एक समय था जब शुक्रवार आते ही सिनेमाघरों के बाहर भीड़ दिखाई देती थी। नई फिल्म रिलीज होना अपने आप में एक उत्सव जैसा होता था। दर्शकों के बीच उत्सुकता रहती थी कि पहला शो कौन देखेगा, पहले दिन कितना कलेक्शन होगा और कौन-सा डायलॉग हिट बनेगा। लेकिन अब तस्वीर तेजी से बदल चुकी है। हाल ही में रिलीज हुई चांद मेरा दिल और उससे पहले आई पति पत्नी और वो 2 की कमजोर ओपनिंग ने एक बार फिर बॉलीवुड के सामने खड़े उस बड़े संकट को उजागर कर दिया है, जिसकी चर्चा पिछले कुछ वर्षों से लगातार हो रही है।
इन फिल्मों को न तो वैसी शुरुआती भीड़ मिली और न ही बॉक्स ऑफिस पर वह ऊर्जा दिखी जो कभी मध्यम बजट फिल्मों की पहचान हुआ करती थी। सवाल सिर्फ इन दो फिल्मों का नहीं है, बल्कि पूरे हिंदी फिल्म उद्योग के बदलते समीकरण का है। आखिर ऐसा क्या हुआ कि अब कई फिल्में पहले वीकेंड में ही बॉक्स ऑफिस की दौड़ से बाहर हो जाती हैं?
दर्शक अब इंतजार करना सीख गए हैं
आज का दर्शक पहले जैसा अधीर नहीं रहा। उसे पता है कि कोई भी फिल्म अब कुछ ही हफ्तों में OTT प्लेटफॉर्म पर आ जाएगी। यही वजह है कि लोग अब हर फिल्म के लिए थिएटर जाने को जरूरी नहीं मानते। अगर फिल्म में बहुत बड़े सितारे हों, जबरदस्त विजुअल स्केल हो या रिलीज से पहले बेहद शानदार रिपोर्ट्स आ रही हों, तभी दर्शक टिकट खरीदने को तैयार होता है। बाकी फिल्मों के लिए अब आम दर्शक का रवैया बदल चुका है। वह सोचता है “दो महीने रुक जाते हैं, घर पर आराम से देख लेंगे।” यह सोच धीरे-धीरे बॉलीवुड की सबसे बड़ी चुनौती बनती जा रही है। खासतौर पर उन फिल्मों के लिए जिनका बजट मध्यम होता है और जो सिर्फ कंटेंट के भरोसे दर्शकों तक पहुंचना चाहती हैं।
OTT ने बदल दी फिल्मों की किस्मत
कोविड के बाद OTT प्लेटफॉर्म्स ने भारतीय दर्शकों की आदत पूरी तरह बदल दी। पहले सिनेमाघर मनोरंजन का सबसे बड़ा माध्यम हुआ करता था, लेकिन अब मोबाइल स्क्रीन पर दुनिया भर का कंटेंट उपलब्ध है। दर्शक के पास अब विकल्पों की भरमार है। कोरियन ड्रामा से लेकर हॉलीवुड सीरीज और क्षेत्रीय सिनेमा तक सब कुछ एक क्लिक पर मौजूद है। ऐसे में हिंदी फिल्मों को सिर्फ स्टारकास्ट या गानों के भरोसे दर्शकों को थिएटर तक खींचना मुश्किल हो गया है। चांद मेरा दिल और पति पत्नी और वो 2 जैसी फिल्मों के साथ यही समस्या दिखाई देती है। फिल्मों के बारे में दर्शकों के बीच वह “मस्ट वॉच” भावना पैदा नहीं हो सकी, जो थिएटर तक पहुंचने के लिए जरूरी होती है।
सोशल मीडिया ने बढ़ा दिया है जोखिम
पहले किसी फिल्म की असली परीक्षा सोमवार से मानी जाती थी, लेकिन अब फैसला पहले शो के बाद ही होने लगता है। सोशल मीडिया पर कुछ घंटों में फिल्म का माहौल बन भी जाता है और बिगड़ भी जाता है। अगर शुरुआती दर्शकों की प्रतिक्रिया कमजोर रही तो बाकी लोग टिकट खरीदने से बचते हैं। यही वजह है कि कई फिल्में पहले वीकेंड में ही दम तोड़ देती हैं। बॉक्स ऑफिस अब सिर्फ फिल्म की गुणवत्ता पर नहीं, बल्कि उसकी सोशल मीडिया “वाइब” पर भी निर्भर हो गया है।
क्या सिर्फ बड़े सितारों का दौर रह गया है?
आज के दौर में शाहरुख खान, सलमान खान, रणबीर कपूर या बड़े पैन इंडिया प्रोजेक्ट्स जैसी फिल्मों को शुरुआती भीड़ मिल जाती है क्योंकि वे एक “इवेंट” की तरह पेश की जाती हैं। लेकिन मध्यम या छोटे स्तर की फिल्मों के लिए थिएटर तक दर्शक लाना बेहद कठिन हो चुका है। यही वजह है कि निर्माता अब सुरक्षित फार्मूलों की तरफ भाग रहे हैं, सीक्वल, फ्रेंचाइजी और बड़े स्टार्स। जोखिम लेने वाली या अलग विषयों पर बनी फिल्में धीरे-धीरे सीमित होती जा रही हैं।
बॉलीवुड के लिए खतरे की घंटी
चांद मेरा दिल और पति पत्नी और वो 2 की कमजोर शुरुआत सिर्फ दो फिल्मों की नाकामी नहीं है। यह उस बदलते दौर की कहानी है जिसमें सिनेमाघर अब सिर्फ “स्पेशल एक्सपीरियंस” बनकर रह गए हैं। अगर फिल्म दर्शकों को यह महसूस नहीं करा पाती कि उसे बड़े पर्दे पर देखना जरूरी है, तो वह आसानी से OTT की प्रतीक्षा सूची में चली जाती है। यही बॉलीवुड की सबसे बड़ी चिंता है और शायद आने वाले समय की सबसे बड़ी सच्चाई भी।
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