तालिबान का खात्मा हो जाएगा यदि कर लिया ये एक काम तो, पर करेगा कौन?

चीन, और रशिया का साथ होना और अमेरिका का साथ छोड़ देना चारों की मंशा पर सवाल उठाए जा सकते हैं। इस दुनिया में हर समस्या का समाधान है, परंतु यदि कोई समाधान चाहता ही नहीं है तो फिर कोई कुछ नहीं कर सकता। कोई को आतंकवादी मानता है तो कोई विद्रोही। हालांकि असल में वह एक आतंकवादी संगठन ही है यह तय तब होता है जब कोई देश या लोग उसके जुल्म के शिकार होते हैं। कोई संगठन किसी महिला और बच्चों को मार दे तो उसे कैसे आप एक विद्रोही संगठन मान सकते हैं? खैर, अब हेडिंग पर आते हैं- तालिबान का खात्मा हो जाएगा यदि कर लिया ये एक काम तो, पर करेगा कौन?


1. किसी भी विचारधारा को दबाने के दो रास्ते हैं- पहला शस्त्र और दूसरा तर्क। शस्त्र से दबाई गई विचारधारा बहुत जल्द ही जीवित होकर पुन: वर्चस्व में आ जाती है, जबकि तर्क द्वारा दबाई गई विचारधारा लंबे काल तक वर्चस्व में नहीं आती। परंतु लंबे काल बाद वह पुन: वर्चस्व में आ जाती है क्योंकि जिस तर्क से उसे दबाया गया उसी तर्क से उसे स्थापित भी किया जा सकता है। तब क्या हल है इसका.?

2. तालिबान एक विचारधारा है। सभी तालिबान के खिलाफ लड़ते हैं परंतु विचारधारा के खिलाफ लड़ने के लिए न तो के बुद्धि‍जीवियों के पास कोई योजना है और न विश्‍व के नेताओं के पास। विश्व के नेताओं को इसकी कोई चिंता नहीं है कि कोई देश किस तरह एक जहालत भरी जिंदगी में जी रहा है और अफगानिस्तान के बुद्धिजीवियों को भी इसकी चिंता नहीं सताती है कि देश को किस तरह से जहालत की जिंदगी से बाहार निकालें। अफगानिस्तान जाहिलपन का सबसे अच्छा उदाहरण है।

3. किसी भी देश के भविष्य का आधार स्कूल में पढ़ाई जाने वाली 'शिक्षा पद्धति' होती है। शिक्षा ही उसे या देश को आगे ले जाती है और यही पीछे भी धकेलती है। जिन स्कूलों में सिर्फ धार्मिक पाठ ही प्रमुखता से पढ़ाया जाता है वहां के बच्चे कॉलेज तक आते-आते कट्टर नहीं बनेंगे तो क्या बनेंगे? किसी भी देश को यह देखना चाहिए कि हम कितने साइंटिस्ट पैदा कर रहे हैं, कितने खिलाड़ी पैदा कर रहे हैं और कितने अच्छे नोबेले साहित्यकारों को जन्म दे रहे हैं। यह तीन ऐसी बाते हैं जो व्यक्ति की सोच और देश को बदलने की क्षमता रखती है।
4. सऊदी अरब और ईरान ने अपनी अपनी विचारधारा को फैलाने और उसे मजबूत करने के लिए दुनियाभर में मदरसों को बढ़ावा दिया है। उन्होंने इसके लिए अच्छी खासी फंडिंग की है। आज हम विश्‍व में आतंकवाद का जो रूप देख रहे हैं वह सभी मदरसे की प्राथमिक शिक्षा का परिणाम है। तालिबान को सबसे ज्यादा सहयोग सऊदी अरब और पाकिस्तान से मिलता है। तालिबान का उदय 90 के दशक में उत्तरी पाकिस्तान में हुआ था जब अफगानिस्तान में सोवियत संघ की सेना वापस लौट रही थी। पाकिस्तान ने ही इस संगठन को बढ़ावा दिया।
5. सबसे जरूरी है इच्‍छाशक्ति जो विश्व के बड़े नेताओं के पास है भी तो वे उसे अपने राजनीतिक हित के अनुसार बदलते रहते हैं। जैसे चीन चाहता है कि आतंकवाद हमारे यहां नहीं हो लेकिन वह यह भी चाहता है कि आतंकवाद भारत में पनपता रहे या इसी आतंकवाद के माध्यम से भारत को दबाया जा सकता है। रशिया भी कुछ इसी तरह की सोच रखता है। ऐसे में आतंकवाद का भविष्य हमेशा से ही उज्जवल रहा है।

6. कई लोग ऐसे भी हैं जो तालिबान में इसीलिए शामिल है क्योंकि ऐसा करके वे खुद को और अपने परिवार को सु‍रक्षित रख सकते हैं। उन्हें यदि सुरक्षा की गारंटी मिले तो वे कभी तालिबान को ज्वाइन नहीं करेंगे। लेकिन होता यह है कि नागरिकों को सुरक्षा देने वाला कोई और नहीं बाहर का देश होता और सबसे बड़ा संकट यह है कि तालिबान को सुरक्षा देने वाले साऊदी अरब, चीन और पाकिस्तान जैसे देश हैं। ऐसे में अफगान नागरिक यह भी चाहते हैं कि हमारी सुरक्षा हमारे ही नागरिकों के द्वारा हो और साथ ही पाकिस्तान का दखल बंद हो।

