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Written By WD Feature Desk
Last Updated : बुधवार, 10 दिसंबर 2025 (16:18 IST)

OSHO: ओशो जन्मोत्सव: रजनीश के संबंध में 10 दिलचस्प जानकारी

ओशो रजनीश
Osho Jayanti 2025: ओशो आचार्य रजनीश जिन्हें ओशो कहा जाता है। वे एक अत्यंत विवादास्पद और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु थे। उनका बचपन का नाम चन्द्र मोहन जैन था। उनका जन्मोत्सव हर साल 11 दिसंबर को मनाया जाता है। यहां ओशो से संबंधित 10 दिलचस्प जानकारियां दी गई हैं।
 
1. कारें और भौतिकवाद से प्रेम: ओशो को भौतिक वस्तुओं के प्रति अपने खुले प्रेम के लिए जाना जाता था, जो कई पारंपरिक संतों के विपरीत था। वह विशेष रूप से महंगी और लक्जरी कारों के शौकीन थे। उनके पास 90 से अधिक रोल्स-रॉयस (Rolls-Royce) कारों का संग्रह था, जिसे वे अपने शिष्यों द्वारा दान किए गए धन से खरीदते थे। यह भी कहा जाता है कि उन्हें उनके शिष्य ने कारें दान की थी। उनके पास उनके निजी विमान भी थे। वह अक्सर कहते थे कि भौतिक समृद्धि और आध्यात्मिकता एक दूसरे के विरोधी नहीं हैं। जोरबा दि बुद्धा इसी कांसेप्ट की एक सीरिज थी।
 
2. नाम परिवर्तन की यात्रा: ओशो का जन्म का नाम चन्द्र मोहन जैन था। उन्होंने अपने जीवनकाल में कई नाम अपनाए। वे शुरुआत में आचार्य रजनीश के नाम से जाने जाते थे। बाद में उन्होंने 'रजनीश' नाम को छोटा करके भगवान श्री रजनीश रखा। अंतिम और सबसे प्रसिद्ध नाम ओशो है, जो 'ओशनिक' (समुद्र जैसा) शब्द से लिया गया है, जिसका अर्थ है 'समुद्र में विलीन होने जैसा अनुभव'।
 
3. संयुक्त राज्य अमेरिका में 'ओशोपुरम' की स्थापना: ओशो 1980 के दशक में संयुक्त राज्य अमेरिका चले गए और ओरेगन राज्य में अपने हजारों शिष्यों के साथ एक बड़ा कम्यून (सामुदायिक नगर) स्थापित किया, जिसे रजनीशपुरम या ओशोपुरम कहा जाता था। यह कम्यून अपने समय में एक स्वायत्त शहर जैसा था, जिसकी अपनी पुलिस, अग्निशमन विभाग, बस प्रणाली, खाद्य उत्पादन और अर्थतंत्र था। ओशो के अमेरिकी प्रवास के दौरान उनकी सबसे प्रमुख और विवादास्पद सचिव मां आनंद शीला थीं। शीला ने रजनीशपुरम के दैनिक कार्यों और कानूनी मामलों को संभाला। लेकिन वह बाद में हत्या के प्रयास, धोखाधड़ी, और बायोटेरेरिज्म जैसे गंभीर आरोपों में फँसीं। उनके कृत्यों ने ओशो के समुदाय को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम किया। इस पूरे प्रकरण पर हाल ही में 'वाइल्ड वाइल्ड कंट्री' नामक प्रसिद्ध डॉक्यूमेंट्री भी बनी है।
 
