- हमने भारत को बना लिया, अब भारतीय बनाना होगा, संविधान इसका सबसे बेहतर तरीका है
-
खुद से सवाल है : हम संविधान को कितना पीछे छोड़ आए हैं
-
हमारी सरकारों का संवैधानिक मूल्यों से ज्यादा सामाजिक और धार्मिक मूल्यों पर जोर है
-
जैसे युद्ध की तैयारी होती है वैसे ही संवाद की तैयारी होती है
-
हमें स्वास्थ्य सेवाएं बचाएंगी या हेल्थ एंश्योरेंस?
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायल के पीएम बेंजामिन नेत्यनाहू की नीतियों ने दुनिया को तीसरे विश्वयुद्ध की चौखट पर लाकर खड़ा कर दिया है। ईरान, यूक्रेन, वेनेजुएला समेत दुनिया के कई देश युद्ध की इस आंच में झुलसने लगे हैं। तकरीबन पूरी दुनिया ही युद्ध के मुहाने पर आकर खड़ी हो गई है।
इस विनाशकारी पटकथा के पीछे दरअसल अमेरिका जैसी वैश्विक शक्तियों के दूसरे देशों के प्रति आक्रामक रवैये और मनमानी है। हिंसा और बदले की इस भावना के पीछे की सबसे बड़ी वजह संवैधानिक मूल्यों की अनदेखी है। दुनिया के भूगोल पर नजर डालें तो ज्यादातर देशों में लोकतंत्र और संवैधानिक मूल्य हाशिए पर नजर आते हैं। मैं कहता हूं— यह वो वक्त है जब हमें संविधान की एक कॉपी लेकर युद्धों के मैदान में किसी विनाशकारी तोप के सामने खड़े हो जाना चाहिए। हमारे लिए युद्ध का मैदान हमारा सिस्टम है। वो जगह है, जहां हम रहते हैं और जहां काम करते हैं। इसकी शुरुआत यहीं से करनी चाहिए।
इस भयावह वक्त में महात्मा गांधी की एक पंक्ति किसी जलती हुई मशाल की तरह याद आती है। गांधी ने कहा था —
प्रेम और अहिंसा की शक्ति कभी निष्फल नहीं होती। प्रेम कभी दावा नहीं करता— वह हमेशा देता है। प्रेम हमेशा कष्ट सहता है— कभी झुंझलाता नहीं, कभी अपना बदला नहीं लेता। जहां प्रेम है— वहां जीवन है। घृणा, विनाश की ओर ले जाती है। जबकि प्रेम की शक्ति कभी निष्फल नहीं होती—
गांधी के इस कथन का जिक्र
विकास संवाद की इस कार्यशाला में भी हुआ। यह कथन पूरी दुनिया को एक सूत्र में बांधने- पिरोने के लिए काफी है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में लोकतंत्र और संवैधानिक मूल्यों की तरफ से आंखें मूंद ली गईं हैं और संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ काम करने वाली ताकतें लगातार उभरती जा रही हैं।
विकास संवाद का मंच- उम्मीद की एक लौ : हालांकि ऐसे भयावह समय में भी यदि किसी मंच पर संवैधानिक मूल्यों की बात हो रही हो। मूल्यों की प्रासंगिकता का महत्व बताया जा रहा हो और उन्हें जीवन में अपनाने पर चिंतन किया जा रहा हो तो एक उम्मीद तो बंधती है कि कहीं किसी कोने में कुछ लोग हैं, जो अब भी उस संविधान की आत्मा में यकीन करते हैं जो किसी राष्ट्र के हर आदमी को नागरिक बनाने, उसे न्याय दिलाने, समानता का हक दिलाने, उसे मुख्यधारा में लाने और उसकी गरिमा को बचाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है।
...तो कहां टिका होता हमारा देश : मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में विकास संवाद के इस मंच पर तीन दिनों की संविधान और संवैधानिक मूल्यों पर चिंतन को सुनकर मुझे यह महसूस होने लगा है कि एक राष्ट्र को परिभाषित करने के लिए संविधान अब तक की सबसे ताकतवर किताब है। बावजूद इसके कि मैं कई नॉवेल, कहानियों और कविताओं की किताबें पढ़ चुका हूं मुझे संविधान की प्रस्तावना भीतर तक झकझोर देती है और यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि अगर संविधान की यह किताब नहीं होती तो वो क्या चीज है— जिस पर हमारा ये राष्ट्र टिका होता। क्या हम यह उम्मीद कर सकते हैं कि संविधान नहीं होता तो हमारा देश किसी धार्मिक ग्रंथ या सामाजिक विचारधारा की नींव टिका होता— या टिका रह सकता?
