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Written By WD Feature Desk
Last Updated : सोमवार, 5 जनवरी 2026 (17:44 IST)

2700 वर्षों से भारत में रह रहा यह यहूदी कबीला अब क्यों जा रहा है इजराइल?

बेनी मनश्शे
Bene manasseh: भारत के पूर्वोत्तर राज्यों, मणिपुर और मिजोरम में सदियों से निवास कर रहा बेनी मनश्शे (Bene Menashe) समुदाय अब अपनी ऐतिहासिक मातृभूमि इजराइल लौटने की तैयारी में है। इजराइल सरकार ने इस समुदाय के 5800 लोगों की वापसी को मंजूरी दे दी है, जो एक प्राचीन इतिहास के पुनर्मिलन जैसा है।
 
यहूदी कबीलों का प्राचीन इतिहास
प्राचीन मेसोपोटामिया (इराक और सीरिया) में हिब्रू कबीले यहोवा को अपना ईश्वर मानते थे। ईसा पूर्व 1100 के आसपास, पैगंबर जैकब की 12 संतानों के नाम पर 12 यहूदी कबीले बने। ये कबीले दो गुटों में बंट गए थे।
 
इजराइल: 10 कबीलों का समूह।
जुडाया: 2 कबीलों का समूह।
 
800 ईसा पूर्व के आसपास असीरियाई साम्राज्य के हमलों के बाद ये कबीले तितर-बितर हो गए। इन्हीं 12 कबीलों में से एक 'मनश्शे कबीला' इतिहास में खो गया माना जाता था, जो शोध के अनुसार भारत आ पहुँचा था।
भारत कैसे पहुँचे बेनी मनश्शे?
बेनी मेनाशे जनजाति का मानना है कि 2700 साल पहले जब नियो-असीरियन साम्राज्य ने उत्तरी इजरायल को जीता, तो उन्हें वहां से निष्कासित कर दिया गया।
 
सफर: बेदखली के बाद वे सदियों तक फारस, अफगानिस्तान, तिब्बत और चीन के रास्तों से भटकते रहे।
विस्तार: समय के साथ यह कबीला कश्मीर, हिमाचल, सिक्किम और असम के रास्तों से होते हुए पूर्वोत्तर में बस गया।
ठिकाना: अंततः उन्होंने म्यांमार की सीमा से सटे भारत के पूर्वोत्तर राज्यों (मणिपुर और मिजोरम) को अपना घर बनाया।
 
भारत में यहूदियों का आगमन और स्वागत
भारत में यहूदियों का प्रवेश केवल पूर्वोत्तर तक सीमित नहीं था। इतिहास के अनुसार:
973 ईसा पूर्व: यहूदियों ने केरल के मालाबार तट पर प्रवेश किया। उस समय नरेश सोलोमन (सुलेमान) का व्यापारिक बेड़ा मसालों के लिए भारत आता था।
राजकीय संरक्षण: हिन्दू राजाओं ने यहूदी नेता जोसेफ रब्बन को जागीर और उपाधियाँ प्रदान कीं।
द्वितीय आगमन: 586 ईसा पूर्व में जूडिया पर बेबीलोन की विजय के बाद भी कई यहूदी शरणार्थी क्रेंगनोर (केरल) में आकर बसे।
 
कौन हैं बेनी मेनाशे और क्यों मिली मान्यता?
यह समुदाय खुद को बाइबिल के 'ओल्ड टेस्टामेंट' में वर्णित मनश्शे कबीले का वंशज बताता है।
धार्मिक मान्यता: 2005 में इजराइल के सेफार्डी मुख्य रब्बी श्लोमो अमर ने उन्हें आधिकारिक रूप से 'इजराइल का वंशज' स्वीकार किया।
विरासत: भले ही वे सदियों तक अलग रहे, लेकिन उन्होंने अपनी यहूदी परंपराओं, त्योहारों और रीति-रिवाजों को जीवंत रखा।
अब क्यों छोड़ रहे हैं भारत?
करीब 2700 वर्षों तक भारत को अपना घर मानने वाला यह समुदाय अब निम्नलिखित कारणों से इजराइल जा रहा है:
जातीय संघर्ष: मणिपुर और मिजोरम के बदलते आंतरिक हालात और जातीय हिंसा के कारण इस अल्पसंख्यक समुदाय के लिए वहां रहना असुरक्षित और चुनौतीपूर्ण हो गया है।
आर्थिक कारण: गरीबी और संसाधनों की कमी के चलते बेहतर जीवन की तलाश।
धार्मिक जुड़ाव: अपनी ऐतिहासिक और पवित्र मातृभूमि 'यरुशलम' के करीब रहने की आध्यात्मिक इच्छा।
 