4. 'गतिशील ध्यान' (Dynamic Meditation) के प्रणेता: पारंपरिक, स्थिर ध्यान के विपरीत, ओशो ने 'गतिशील ध्यान' (Dynamic Meditation) जैसी कई नई ध्यान तकनीकों का आविष्कार किया। यह तकनीकें पांच चरणों में होती हैं, जिनमें तेजी से सांस लेना, कैथार्सिस (भावनाओं को बाहर निकालना), कूदना, रुकना और अंत में नृत्य करना या शांत बैठना शामिल है। इसे सक्रिय ध्यान भी कहा गया। उनका मानना ​​था कि आधुनिक मनुष्य का मन इतना तनावग्रस्त है कि उसे शांति से बैठने से पहले अपनी दबी हुई ऊर्जा और तनाव को बाहर निकालने की आवश्यकता होती है। ओशो ने 150 से अधिक ध्यान विधियों की व्याख्या की। ध्यान योग प्रथम और अंतिम मुक्ति में इसका संकलन है। ओशो का कहना था कि प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक अलग ध्यान हो सकता है जिसे उसे ढूंढना होगा।
 
5. भारत और विदेश में निर्वासन: ओशो का जीवन विवादों से घिरा रहा। रजनीशपुरम में हुए विवादों के कारण, उन्हें संयुक्त राज्य अमेरिका से निर्वासित (deported) कर दिया गया। इसके बाद लगभग 21 देशों ने उन्हें प्रवेश देने से इनकार कर दिया। अंततः, उन्हें भारत लौटना पड़ा और उन्होंने अपने जीवन के अंतिम वर्ष पुणे, महाराष्ट्र में बिताए, जहां आज भी उनका आश्रम (ओशो इंटरनेशनल मेडिटेशन रिजॉर्ट) स्थित है।
 
6. दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर और सार्वजनिक वक्ता:सन्यासी बनने से पहले, ओशो ने एक अकादमिक जीवन जिया था। उन्होंने अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद जबलपुर विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र (Philosophy) के प्रोफेसर के रूप में कई वर्षों तक पढ़ाया। वह अपनी तीक्ष्ण बुद्धि और वक्तृत्व कौशल के लिए प्रसिद्ध थे और उन्हें सार्वजनिक वाद-विवादों और व्याख्यानों में भाग लेने के लिए जाना जाता था। ओशो ने भारत के प्राचीनतम और सबसे पवित्र माने जाने वाले ग्रंथों की आधुनिक, और अक्सर विवादास्पद, व्याख्याएं कीं। उन्होंने अष्टावक्र गीता, उपनिषद, भागवत गीता, और पतंजलि के योग सूत्रों पर व्यापक रूप से बात की। उन्होंने इन ग्रंथों को कर्मकांडों से अलग करके, उन्हें सीधे आज के मनुष्य के मनोवैज्ञानिक और अस्तित्वगत प्रश्नों से जोड़ा, जिससे उनकी शिक्षाएँ समकालीन श्रोताओं के बीच लोकप्रिय हुईं।
 
7. 600 से अधिक पुस्तकें और विशाल लाइब्रेरी: ओशो ने स्वयं कोई किताब नहीं लिखी, लेकिन उनके व्याख्यानों को उनके शिष्यों द्वारा ट्रांसक्रिप्ट किया गया और उन्हें संकलित करके 600 से अधिक पुस्तकों के रूप में प्रकाशित किया गया। उन्होंने जीवन के लगभग हर पहलू- योग, तंत्र, ज़ेन, सूफ़ीवाद, ईसाई धर्म, हिंदू धर्म, दर्शन, ज्ञान विज्ञान, समाजवाद, लोकतंत्र और राजनीति पर बात की। उन्हें पढ़ने का बहुत शौक था और उनके पास 1,00,000 से अधिक पुस्तकों का एक विशाल निजी संग्रह था, जिसे वे दुनिया की बेहतरीन निजी लाइब्रेरी मानते थे। 
 