संविधान किसी एक व्यक्ति की सनक नहीं थी : गांधीवादी विचारक चिन्मय मिश्र ने इस मंच पर कहा कि भारत में संविधान का गठन किसी एक आदमी की या कुछ चुनिंदा लोगों की इच्छा या सनक नहीं थी। यह एक राष्ट्र के निर्माण की आधारभूत प्रक्रिया थी, जिससे राष्ट्र बना, संसदीय प्रणाली का विकास हुआ। हमें संविधान के गठन की प्रक्रिया को समझना होगा। उन लोगों को समझना होगा, जिन्होंने इसका गठन किया और जिन्होंने इसकी आलोचना की और इसकी राह में बाधा पैदा कीं।
आक्रामक और ठोस होती विभाजनकारी तस्वीरें : जिस मंशा के साथ संविधान का गठन हुआ था, जाहिर है इसका मकसद देश के हर तबके, हर आदमी, हर धर्म, संप्रदाय और हर लिंग के व्यक्ति को एक पंक्ति में, एक जगह लाकर खड़ा करना था। लेकिन तब से लेकर अब तक देश में विभाजनकारी खाई की तस्वीरें जिस तरह से ठोस और आक्रामक होती जा रही हैं— वो हर उस आदमी के माथे पर शिकन डाल रही है जो संविधान और सभी के लिए एक समान— एक जैसे राष्ट्र की अवधारणा में विश्वास करता है। क्योंकि जयादातर मामलों में स्थितियां ठीक संविधान के मूल्य और संवैधानिक दायरों के खिलाफ हैं।
विकास संवाद की मैत्री फैलोशिप की इस तीन दिवसीय कार्यशाला के बाद संविधान और संवैधानिक मूल्यों पर हमे खुद से सवाल करना चाहिए कि हमारी चेतना कितनी जाग्रत हुई— या कितनी जाग्रत होने की गुंजाईश इस चेतना में बची है, क्योंकि वर्तमान में जो तस्वीर है वो साफतौर से हमारे सामने है और हमें चिंता में डालती नजर आ रही है।
संविधान दुनिया की सबसे सुंदर किताब : चिन्मय मिश्र कहते हैं कि संविधान दुनिया की सबसे सुंदर किताब है, जिसके केंद्र में व्यक्ति है, कोई धर्म नहीं। इसमें मनुष्य के सम्मान, गरिमा और उसके लिए न्याय की बात है। लेकिन यह बहुत भयानक है कि इस दौर है जब हम 40 लोग यहां बैठकर संविधान के मूल्यों पर चिंतन कर रहे हैं, ठीक उसी वक्त हमारी सरकारें संविधान के मूल्यों के बजाए सामाजिक और धार्मिक मूल्यों पर जोर दे रही हैं।
ठीक इसी जगह मैं कहना चाहता हूं— संविधान दुनिया की सबसे ताकतवर किताब है— युद्धों को रोकने के लिए हमें इसे लेकर किसी तोप के आगे खड़े हो जाना चाहिए।
क्या कोई संस्था है जहां मूल्यों का पालन हो रहा है : ऐसी कोई जगह नहीं जहां संवैधानिक मूल्यों का हनन नहीं हो रहा है। स्वास्थ्य की बात करें तो आज हमारी केंद्र और राज्य सरकारें आम आदमी को स्वास्थ्य सेवाएं देने के बजाए इंश्योरेंस का झुनझुना पकड़ा रही है। किसी आदमी को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं बचाएगी या इंश्योरेंस बचाएगा। शिक्षा में वही हाल है। राजनीति में शूचिता नहीं बची है। सामाजिक मूल्य दरक रहे हैं। मनुष्य का नैतिक पतन हो रहा है क्योंकि वो संविधान से लगातार दूर होता जा रहा है। अंतत: जो सिस्टम बन चुका है उसे देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि हम अपनी संविधान की किताब को कितना पीछे छोड़ आए हैं। ये वो वक्त है जब हमे सोचना होगा कि क्या देश में कोई ऐसी ईकाई या संस्था है जहां संवैधानिक मूल्यों का पालन हो रहा है?
