बाबरी मस्जिद विवाद में अब आगे क्या होगा?

पुनः संशोधित शनिवार, 3 अगस्त 2019 (14:30 IST)
रामदत्त त्रिपाठी, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
अयोध्या में 1500 वर्ग गज ज़मीन पर दो धार्मिक समुदायों की आस्था करीब 150 सालों से कोर्ट कचहरी के चक्कर लगा रही है। वर्ष 2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने ये मानते हुए कि वही ज़मीन भगवान राम की जन्मस्थली है, विवादित बाबरी मस्जिद के तीन गुंबद दीर्घकालीन कब्ज़े के आधार पर तीन पक्षों को बांट दिए थे।
 
एक हिस्सा निर्मोही अखाड़ा को जो सनातन हिन्दुओं की प्रतिनिधि संस्था है और करीब डेढ़ सौ सालों से वहां पूजा अर्चना के अधिकार के लिए लड़ रहा है। दूसरा हिस्सा हिन्दुत्ववादी संस्था और सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की सहयोगी विश्व हिन्दू परिषद तथा तीसरा मुस्लिम समुदाय की प्रतिनिधि संस्था सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड को। इस फैसले से सभी पक्ष असंतुष्ट थे इसलिए सुप्रीम कोर्ट में कुल 14 अपीलें दाखिल की गईं।
 
सुप्रीम कोर्ट में कई सालों तक सुनवाई इसलिए नहीं हो पाई क्योंकि इलाहाबाद हाईकोर्ट में जो दस्तावेज पेश किये गए थे वे अंग्रेज़ी के अलावा, उर्दू, फारसी और संस्कृत में थे और ये लाखों पन्ने में थे।
 
इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पहले इनका अनुवाद किया जाए। पिछले लोकसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी संगठनों ने ये कोशिश की थी सुप्रीम कोर्ट इस पर रोज़ाना सुनवाई करके अपना फैसला दे दे, लेकिन सर्वोच्च अदालत ने इस मामले को वार्ता से सुलझाने के लिए तीन सदस्यों की एक कमेटी बना दी।
 
1500 वर्ग गज ज़मीन
अंततः ये कमेटी वार्ता से इस विवाद को सुलझाने में असफल रही और उसकी रिपोर्ट देखने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने तय किया है कि अब छह अगस्त से रोज़ाना सुनवाई होगी।
 
क़ानून के जानकारों का कहना है कि सभी वकील अपनी दलील रखने के लिए काफ़ी वक़्त लेंगे लेकिन इसमें कितना वक़्त लगेगा ये कहना मुश्किल है।
 
चूंकि ये विवाद दोनों समुदायों की भावनाओं से जुड़ा हुआ है और एक अरसे से विश्व हिंदू परिषद इसको लेकर आंदोलन भी चला रही थी, इसलिए लगता है कि अदालत ये मान रही थी कि अगर दोनों पक्षों की सहमति से कोई समझौता हो जाता है तो उसे लागू कराना आसान हो जाएगा।
 
सुप्रीम कोर्ट तो अपना फैसला दे देता है और वो क़ानूनी रूप से बाध्यकारी भी होता है लेकिन सबसे बड़ी चुनौती होती है उसे लागू कराना, क्योंकि अगर फैसला किसी एक समुदाय के पक्ष में आया तो उसे लागू कराना बेहद मुश्किल काम होगा। मूल विवाद उस 1500 वर्ग गज ज़मीन पर है, जिस पर मस्जिद के तीन गुंबद खड़े थे।
 
जब उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह की सरकार बनी तो उसने इसके आस पास की 2.77 एकड़ ज़मीन को अधिग्रहित कर लिया जिसमें कुछ धर्मशालाएं और मंदिर भी थे, ताकि पर्यटकों की सुविधा के लिए पर्यटक स्थल बनाया जा सके।
 
जब बाबरी मस्जिद टूटी तो उस समय केंद्र की नरसिम्हा राव की सरकार ने आस पास की 67 एकड़ ज़मीन अधिग्रहित कर ली।
 
अधिग्रहित ज़मीन का विवाद
इसके लिए बकायदा क़ानून बनाकर ज़मीन अधिग्रहण किया गया और इसका संरक्षक केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर फ़ैज़ाबाद के कमिश्नर को बनाया गया था। विवाद के संबंध में राज्य सरकार की कोई ख़ास भूमिका नहीं है सिवाय क़ानून व्यवस्था बनाए रखने और यथास्थिति को क़ायम रखने के।
 