8. पुणे आश्रम का अंतर्राष्ट्रीय केंद्र: ओशो ने अपने जीवन का अधिकांश समय पुणे, भारत में बिताया। उनका पुणे आश्रम, जिसे अब ओशो इंटरनेशनल मेडिटेशन रिजॉर्ट कहा जाता है, एक आधुनिक और विश्वस्तरीय ध्यान केंद्र है। यह 'रिजॉर्ट' विश्वभर के लोगों को आकर्षित करता है, जो ध्यान और व्यक्तिगत विकास की विभिन्न तकनीकों का अभ्यास करने आते हैं। यह अपनी कठोर अनुशासन और विशिष्ट, सफेद रंग के वस्त्र (रोब) वाली व्यवस्था के लिए जाना जाता है।
 
9. न्यायालयों और मीडिया से लगातार विवाद: ओशो को उनके अपरंपरागत विचारों और जीवनशैली के कारण हमेशा भारतीय और पश्चिमी दोनों मीडिया तथा कानूनी व्यवस्थाओं से विवादों का सामना करना पड़ा। उनके व्याख्यान, जिनमें उन्होंने यौन स्वतंत्रता, विवाह का विरोध और भौतिकवाद को स्वीकार करने जैसे विषयों पर बात की, अक्सर सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ते थे, जिसके कारण उन्हें 'सेक्स गुरु' और 'विवादास्पद गुरु' जैसे विशेषण दिए गए। उनके कम्यून (रजनीशपुरम) की कानूनी और राजनीतिक लड़ाइयाँ आज भी विवादास्पद इतिहास का हिस्सा हैं।
 
10. संन्यास का बदलता रूप: ओशो ने एक नई प्रकार की मानवता का आह्वान किया, जिसे उन्होंने 'ज़ोरबा द बुद्ध' कहा। यह उनके दर्शन का केंद्रीय विचार है। ज़ोरबा (Zorba): इसका तात्पर्य उस व्यक्ति से है जो पूर्णतः जीवन, संगीत, नृत्य, और भौतिक सुखों का आनंद लेता है (निकोस कज़ांटज़ाकिस के उपन्यास 'ज़ोरबा द ग्रीक' से प्रेरित)। बुद्ध (The Buddha): इसका तात्पर्य उस व्यक्ति से है जो आध्यात्मिक जागरूकता, शांति और आत्मज्ञान प्राप्त कर चुका है। ओशो का मानना था कि एक सच्चा मनुष्य वह है जो ज़ोरबा का उल्लास (बाह्य जीवन का आनंद) और बुद्ध की शांति (आंतरिक जागरूकता) दोनों को संतुलित करता है।
 
ओशो ने संन्यास की पारंपरिक अवधारणा को पूरी तरह से बदल दिया। पारंपरिक भारतीय संन्यासी सब कुछ त्यागकर जंगल या एकांत में जाते हैं, लेकिन ओशो ने अपने शिष्यों को 'नया संन्यासी' कहा। उनके संन्यासी सामान्य जीवन जीते थे (काम करते थे, शादी करते थे), लेकिन वे 'जागरूकता' और ध्यान को प्राथमिकता देते थे।
 
शुरुआत में, उनके संन्यासियों को गेरुआ (भगवा) वस्त्र पहनना और गले में माला (जिस पर ओशो की फोटो होती थी) पहनना अनिवार्य था, जो दुनिया में रहते हुए भी संन्यासी होने का प्रतीक था। हालांकि अब यह अनिवार्य नहीं है।

समाधि:
ओशो का निधन 19 जनवरी 1990 को पुणे में हुआ था। उनकी मृत्यु का आधिकारिक कारण हृदय गति रुकना बताया गया। हालांकि, उनके शिष्यों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि अमेरिका द्वारा उन्हें निर्वासित किए जाने के दौरान दिए गए धीमे जहर (slow poison) के कारण उनकी मृत्यु हुई थी। उनकी समाधि पर एक संक्षिप्त शिलालेख खुदा हुआ है:- "OSHO Never Born, Never Died Only Visited this Planet Earth between 11 December 1931 – 19 January 1990"

संकलन: अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'
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