विभाजनकारी ताकतों को कैसे याद दिलाया जाए : विश्व युद्ध की आहट पर कांप रहे दुनिया के इस भूगोल को ध्यान से देखते हुए हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि क्या हकीकत में भारत से लेकर दुनिया तक कहीं संवैधानिक मूल्यों का पालन हो रहा है। अगर नहीं तो कैसे उन विभाजनकारी और खाइयां पैदा करने वाली ताकतों को याद दिलाया जाए कि कोई देश, कोई राज्य, कोई सिस्टम या संस्था ऐसे नहीं चलेंगे। सवाल यह है कि आखिर पूरी दुनिया में यह सवाल क्यों नहीं उठ रहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप संविधान के मुताबिक व्यवहार कर रहे हैं या नहीं? जो हिटलर ने किया था क्या वो संवैधानिक था? ईरान, फिलिस्तन और अफगानिस्तान की स्थितियां हमारे सामने हैं ही।
गांधी, टैगोर और टॉल्सटाय की दृष्टि में दुनिया : ऐसा नहीं है कि दुनिया में पहले कभी किसी देश ने न्याय, समता, समानता, गरिमा और स्वतंत्रता की लड़ाई नहीं लड़ी। सारी दुनिया में आजादी की लड़ाई लड़ी गई। किसी भी राष्ट्र का उदय बगैर खून खराबे के नहीं होता। भारत को विभाजन का दंश झेलना पड़ा। कई हत्याएं हुईं। सांप्रदायिक सौहार्द खराब हुआ। पाकिस्तान बना। पाकिस्तान से बांग्लादेश बना। दुनिया में हर जगह राष्ट्र– राज्य का दर्जा हासिल करने के लिए बलिदान देना पड़े हैं। इस बलिदान के लिए संविधान को जानना और समझना बेहद जरूरी है। हमें अपने पुरखों की व्यापक दृष्टि की तरफ लौटना होगा। हमें दुनिया को गांधी, टैगोर, विनोबा, लिओ टॉल्सटाय, लाओत्से की दृष्टि से देखना होगा। दुनिया को बचाने के लिए, अपने राष्ट्र को सुरक्षित रखने के लिए उसी व्यापक और वैश्विक दृष्टि से देखना होगा, जिस दृष्टि से हमारे ये पुरखे अब तक हमें, समाज को और देश को देखते आए हैं।
साहित्य, संगीत और कला भी एक उम्मीद : संवाद के तमाम सत्रों में वक्ताओं को सुनकर मैं यह महसूस कर पा रहा हूं कि जब तक हम मनुष्य को नागरिक और उससे भी ज्यादा इंसान बनाने की प्रक्रिया के करीब नहीं लेकर आएंगे, तब तक हम अपने आसपास लगातार संवैधानिक मूल्यों का हनन होता देखने के लिए मजबूर होते रहेंगे। संविधान के साथ ही कला, संगीत और साहित्य ऐसे एलीमेंट्स हैं, जो मनुष्य को बेहतर मनुष्य और इंसान को ज्यादा इंसान बनाने के करीब लेकर जाते हैं। ये सारे एलीमेंट्स मनुष्य को संवेदनशील बनाने के लिए अनिवार्य शर्तें हैं, और जब तक मनुष्य अपने आसपास की चीजों, अपने आसपास के जीवों और प्रकृति के प्रति संवेदनशील नहीं होगा तो वह संविधान के प्रति भी संवेदनशील नहीं हो सकेगा। कला, संगीत और साहित्य के अलावा एक और जिस आधार नागरिक को भारतीय नागरिक बनाने के लिए जरूरी है वो सोच का वैज्ञानिक और विश्लेषणात्मक आधार भी है, जिसके बारे में