7. अब सवाल यह उठता है कि किस तरह तालिबानी विचारधारा से लड़ा जाए? दरअसल, तालिबान के खिलाफ अफगानिस्तान के अधिकतर लोग हैं और बहुत से ऐसे लोग भी है जो पुराने वामपंथी हैं या रैशनलिज्म को मानने वाले लोग हैं। हालांकि विचारधारा के खिलाफ लड़ने की बात तो सभी करते हैं परंतु लड़ता हुआ कोई नहीं दिखाई देता। जो भी इस विचारधारा के खिलाफ जाता है तालिबान उसे मार देता है।

8. हालांकि विचारधारा की लड़ाई के लिए आजकल कई सोशल प्लेटफॉर्म है। तालिबान जानता है कि हमें लोगों को इतना शिक्षित नहीं होने देना है कि वे सचाई को जानकर हमारे खिलाफ होने लगे। इसीलिए वह सभी तरह के संचार माध्यमों को अपने तरीके से संचालित करना चाहता है और घरों से रेडियो और टीवी जैसे उपकरण को हटाना चाहता है। हालांकि अब इंटनेट और सोशल मीडिया तालिबान के लिए सबसे बड़ा खतरा भी है।

9. दुनिया ने अफगानी लोगों को एकजुट करके कभी कोई ऐसा प्लेटफॉर्म नहीं दिया और न ही सुरक्षा दी जो इस तरह की विचाराधारा से लड़ सकें और खुद तालिबान की सोच को ही बदलने का प्रयास कर सकें। अमेरिका जब तक अफगानिस्तान में रहा उसने यह प्रयास नहीं किया कि किस तरह तालिबानी सोच को बदला जाए। उसने यह प्रयास भी नहीं किया कि किस तरह अफगान को आधुनिक सोच का मुल्क बनाया जाए। सोच बदलेगी तो मुल्क बदलेगा। लोगों को कट्टरपंथी सोच से मुक्त करने के लिए सबसे जरूरी है कि हम बच्चों को साइंस की शिक्षा दें और उसके साथ अर्थ को भी जोड़े। जिस तरह सऊदी अरब ने आधुनिक विचारधारा के खिलाफ फंडिंग की, क्या दूसरे देश कट्टरपंथी विचारधारा के खिलाफ लड़ने के लिए फंडिंग नहीं कर सकते?

10. एक दौर था जबकि सोवियत संघ ने सभी वामपंथियों को एकजुट करके एक नया अफगानिस्तान बनाया था। फिर अमेरिका, सऊदी अरब और पाकिस्तान ने कट्टरपंथी मुजाहिद्दिनों को बढ़ावा देकर सबकुछ बर्बाद कर दिया। दूसरे दौर में जब मुजाहिद्दिनों से तालिबान ने सत्ता हथिया ली तो अमेरिका ने बाद में तालिबान को मात्र 15 दिन में इसीलिए खत्म कर दिया क्योंकि उसने ओसामा बिन लादेन को शरण दे रखी थी। जब तालिबान को खत्म किया था तो अमेरिका ने उन लोगों को सत्ता हाथ में नहीं दी जो इसे अच्छे से चला सकते सकते थे, जैसे नॉर्दन अलायंस। नॉर्दन अलायंस कई सालों से तालिबान से लड़ रहा है लेकिन उसे ना तो रशिया ने मदद की और न अमेरिका ने। तब कैसे मुक्त होना अफगानिस्तान तालिबानी सोच से?

11. उदाहरणार्थ, एक दौर था जब भारत की सभ्य विचारधारा को रुढ़िवादी घोषित करके यहां पर पाश्चात्य और वामपंथी विचारधारा को बढ़ावा देने के लिए 2 फरवरी 1835 को ब्रिटेन की संसद में 'थॉमस बैबिंगटन मैकाले' ने एक प्रस्ताव रखा था। इसके बाद देश की लाखों संस्कृत पाठशाला को बंद करके कॉन्वेंट स्कूल खोले गए और देश को भारतीय सोच से मुक्त किया गया। इसके लिए पुस्तकों में बदलाव किया गया और लाखों नई पुस्तकों को बाजार में उतारा गया था जिसे पढ़कर भारतीय लोग लंदन, मास्को और बीजिंग के सपने देखने लगे थे।

निश्चित ही इसके चलते हमने बहुत कुछ खोया और बहुत कुछ पाया। लेकिन इस बीच सबसे बड़ी बात यह हुई कि हमने लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की अहमियत को भी समझा। जरूरी नहीं कि हम किसी देश को किसी मैकाले की तरह किसी दूसरी विचारधारा में ढालें परंतु इतना तो कर ही सकते हैं कि हम लोगों को यह समझाने में कामयाब तो हो ही सकते हैं कि धार्मिक कट्टरता जीवन विरोधी है और लोकतंत्र जीवन समर्थक विचारधारा है। धर्म से बढ़कर विज्ञान है, जरा विज्ञान एक बार समझकर तो देखो। आज दुनिया को इससे सबक लेने की जरूरत है कि तालिबानी जैसी विचारधारा से एक देश ही नहीं समूची मानवता के सपने नष्ट हो जाते हैं।

अंत में एक बात और पढ़े-लिखे तो तालिबानी भी है और अब तो वे अंग्रेजी भी बोलना सीख गए हैं, परंतु उन्होंने किस सब्जेक्ट में ग्रेजुएशन या पोस्ट ग्रेजुएशन किया है यह भी जानना जरूरी है। दूसरी बात यह कि अंग्रेजी सीखने से किसी की सोच नहीं बदल जाती लेकिन हां, अंग्रेजी साहित्य और विज्ञान पढ़ने से जरूर सोच बदल जाती हैऔर तालिबान यह नहीं चाहता है कि अफगानी लोग अंग्रेजी और विज्ञान पढ़ें।



और भी पढ़ें :