चीन और रशिया क्यों दे रहे हैं तालिबान का साथ?

अनिरुद्ध जोशी| Last Updated: बुधवार, 8 सितम्बर 2021 (18:26 IST)
से अमेरिका के जाने और के आने से कई देशों में अब घबराहट की स्थिति बनी हुई है। तालिबान ने और को भरोसा दिलाया है कि वह अपनी भूमि का उपयोग इन दोनों देशों के खिलाफ नहीं होने देगा। तालिबान की ताजपोशी में चीन, पाक, रूस समेत 6 देशों को न्योता दिया गया है जिसमें भारत शामिल नहीं है। आखिर क्यों चीन और रशिया तालिबान का पक्ष ले रहे हैं? इसके कई कारण है लेकिन एक महत्वपूर्ण कारण भी है।
चीन : अमेरिका के निकलने के बाद चीन अब अफगानिस्तान में जगह बनाकर दो तरह के हित साधना चाहता है। पहला यह कि वह अफगानिस्तान में बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) को विस्तार देना चाहेगा और दूसरा यह कि वह प्रांत में उईगर मुस्लिमों को मिल रही ताकत को रोकेगा। हाल ही में चीन के विदेशमंत्री वांग यी ने कहा कि 'तथ्यों ने यह साबित कर दिया है कि अफगानिस्तान में युद्ध यहां से आतंकवादी समूहों को हटाने के अपने लक्ष्य में कभी सफल नहीं हो पाया। जिस तरह जल्दी में अमेरिकी और नेटो सेनाओं को यहां से हटाने का फैसला किया गया, उसने अफगानिस्तान में कई आतंकवादी समूहों को फिर एकजुट होने का मौका दे दिया है।'
चीन के इस बयान से यही साबित होता है कि उसे अपने यहां पनप रहे को लेकर चिंता है। चीन का प्रांत शिनजियांग एक मुस्लिम बहुल प्रांत है। जबसे यह मुस्लिम बहुल हुआ है तभी से वहां के बौद्धों, तिब्बतियों आदि अल्पसंख्‍यकों का जीना मुश्किल हो गया है। अब यहां छोटे-छोटे गुटों में आतंकवाद पनप चुका है, जो चीन से आजादी की मांग करते हैं। जर्मन में रह रहे नेता डोल्कुन ईसा पर शिनजियांग में कट्टरवाद फैलाने के आरोप हैं।
शिनजियांग में उइगर मुस्लिमों की आबादी 1 करोड़ से ज्यादा है जिन्हें तुर्किस्तान का मूल निवासी माना जाता है। चीन ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट को आतंकवादी संगठन मानता है। हाल ही में हुए धर्म सम्मलेन में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना के जनरल सेक्रेटरी और राष्ट्रपति ने अपने देशवासियों को चेतावनी देते हुए कहा कि वे चीन की स्टेट पॉलिसी 'मार्क्सवादी नास्तिकता' का अनुसरण करें और इस्लामी विचारधारा का अनुसरण न करें। चीन के शिनजियांग प्रांत में रहने वाले उइगर समुदाय के लोग इस्लाम धर्म को मानते हैं। पिछले कुछ वर्षों के दौरान उइगरों द्वारा चीनी सरकार का विरोध काफी बढ़ा है। शिनजियांग की सीमा पाकिस्तान और अफगानिस्तान से लगती है, जहां से कट्टरपंथी इस्लामी शिक्षाओं का प्रसार होता है। चीन इस सब को रोकना चाहता है।
रशिया : रूस 'मॉस्को फॉर्मेट' पर काम कर रहा है। मॉस्को फॉर्मेट शब्द पहली बार 2017 में इस्तेमाल किया गया था। 2018 में रूस ने तालिबान के साथ एक हाई-लेवल डेलीगेशन में 12 अन्य देशों की मेजबानी की थी। इस बैठक का मुख्या उद्देश्य अफगानिस्तान में जल्द से जल्द शांति सुनिश्चित करना था। तालिबान के आने से रूस के लिए मध्य एशिया की सुरक्षा चिंताएं बढ़ गई हैं। फिलहाल रूस दो जगहों पर उलझा हुआ है, यूक्रेन और चेचन्या।

चेचन्या रूस के दक्षिणी हिस्से में स्थित गणराज्य है, जो मुख्‍यत: मुस्लिम बहुल क्षेत्र है। स्थानीय अलगाववादियों और रूसी सैनिकों के बीच बरसों से जारी लड़ाई ने चेचन्या को बर्बाद कर दिया है। चेचन्या पिछले लगभग 200 सालों से रूस के लिए मुसीबत बना हुआ है। रूस ने लंबे और रक्तरंजित अभियान के बाद 1858 में चेचन्या में इमाम शमील के विद्रोह को कुचला था लेकिन इसका असर ज्यादा समय तक नहीं रहा।
लगभग 60 साल बाद जब रूस में क्रांति हुई तो चेचन फिर रूस से अलग हो गए। यह आजादी कुछ ही समय तक बनी रही और 1922 में रूस ने फिर चेचन्या पर अधिकार कर लिया। दूसरे महायुद्ध के वक्त चेचन फिर रूस से अलग हो गए। लड़ाई थमते ही रूसी नेता स्टालिन ने चेचन अलगाववादियों पर दुश्मनों से सहयोग का आरोप लगाकर उन्हें साइबेरिया और मध्य एशियाई क्षेत्रों में निर्वासित कर दिया। 1957 मे ख्रुश्चेव जब सत्ता में आए तो चेचन अलगाववादी वापस आ पाए। 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद चेचन्या के लोगों ने फिर से विद्रोह कर दिया। 1994 में रूस ने वहां सेना भेजी, मगर चेचन लोगों ने जोरदार विरोध किया जिसमें दोनों तरफ के लोग भारी संख्या में मारे गए।
अगस्त 1999 में चेचन विद्रोही पड़ोसी रूसी गणराज्य दागेस्तान चले गए और वहां एक मुस्लिम गुट के अलग राष्ट्र की घोषणा का समर्थन कर दिया, जो कि चेचन्या और दागेस्तान के कुछ क्षेत्रों को मिलाकर बनाया जा रहा था, लेकिन तब तक रूस में व्लादीमिर पुतिन प्रधानमंत्री बन चुके थे और उनकी सरकार ने सख्ती दिखानी शुरू कर दी। इसके तहत चेचन्या के लिए नए संविधान को मंजूरी दी गई और चेचन्या को और स्वायत्तता दी गई। मगर ये स्पष्ट कर दिया गया कि चेचन्या रूस का हिस्सा है, लेकिन चेचन्या के विद्रोही या आतंकवादी कहां मानने वाले थे इसलिए लड़ाई अभी जारी है।

ऐसा माना जा रहा है कि तालिबान के आने से शिनजियांग, चेचन्या और कश्मीर में आतंक बढ़ने वाला है। यही वजह है कि चीन और रशिया इस गतिविधि को रोकने के लिए अफगानिस्तान पर अपना अप्रत्यक्ष नियंत्रण चाहते हैं। लेकिन सिर्फ एक यही वजह नहीं है। अफगानिस्तान सामरिक दृष्टि से भी एक महत्वपूर्ण स्थान है।



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