कोरोना वायरस : दक्षिण कोरिया ने जो किया वो दुनिया के लिए मिसाल

BBC Hindi| Last Updated: रविवार, 29 मार्च 2020 (21:35 IST)
लौरा बिकर (बीबीसी न्यूज़, सोल)

दक्षिण कोरिया की राजधानी सोल के एक हॉस्पिटल के पीछे कार पार्किंग से अपनी कार को बाहर निकालते समय 45 साल की रशेल किम शीशा नीचे करती हैं और फिर अपनी जीभ को बाहर निकालती हैं। वो पिछले हफ़्ते डैगु गई थीं। डैगु दक्षिण कोरिया का वो इलाक़ा है जो की चपेट में था।
वहां से लौटने के बाद से ही रशेल को खांसी आ रही है और बुख़ार भी है। चूंकि मौजूदा समय में दुनिया भर में कोरोना वायरस का संक्रमण फैला हुआ है तो उन्हें भी इस आशंका ने घेर लिया कि कहीं वो संक्रमित तो नहीं हो गई हैं।
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उन्होंने फ़ैसला किया कि वो अपना टेस्ट करवाएंगी ताकि उनका डर स्पष्ट हो जाए। दक्षिण कोरिया में दर्जनों ऐसे केंद्र बनाए गए हैं जहां आप गाड़ी में बैठे-बैठे टेस्ट करा सकते हैं। इन केंद्रों पर सिर से लेकर पैर तक सफ़ेद सुरक्षात्मक कपड़े पहने खड़े रहते हैं। उनके हाथों में उम्दा दस्ताने होते हैं, आंखों पर चश्मे और मुंह पर सर्जिकल मास्क।
सेंटर पर खड़े इन दोनों में से एक शख़्स रशेल को एक स्वैब स्टिक (जांच में इस्तेमाल होने वाला उपकरण) देता है। रशेल उसे अपने मुंह में अंदर की तरफ़ ले जाती हैं और फिर एक टेस्ट-ट्यूब में सुरक्षित रखते हुए उसे जांच के लिए खड़े दूसरे शख़्स को सौंप देती हैं।

इसके बाद एक मुश्किल जांच...

एक दूसरा स्वैब वो नाक के अंदर ले जाती हैं। ये थोड़ा तक़लीफ़देह है, क्योंकि उनकी आंखों में पानी आ जाता है। लेकिन ये सारी प्रक्रिया एक से डेढ़ मिनट में पूरी हो जाती है।
इसके बाद वो अपनी कार का शीशा ऊपर चढ़ाती हैं और ड्राइव करते हुए पार्किंग एरिया से निकल जाती हैं। अगर उनकी जांच का नतीजा पॉज़ीटिव रहा तो उन्हें कॉल करके इसके बारे में सूचित किया जाएगा। अगर नतीजा निगेटिव रहा तो सिर्फ़ एक मेसेज।
निगेटिव प्रेशर रूम
दक्षिण कोरिया में हर रोज़ क़रीब 20 हज़ार लोगों की जांच की जा रही है। टेस्ट किए जाने का ये आंकड़ा दुनिया के किसी भी दूसरे देश से कहीं अधिक है। रशेल के पार्किंग से निकलने के कुछ वक़्त बाद ही उनका सैंपल पास के लैब में भेज दिया गया। दक्षिण कोरिया में कोरोना वायरस टेस्ट के लिए बनाए गए ये लैब्स 24x7 काम कर रहे हैं।

कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण को देखते हुए इस तरह के कई लैब तैयार किए गए हैं जो फ्रंट-लाइन पर इस महामारी को मात देने का काम कर रही हैं। दक्षिण कोरिया ने कोरोना वायरस टेस्ट के लिए 96 पब्लिक और प्राइवेट लैब का निर्माण किया है।
स्वास्थ्य अधिकारियों का मानना है कि इस तरह से लोगों की ज़िंदगियां बचायी जा सकती हैं। दक्षिण कोरिया में कोरोना वायरस से मौत की दर 0.7 फ़ीसदी है। अगर वैश्विक स्तर पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर जारी की गई दर की बात करें तो यह 3.4 फ़ीसदी है। लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि स्थिति इससे कहीं अधिक ख़राब है, क्योंकि हर केस दर्ज हो ही रहा हो, यह ज़रूरी नहीं।
मैंने ग्रीन क्रॉस लैब का रुख़ किया जो कि सोल के बाहरी हिस्सें में स्थापित की गई है। जब मैं वहां पहुंची तो सैंपल का नया स्टॉक टेस्ट होने के लिए बस आया ही था। डॉ. ओह येजिंग ने हमें पूरी लैबोरेटरी दिखाई लेकिन एक जगह जाकर वो रुक गईं। उन्होंने हमें बताया कि वहां हमारे जाने की मनाही है।
उन्होंने मुझे बताया कि इस निगेटिव प्रेशर रूम में टेस्ट किया जाता है।' उस कमरे के भीतर दो डॉक्टर मौजूद थे। उन्होंने हल्के पीले रंग का सुरक्षा कवच पहन रखा था। वो उस कमरे में कभी एक कोने पर जाते, कभी दूसरे। वे एक मेज पर रखी टेस्ट ट्यूब्स उठाकर दूसरी मेज पर रख रहे थे।

हमें अपने आसपास दर्जनों मशीनों की आवाज़ सुनाई दे रही थी। ये लगातार काम कर रही थीं और नतीजे दे रही थीं। ये पीसीआर (पॉलीमरेज़ चेन रिएक्शन) टेस्ट कर रही थीं। अगर एकदम साधारण शब्दों में कहें तो ये मशीनें इस बात की जांच कर रही थीं कि कौन सा सैंपल प़ॉजीटिव है। टेस्ट-ट्यूब में सैंपल स्टोर करने से लेकर टेस्ट का परिणाम आने तक में 5 से 6 घंटे का समय लगता है।
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मर्स से सबक
प्रोफ़ेसर गे चियोल कोन लैबोरेटरी मेडिसीन फ़ाउंडेशन के चेयरमैन हैं। वो कहते हैं कि इतनी तेज़ी से यह सब कुछ कर पाना दक्षिण कोरियाई जीन का हिस्सा है। इसे वो कोरियाई 'बाली-बाली' जीन कहते हैं। बाली एक कोरियाई शब्द है, जिसका मतलब है जल्दी।

वो ऐसा इसलिए कहते हैं, क्योंकि दक्षिण कोरिया टेस्ट का तरीक़ा खोजने में कामयाब रहा और उन्होंने पूरे देश में प्रयोगशालाओं का एक ऐसा नेटवर्क तैयार किया जो महज़ 17 दिनों के भीतर ही सक्रिय तौर पर काम करने लगा। लेकिन इन सभी त्वरित प्रक्रियाओं के पीछे एक बेहद कड़वा अनुभव है।
चियोल कोन कहते हैं, 'हमने किसी भी नए संक्रमण के ख़तरे से लड़ना सीखा है। यह साल 2015 में फैले मिडिल ईस्ट रेस्पाइरेटरी सिंड्रोम (मर्स) की सीख का नतीजा है।'
कोरोना के वैक्सीन की तैयारी

जिस समय मर्स का प्रकोप फैला था, दक्षिण कोरिया में 36 लोगों की जान चली गई थी। 36 लोगों की मौत ने इस देश को संक्रमण से निपटने के लिए त्वरित और उपयोगी क़दम उठाने के लिए प्रेरित किया। इसके साथ ही दक्षिण कोरिया अपने दृष्टिकोण में भी बदलाव लाने को मजबूर हुआ।
दक्षिण कोरिया सेंटर फ़ॉर डिज़ीज कंट्रोल ने तो एक ऐसे विभाग की स्थापना ही कर डाली जो इस तरह की किसी भी बुरी से बुरी परिस्थिति से निपटने के लिए हमेशा तैयार रहे। ...और अब जबकि कोरोना वायरस का संक्रमण दुनिया भर को परेशान कर रहा है, दक्षिण कोरिया की यही तैयारी उसे लाभ दे रही है।

प्रो कोन कहते हैं ' मुझे लगता है कि शुरुआती संक्रमित लोगों की पहचान करके, उनकी सही जांच और उसके बाद उन्हें आइसोलेशन में रखकर मृत्यु दर को रोका जा सकता है और वायरस के प्रसार को भी नियंत्रित किया जा सकता है।'
वो कहते हैं कि हर पुराने अनुभव से सीखने की ज़रूरत होती है और पहले से ही सिस्टम को तैयार रखने की आवश्यकता...संभव तौर पर इस तरह के किसी भी नए प्रकोप से निपटने के लिए यही सबसे कारगर उपाय होता है।

