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ओशो रजनीश क्यों चाहते हैं कि रावण को मिले उचित सम्मान?

सोमवार,अक्टूबर 7, 2019
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आतंकवाद की घटना निश्चित रूप से उस सबसे जुड़ी है, जो समाज में हो रहा है। समाज बिखर रहा है। उसकी पुरानी व्यवस्था, अनुशासन, नैतिकता, धर्म सब कुछ गलत बुनियाद पर खड़ा मालूम होता है। लोगों की अंतरात्मा पर अब उसकी कोई पकड़ नहीं रही।
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20वीं सदी के महान विचारक तथा आध्यात्मिक गुरु ओशो रजनीश ने वर्तमान में सभी प्रचलित धर्मों के पाखंड को उजागर कर दुनियाभर के लोगों से दुश्मनी मोल ले ली थी।
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ज्‍योतिष का एक डायमेंशन है, एक आयाम है। फिर भविष्‍य को जानने के और आयाम भी हैं। मनुष्‍य के हाथ पर खींची हुई रेखाएं हैं,
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अध्यात्म जगत की चर्चा आचार्य रजनीश 'ओशो' के बिना अधूरी है। ओशो एक ऐसे संबुद्ध सदगुरु हैं जिन्होंने मानवीय चेतना को धर्म की रूढ़िवादी व बद्धमूल धारणाओं से मुक्त किया।
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कैसे हुई ओशो की मृत्यु? यह सवाल आज भी महत्वपूर्ण है। ओशो रजनीश को अमेरिका की सरकार ने जहर दिया था या कि उनके ही संन्यासियों ने विरासत के लिये या किसी अंतरराष्ट्रीय साजिश के तहत मार दिया था? यह सवाल आज भी अनुत्तरित है, लेकिन हम आपको बताएंगे जलता हुआ ...
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छठवां प्रश्न : ओशो, कहा जाता है कि रावण भी ब्रह्मज्ञानी था। क्या रावण भी रावण उसकी मर्जी से नहीं था? क्या रामलीला सच में ही राम की लीला थी?
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देखना, सुनना और सोचना यह तीन महत्वपूर्ण गतिविधियां हैं। इन तीनों के घालमेल से ही चित्र कल्पनाएं और विचार निर्मित होते रहते हैं। इन्हीं में स्मृतियां, इच्छाएं, कुंठाएं, भावनाएं आदि सभी 24 घंटे में अपना-अपना किरदार निभाते हुए निकलती जाती है। निरंतर यह ...
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आतंकवाद की घटना निश्चित रूप से उस सबसे जुड़ी है, जो समाज में हो रहा है। समाज बिखर रहा है। उसकी पुरानी व्यवस्था, अनुशासन, नैतिकता, धर्म सब कुछ गलत बुनियाद पर खड़ा मालूम होता है। लोगों की अंतरात्मा पर अब उसकी कोई पकड़ नहीं रही।
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तंत्र ने सेक्‍स को स्प्रिचुअल बनाने का दुनिया में सबसे पहला प्रयास किया था। खजुराहो में खड़े मंदिर, पुरी और कोणार्क के मंदिर सबूत हैं। कभी आपने खजुराहो की मूर्तियां देखी हों तो आपको दो बातें अद्भुत अनुभव होंगी। पहली बात तो यह है कि नग्‍न मैथुन की ...
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कामवासना का केंद्र सूर्य होता है। इसीलिए तो कामवासना व्यक्ति को इतना ऊष्ण और उत्तेजित कर देती है। जब कोई व्यक्ति कामवासना में उतरता है तो वह उत्तप्त से उत्तप्त होता चला जाता है। व्यक्ति कामवासना के प्रवाह में एक तरह से ज्वर-ग्रस्त हो जाता है, पसीने ...
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ओशो को हम क्या कहें- धर्मगुरु, संत, आचार्य, अवतारी, भगवान, मसीहा, प्रवचनकार, धर्म- विरोधी या फिर सेक्स गुरु? जो ओशो को नहीं जानते हैं और या जो ओशो को थोड़ा-बहुत ही जानते हैं उनके लिए ओशो उपरोक्त में से कुछ भी हो सकते हैं।
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जीवन को उत्सव बना लो -ओशो

शुक्रवार,सितम्बर 5, 2014
तुम जैसे हो, उससे अन्यथा होने की चेष्टा न करो। आंख में आंसू नहीं आते, क्या जरूरत है? सूखी हैं आंखें, सूखी भली। सूखी आंखों का भी मजा है। आंसू भरी आंखों का भी मजा है। और परमात्मा को सब तरह की आंखें चाहिए, क्योंकि परमात्मा वैविध्य में प्रकट होता है। ...
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मूर्ति-पूजा का सारा आधार इस बात पर है कि आपके मस्तिष्क में और विराट परमात्मा के मस्तिष्क में संबंध हैं। दोनों के संबंध को जोड़ने वाला बीच में एक सेतु चाहिए।
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जिन लोगों ने भी मूर्ति विकसित की होगी, उन लोगों ने जीवन के परम रहस्य के प्रति सेतु बनाया था...मूर्ति-पूजा शब्द सेल्फ कंट्राडिकटरी है। इसीलिए जो पूजा करता है वह हैरान होता है कि मूर्ति कहां? और जिसने कभी पूजा नहीं की वह कहता है कि इस पत्थर को रख कर ...
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ओशो रजनीश ने किसी विषय पर लेक्चर नहीं दिए, यह एक शोध का विषय हो सकता है। ओशो के विचारों के कारण दुनियाभर के साहित्य, फिल्म और सामाजिक विचारों में परिवर्तन स्वत: ही देखने को मिलता है, वहीं धर्म की परिभाषा अब बदल गई है।
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....तो इसे दो प्रकार से जाना जा सकता है। या तो प्रारब्‍ध को देखकर या फिर कुछ लक्षण और पूर्वाभास है जिन्‍हें देखकर जाना जा सकता है। उदाहरण के लिए, जब कोई व्‍यक्‍ति मरता है तो मरने के ठीक नौ महीने पहले कुछ न कुछ होता है। साधारणतया हम जागरूक नहीं होते ...
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भविष्‍य एकदम अनिश्‍चित नहीं है। हमारा ज्ञान अनिश्‍चित है। हमारा अज्ञान भारी है। भविष्‍य में हमें कुछ दिखाई नहीं पड़ता। हम अंधे हैं। भविष्‍य का हमें कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। नहीं दिखाई पड़ता है इसलिए हम कहते हैं कि निश्‍चित नहीं है लेकिन भविष्‍य में ...
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यह बहुत अच्‍छा हुआ कि जीसस और मोजेज (मूसा) दोनों की मृत्यु भारत में ही हुई। भारत न तो ईसाई है और न ही यहूदी। परंतु जो आदमी या जो परिवार इन कब्रों की देखभाल करते हैं वे यहूदी हैं। दोनों कब्रें भी यहूदी ढंग से बनी हैं। हिन्दू कब्र नहीं बनाते। मुसलमान ...
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यदि आपसे कहा जाए कि ईसा मसीह वहाँ गए थे जहाँ ओशो का जन्म होने वाला था तब शायद आप विश्वास नहीं करेंगे। लेकिन इस बात के सबूत हैं। आपसे यह कहा जाए कि ओशो के छुटपन से ही हरिप्रसाद चौरसिया उनके समक्ष बाँसुरी बजाते थे, तब शायद आप मान भी जाएँ। यह भी कि ...
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