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आत्महत्या करना अस्तित्व का अनादर है- ओशो

सोमवार,जून 15, 2020
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भगवान बुद्ध पर दिए अपने प्रवचनों में ओशो ने महामारी का जिक्र किया है। ओशो कहते हैं कि एक समय वैशाली में दुर्भिक्ष हुआ था और महामारी फैली थी। लोग कुत्तों की मौत पर रहे थे। मृत्यु का तांडव नृत्य हो रहा था। मृत्यु का ऐसा विकराल रूप तो लोगों ने कभी नहीं ...
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संबोधि शब्द बौद्ध धर्म का है। इसे बुद्धत्व भी कहा जा सकता है। देखा जाए तो यह मोक्ष या मुक्ति की शुरुआत है।
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ओशो का जन्म मध्यप्रदेश के कुचवाड़ा में 11 दिसंबर 1931 को हुआ था। उन्हें 21 वर्ष की आयु में जबलपुर में संबोधि की प्राप्ति हुई। स्वास्थ्य संबंधी प्रतिकूलताओं के कारण ओशो ने 19 जनवरी 1990 को पूना स्थित अपने आश्रम में सायं 5 बजे के लगभग अपनी देह त्याग ...
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सेक्‍स के बारे में अपने खुले विचारों की वजह से विवाद में भी रहे हैं। फिल्‍म, लेखन और दूसरे क्षेत्रों से जुड़े कुछ हस्‍तियां ऐसी भी रहीं हैं, जो पहले ओशो की शरण में गईं और फिर उनसे उनका मोह भी भंग हुआ।
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चन्द्र मोहन जैन ऊर्फ ओशो रजनीश खुद को भगवान कहते थे। दुनिया उन्हें धर्म विरोधी और सेक्स गुरु कहती है। ओशो कहते हैं कि यदि आप मेरा समर्थन नहीं कर सकते को कृपया करके विरोध जरूर करना, आलोचना जरूर करना। क्योंकि यदि में सही हूं तो इस विरोध और आलोचना से ...
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छठवां प्रश्न : ओशो, कहा जाता है कि रावण भी ब्रह्मज्ञानी था। क्या रावण भी रावण उसकी मर्जी से नहीं था? क्या रामलीला सच में ही राम की लीला थी?
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आतंकवाद की घटना निश्चित रूप से उस सबसे जुड़ी है, जो समाज में हो रहा है। समाज बिखर रहा है। उसकी पुरानी व्यवस्था, अनुशासन, नैतिकता, धर्म सब कुछ गलत बुनियाद पर खड़ा मालूम होता है। लोगों की अंतरात्मा पर अब उसकी कोई पकड़ नहीं रही।
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20वीं सदी के महान विचारक तथा आध्यात्मिक गुरु ओशो रजनीश ने वर्तमान में सभी प्रचलित धर्मों के पाखंड को उजागर कर दुनियाभर के लोगों से दुश्मनी मोल ले ली थी।
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ज्‍योतिष का एक डायमेंशन है, एक आयाम है। फिर भविष्‍य को जानने के और आयाम भी हैं। मनुष्‍य के हाथ पर खींची हुई रेखाएं हैं,
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अध्यात्म जगत की चर्चा आचार्य रजनीश 'ओशो' के बिना अधूरी है। ओशो एक ऐसे संबुद्ध सदगुरु हैं जिन्होंने मानवीय चेतना को धर्म की रूढ़िवादी व बद्धमूल धारणाओं से मुक्त किया।
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कैसे हुई ओशो की मृत्यु? यह सवाल आज भी महत्वपूर्ण है। ओशो रजनीश को अमेरिका की सरकार ने जहर दिया था या कि उनके ही संन्यासियों ने विरासत के लिये या किसी अंतरराष्ट्रीय साजिश के तहत मार दिया था? यह सवाल आज भी अनुत्तरित है, लेकिन हम आपको बताएंगे जलता हुआ ...
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छठवां प्रश्न : ओशो, कहा जाता है कि रावण भी ब्रह्मज्ञानी था। क्या रावण भी रावण उसकी मर्जी से नहीं था? क्या रामलीला सच में ही राम की लीला थी?
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देखना, सुनना और सोचना यह तीन महत्वपूर्ण गतिविधियां हैं। इन तीनों के घालमेल से ही चित्र कल्पनाएं और विचार निर्मित होते रहते हैं। इन्हीं में स्मृतियां, इच्छाएं, कुंठाएं, भावनाएं आदि सभी 24 घंटे में अपना-अपना किरदार निभाते हुए निकलती जाती है। निरंतर यह ...
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तंत्र ने सेक्‍स को स्प्रिचुअल बनाने का दुनिया में सबसे पहला प्रयास किया था। खजुराहो में खड़े मंदिर, पुरी और कोणार्क के मंदिर सबूत हैं। कभी आपने खजुराहो की मूर्तियां देखी हों तो आपको दो बातें अद्भुत अनुभव होंगी। पहली बात तो यह है कि नग्‍न मैथुन की ...
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कामवासना का केंद्र सूर्य होता है। इसीलिए तो कामवासना व्यक्ति को इतना ऊष्ण और उत्तेजित कर देती है। जब कोई व्यक्ति कामवासना में उतरता है तो वह उत्तप्त से उत्तप्त होता चला जाता है। व्यक्ति कामवासना के प्रवाह में एक तरह से ज्वर-ग्रस्त हो जाता है, पसीने ...
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ओशो को हम क्या कहें- धर्मगुरु, संत, आचार्य, अवतारी, भगवान, मसीहा, प्रवचनकार, धर्म- विरोधी या फिर सेक्स गुरु? जो ओशो को नहीं जानते हैं और या जो ओशो को थोड़ा-बहुत ही जानते हैं उनके लिए ओशो उपरोक्त में से कुछ भी हो सकते हैं।
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जीवन को उत्सव बना लो -ओशो

शुक्रवार,सितम्बर 5, 2014
तुम जैसे हो, उससे अन्यथा होने की चेष्टा न करो। आंख में आंसू नहीं आते, क्या जरूरत है? सूखी हैं आंखें, सूखी भली। सूखी आंखों का भी मजा है। आंसू भरी आंखों का भी मजा है। और परमात्मा को सब तरह की आंखें चाहिए, क्योंकि परमात्मा वैविध्य में प्रकट होता है। ...
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मूर्ति-पूजा का सारा आधार इस बात पर है कि आपके मस्तिष्क में और विराट परमात्मा के मस्तिष्क में संबंध हैं। दोनों के संबंध को जोड़ने वाला बीच में एक सेतु चाहिए।
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जिन लोगों ने भी मूर्ति विकसित की होगी, उन लोगों ने जीवन के परम रहस्य के प्रति सेतु बनाया था...मूर्ति-पूजा शब्द सेल्फ कंट्राडिकटरी है। इसीलिए जो पूजा करता है वह हैरान होता है कि मूर्ति कहां? और जिसने कभी पूजा नहीं की वह कहता है कि इस पत्थर को रख कर ...
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