इस पूरी ज़मीन में क़रीब 40 एकड़ वो हिस्सा भी शामिल है जिसे पूर्व की कांग्रेस सरकार ने ही रामकथा पार्क के लिए अधिग्रहित किया था।
बाद में कल्याण सिंह सरकार ने इस ज़मीन को विश्व हिंदू परिषद को दे दिया था।
 
ये ज़मीन इस मक़सद से अधिग्रहित की गई थी कि जब ये विवाद कोर्ट से सुलझेगा और जो पक्ष जीतेगा उसके अलावा वहां धर्मशालाएं आदि के निर्माण के लिए ज़मीन दी जाएगी। इसके अलावा हारे हुए पक्ष को भी कुछ ज़मीन दी जा सकती है।
 
लेकिन विश्व हिंदू परिषद की ओर से बार बार ये दबाव डाला जाता है कि इस अधिग्रहित ज़मीन में से उन्हें कुछ हिस्सा दे दिया जाए ताकि वो सांकेतिक रूप से निर्माण कार्य शुरू कर सकें।
 
लेकिन इस पर भी सुप्रीम कोर्ट का फैसला है कि इस 67 एकड़ ज़मीन का बंटवारा भी अंतिम फैसले के बाद ही किया जाएगा और तब भी जो ज़मीन अतिरिक्त बचेगी उसी को लौटाया जा सकेगा।
 
सुप्रीम कोर्ट के पास कितना समय?
वर्तमान हालात में ये देखना होगा कि इतने सारे दस्तावेजों, गवाहों, वकीलों की दलीलें सुनने के लिए सुप्रीम कोर्ट कितना वक़्त निर्धारित करता है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने रोज़ाना सुनवाई की बात कही है लेकिन जो पांच जजों की बेंच है जिसके सामने और भी मामले हैं।
 
मुख्य न्यायाधीश की जो विशेष बेंच है, वो कोई और सुनवाई नहीं करेगी या रोज़ कितने घंटे का वक्त अदालत देगी, उस बात पर बहुत कुछ निर्भर करता है।
 
उदाहरण के लिए सुन्नी वक्फ़ बोर्ड के वकील राजीव धवन का कहना है कि उन्हें कम-से-कम 20 घंटे का वक्त लगेगा। मुसलमानों की तरफ़ से कई और पक्षकार हैं, उन्हें भी समय चाहिए। हिंदुओं के जो वकील हैं उनका कहना है कि उन्हें भी कम-से-कम 40 घंटे का समय चाहिए होगा।
 
इस पूरे विवाद में मुस्लिम पक्ष का कहना है कि ये मस्जिद साढ़े चार सौ साल से थी और ये ज़मीन उन्हें वापस मिलनी चाहिए। साथ में वो ये भी चाहता है कि मस्जिद का पुनर्निर्माण किया जाए।
 
जब ये मस्जिद गिराई गई थी तो तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने कहा था कि जो चीज़ टूटी है उसे बनाया जाएगा।
 
पृष्ठभूमि
पहली बार दिसंबर 1949 में यहां मूर्तियां रखी गई थीं। इस बात के कोई पक्का सबूत नहीं है कि इस मस्जिद को बाबर ने ही बनवाया था या मंदिर तोड़ कर इसे बनाया गया था।
 
कोर्ट के आदेश पर जब वहां खुदाई हुई तो नीचे जो चीज़ें मिलीं उससे बस इतना पता चलता है कि वो किसी हिंदू धार्मिक स्थल के चिह्न हैं। लेकिन इसके आधार पर ये कहना कि वहां था या वो कितना पुराना था, ये बता पाना मुश्किल है।
 
इसीलिए सुप्रीम कोर्ट के लिए भी इसका फैसला कर पाना बहुत आसान नहीं होगा। क्योंकि तथ्य भी स्पष्ट नहीं हैं और मामला भावनाओं का बन चुका है।
 
इलाहाबाद हाईकोर्ट को भी इस मामले में नतीजे पर पहुंचने में काफ़ी मुश्किल हुई थी और सालों लग गए थे। यहां ये मुक़दमा 1949 से चल रहा था।
 
(बीबीसी हिंदी के लिए संदीप राय से बातचीत के आधार पर।)

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