इजराइल का 'वापसी प्लान' (2030 तक)
'जुइश एजेंसी: इजराइल की 'जुइश एजेंसी' और नेतन्याहू सरकार ने एक व्यापक योजना को मंजूरी दी है:
बजट: इस पुनर्वास प्रक्रिया के लिए इजराइल लगभग 240 करोड़ रुपए खर्च करेगा।
लक्ष्य: साल 2030 तक सभी 5800 लोगों को इजराइल वापस ले जाया जाएगा।
नया ठिकाना: इन्हें उत्तरी इजराइल के गैलिली (Galilee) इलाके में बसाया जाएगा, जिससे इजराइल का उत्तरी क्षेत्र सामरिक और सामाजिक रूप से मजबूत होगा।
भारत सरकार: भारत सरकार की सहमति से बन रहा यह प्लान एक ऐसे अध्याय का अंत है जो 2700 साल पहले शुरू हुआ था। भारत ने हमेशा इस 'खोए हुए कबीले' को शरण और सम्मान दिया, और अब वे अपनी प्राचीन जड़ों की ओर लौट रहे हैं।
 
भारत के अन्य प्रमुख यहूदी समुदाय
पूर्वोत्तर के बेनी मेनाशे के अलावा, भारत में यहूदियों के तीन अन्य मुख्य समूह रहे हैं, जिन्होंने भारतीय संस्कृति में खुद को पूरी तरह ढाल लिया था:
 
बेने इजराइल (Bene Israel): यह भारत का सबसे बड़ा यहूदी समुदाय है, जो मुख्य रूप से महाराष्ट्र (मुंबई और कोंकण क्षेत्र) में बसा। लोककथाओं के अनुसार, लगभग 2000 साल पहले एक जहाज कोंकण तट पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था, जिसमें बचे सात परिवार यहीं बस गए। वे मराठी बोलते हैं और उनके उपनाम (जैसे पेणकर, अष्टमकर) उनके गांवों के नाम पर होते हैं।
 
कोचीन यहूदी (Cochin Jews): ये भारत के सबसे पुराने यहूदी माने जाते हैं जो केरल में बसे थे। केरल के हिंदू राजाओं ने उन्हें बहुत सम्मान दिया और व्यापार के विशेष अधिकार दिए। कोच्चि का 'परदेसी सिनेगॉग' (प्रार्थना स्थल) आज भी दुनिया भर के पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है।
 
बगदादी यहूदी (Baghdadi Jews): ये लगभग 250-300 साल पहले व्यापार के सिलसिले में इराक, ईरान और अरब देशों से मुंबई और कोलकाता आए थे। प्रसिद्ध भारतीय अभिनेता 'डेविड' और पूर्व सैन्य जनरल जे.एफ.आर. जैकब इसी समुदाय से थे।
 
इजराइल के '12 कबीलों' का रहस्य
बाइबिल के अनुसार, पैगंबर जैकब (याकूब) के 12 बेटे थे, जिनसे यहूदियों के 12 कबीले बने। इनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है:-
 
दो मुख्य कबीले (बचे हुए): जब 722 ईसा पूर्व में असीरिया ने हमला किया, तो यहूदा (Judah) और बेंजामिन (Benjamin) के कबीले दक्षिण में 'जूडिया' में सुरक्षित रहे। आज के अधिकांश यहूदी इन्हीं के वंशज माने जाते हैं।
 
दस खोए हुए कबीले (Lost Tribes): असीरियाई आक्रमण के बाद उत्तर में रहने वाले 10 कबीले तितर-बितर हो गए और दुनिया के अलग-अलग कोनों में चले गए। इनमें शामिल थे:
मनश्शे: जिन्हें भारत के बेनी मेनाशे के रूप में पहचान मिली।
अन्य कबीले: रूबेन, शिमोन, लेवी, इस्साखार, जेबुलुन, दान, नाफ्ताली, गाद और एप्रैम।
 
दुनिया में अन्य कहां हैं 'खोए हुए यहूदी'?
सिर्फ भारत ही नहीं, दुनिया के कई अन्य हिस्सों में भी समुदायों ने इन खोए हुए कबीलों का वंशज होने का दावा किया है:
 
इथियोपिया: यहाँ के 'बीटा इजराइल' समुदाय को इजराइल ने 1980 के दशक में बड़े ऑपरेशन चलाकर वापस बुलाया।
अफगानिस्तान और पाकिस्तान: यहाँ के 'पश्तून' समुदायों के कुछ रीति-रिवाजों में यहूदी परंपराओं की झलक मिलती है, जिसे लेकर कई शोध हुए हैं।
चीन: चीन के 'काइफेंग यहूदी' भी सदियों से अपनी पहचान बनाए हुए हैं।
 
दिलचस्प तथ्य: भारत दुनिया के उन गिने-चुने देशों में से एक है जहाँ यहूदियों के साथ कभी भी धार्मिक भेदभाव या अत्याचार (Anti-Semitism) नहीं हुआ। भारतीय यहूदी हमेशा गर्व से कहते हैं कि "भारत उनकी मातृभूमि है और इजराइल उनका पिता का घर (Holy Land)।"
 
संकलन: अनिरुद्ध जोशी