फ़रवरी की शुरुआत तक ग्रीन क्रॉस की टीम के लिए सब कुछ बहुत ही सामान्य था लेकिन उसके बाद एक मरीज़ की पहचान हुई। जिसे दक्षिण कोरिया में अब पेशेंट-31 के नाम से भी जाना जाता है। इस महिला का कोई यात्रा का रिकॉर्ड नहीं था, ना ही वो किसी ऐसे शख़्स के संपर्क में आई थीं जिन्हें कोरोना पॉज़ीटिव पाया गया हो।
वो शिंचेओंजी चर्च ऑफ़ जीसस से जुड़ी हुई थीं। इस धार्मिक समुदाय के क़रीब दो लाख सदस्य हैं। इस एक बात ने इस प्रकोप के मूल स्रोत को खोजने और उसके फैलने के बारे में शुरुआती जानकारी दी।

दक्षिण कोरिया में प्रयोगशालाएं टेस्ट के लिए तैयार थीं। हालांकि कर्मचारियों का लगातार काम करना और थकना एक मुद्दा ज़रूर था। लेकिन अब वे पालियों में काम करते हैं। डॉ. ओह ने बताया कि अब परिस्थितियां पहले की तुलना में बेहतर हुई हैं और अब वो काम के बाद कुछ घंटों की नींद ले पा रही हैं।
सभी के लिए एक रोल मॉडल

दक्षिण कोरिया में टेस्टिंग किट्स की कोई कमी नहीं है। चार कंपनियों को टेस्टिंग किट बनाने के लिए अप्रूवल दिया गया है। इसका मतलब ये हुआ कि दक्षिण कोरिया के पास पूरी क्षमता है कि वो हर सप्ताह क़रीब 1 लाख 40 हज़ार टेस्ट कर सके। प्रो. कोन का मानना है कि दक्षिण कोरिया में जो टेस्ट किए जा रहे हैं उनकी प्रमाणिकता 98 फ़ीसदी है।
इतनी अधिक संख्या में लोगों को टेस्ट करने की क्षमता और योग्यता ने इस देश को दुनिया के दूसरे देशों के लिए एक रोल मॉडल के तौर पर स्थापित किया है। एक ऐसे देश के तौर पर जो कोरोना वायरस के संक्रमण से लड़ने के लिए तैयार है। लेकिन सब कुछ अच्छा ही नहीं है। कुछ ग़लतफ़हमियां भी हुई हैं।
अस्पताल का बेड मिलने का इंतज़ार करते-करते डैगु में दो लोगों की मौत हो गई। शुरुआत में यहां जिसे भी संक्रमित पाया जा रहा था उसे अस्पताल में ही क्वॉरन्टीन के लिए रखा जा रहा था।
लेकिन अब डॉक्टरों ने यह समझ लिया है कि जिन लोगों में यह संक्रमण बेहद कम है उन्हें उनके आवास पर भी इलाज मुहैया कराया जा सकता है। ऐसे में जो लोग ख़तरनाक तौर पर संक्रमित हैं उन्हें अस्पताल का बिस्तर मिलना आसान हो गया है।

कोरिया नेशनल मेडिकल सेंटर के डॉ किम योन जे के मुताबिक़, 'हम हर किसी को क्वॉरन्टीन नहीं कर सकते हैं और ना ही हर किसी का इलाज कर सकते हैं। जिन लोगों में संक्रमण के बेहद मामूली लक्षण हैं उन्हें घर पर रहना चाहिए और वहीं इलाज लेना चाहिए।'
'हमें परिणाम को देखते हुए रणनीति में बदलाव करना चाहिए ताकि मौत के आंकड़ों को बढ़ने से रोका जा सके। जैसे की इटली में यह भयानक रूप ले चुका है। ऐसी स्थिति में इटली को अपनी रणनीति में बदलाव लाना चाहिए।'

वैक्सीन को लेकर उम्मीद

जिन लोगों के सैंपल जमा किए गए हैं उनकी भी जांच हो रही है और उन पर भी परीक्षण किए जा रहे हैं। वैज्ञानिकों ने एक यूनिक प्रोटीन ईजाद किया है जो एंटीबॉडी का पता लगा सकता है। ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि भविष्य में इसका टीका तैयार कर लिया जाएगा।
ली नाम के एक शख़्स (बदला हुआ नाम) हर सप्ताह ख़ून की जांच कराने के लिए जाते हैं। वो वुहान में काम करते थे। वो दिसंबर महीने में वहीं थे, जब इस वायरस का पता चला और फिर ये पूरी दुनिया में फैल गया। उन्हें दक्षिण कोरियाई सरकार वापस लेकर आई और जब उनकी जांच हुई तो पता चला कि वो पॉज़ीटिव हैं।

उनकी मां इस बात से काफ़ी दुखी थीं। वो बताते हैं, 'मां यह जानकर सबसे अधिक परेशान हो गई थीं लेकिन उन्हें परेशान होने की कोई ज़रूरत नहीं थी। मैं 28 साल का हूं और मेरा केस माइल्ड लेवल का था।'
अपनी तबीयत के बारे में ली कहते हैं, 'मैं बिलकुल ठीक महसूस कर रहा था। मुझे इसके कोई लक्षण भी नज़र नहीं आ रहे थे। बस हल्का सा कफ़ था। अगर मैं अपने अनुभव से कहूं तो यह बहुत ज़रूरी है कि आप सचेत रहें और सावधान भी। लेकिन मैं यह भी कहना चाहता हूं कि ज़्यादा घबराएं नहीं। कम से कम मेरे मामले में वायरस के लक्षण बहुत तीव्र नहीं थे। लेकिन मैं ये ज़रूर जानता हूं कि जो लोग बुज़ुर्ग हैं उन्हें ज़्यादा सावधानी रखने की ज़रूरत है। लेकिन जो लोग युवा हैं और स्वस्थ हैं उन्हें बहुत अधिक डरने या घबराने की ज़रूरत नहीं। लेकिन सावधानी अपनाना ज़रूरी है।'
जानकारी होना अच्छा है

दक्षिण कोरिया में अभी तक कोरोना वायरस से लड़ने के लिए जो भी उपाय अपनाए गए हैं, उनमें लॉकडाउन कहीं भी नहीं है। यानी सुरक्षा उपायों के नाम पर ना तो कहीं बंदी की गई है ना सड़कों पर प्रतिबंध लगाया गया है और ना ही लोगों के आवाजाही को रोका गया है। दक्षिण कोरिया का इस वायरस से लड़ने का सिर्फ़ एक मंत्र है- पहचान, परीक्षण और इलाज।

लगभग 5 करोड़ की आबादी वाला ये देश इस वायरस से लड़ने के लिए हर छोटी से छोटी कोशिश को भी तवज्जो दे रहा है। स्कूल अब भी बंद हैं, दफ़्तरों में लोगों को घर से काम करने को कह दिया गया है और लोगों से कहा गया है कि वे किसी समारोह और आयोजन का हिस्सा ना बनें।
सोल की सड़कों पर धीरे-धीरे लोगों की आवाज़ बढ़ रही है। ज़्यादातर लोग मास्क में दिखते हैं। हर प्रमुख इमारत के बाहर थर्मल ट्रेसिंग की व्यवस्था की गई है। हर लिफ़्ट में हैंड-सेनेटाइज़र की व्यवस्था की गई है। जगह-जगह लोगों को खड़ा किया है जो आते-जाते लोगों को याद दिलाते रहते हैं कि हाथ धोना है।

दक्षिण कोरिया में धीरे-धीरे ये चलन आम होता जा रहा है। लेकिन स्वास्थ्य अधिकारी अब भी मुस्तैद हैं। उनका मानना है कि अभी लापरवाही, ख़तरनाक साबित हो सकती है। अगर किसी चर्च, ऑफ़िस, जिम या सोसायटी में किसी एक ने भी लापरवाही की तो परिणाम भयानक हो सकते हैं।
रही बात रशेल किम के टेस्ट रिज़ल्ट की तो...

रशेल किम को उनके टेस्ट के अगले दिन एक मैसेज आया। उन्हें कोरोना वायरस संक्रमित नहीं पाया गया। लेकिन वो कहती हैं 'टेस्ट के बाद ये पता चलना सुकून देने वाला है। यह एक बड़ी राहत इसलिए भी है, क्योंकि अब मैं किसी और के लिए भी ख़तरा नहीं हूं।'

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