संविधान के विशेषज्ञ सचिन कुमार जैन ज्यादा बेहतर तरीके से रौशनी डालते हैं।
सोच और आस्था का वैज्ञानिक आधार : विकास संवाद के प्रमुख सचिन कुमार जैन मनुष्य की सोच और आस्था पर सवाल उठाते हैं। उनका फोकस विश्लेषणात्मक सोच पर है। हम अपनी चिरपरिचत मान्यताओं, आस्थाओं और चले आ रहे पूर्वाग्रहों को आंख मूंदकर नहीं मान सकते। हमें एक बेहतर और संपूर्ण नागरिक बनने के लिए संविधान में विश्लेषणात्मक और वैज्ञानिक तथ्यों को शामिल करना होगा, तभी हम संविधान के साथ पूरी तरह से न्याय कर पाएंगे।
सचिन कुमार जैन कहते हैं कि सूचना या जानकारी और आस्था में फर्क होता है। कई बार जानकारी होने के बाद अस्था बनती है। जबकि कई बार पहले आस्था आकार लेती है। हमारी किताबें, हमारे ग्रंथ, कुल, परंपरा और परिवार में चली आ रही मान्यताओं को हम अपनी आस्था बना लेते हैं। वो कहते हैं कि बिल्ली रास्ता काट जाती तो हम किसी दूसरे के रास्ते से गुजरने की प्रतीक्षा करते हैं। सवाल यह है कि क्या बिल्ली के रास्ता काटने पर किसी हानि का कोई वैज्ञानिक आधार है। क्या कभी हमने इस पर सवाल उठाया? क्या यह सही है कि हम पहले से चली आ रही मान्यताओं के आधार पर अपना जीवन गढ़ लें और उस पर चलते रहें?
क्या हमारी कोई साइंटिफिक एप्रोच है : सचिन जी कहते हैं कि हमारी बहुत सी आस्थाएं मिथकों की वजह से आती हैं— क्या उन्हें लेकर हमारी कोई साइंटिफिक एप्रोच है? धार्मिक अंधेपन, मान्यताएं, मिथकों और सामाजिक मूल्यों की क्रांति वाले इस दौर में सचिन कुमार जैन के सवाल बेहद जायज लगते हैं। अगर हम इनमें कहीं भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण को शामिल नहीं करें तो यह पूरा का पूरा जीवन एक झूठा जीवन महसूस होगा। महसूस होता है कि कई सदियों से हम अपनी आंखों पर एक ऐसे भ्रम की परत डालकर जिए जा रहे हैं जो कभी भी सत्य और वैज्ञानिक आधार पर हमें चीजों को नहीं देखने देगा। इसलिए वे सोच के विश्लेषणात्मक एप्रोच पर जोर डालते हैं और सत्य की खोज, विवेकशीलता, जिज्ञासु, तर्क करने में विश्वास, विचारों में खुलापन और पूर्वाग्रह व धारणाओं से मुक्ति के लिए साधन पर बात करते हैं। जिसे जानकर और सुनकर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि मनुष्य होने की कितनी असीमित और अनंत संभावनाएं मौजूद है, जिसे हमने कभी जानने खोजने की कोशिश ही नहीं की। लब्बोलुआब यह है कि जब हम वैज्ञानिक सोच के आधार पर अपना जीवन जीने की कोशिश करेंगे तो संविधान के मूल्यों के ज्यादा करीब जा सकेंगे। सवाल है कि क्या हम अपनी मान्यताओं और बंधी बंधाई और रटी रटाई आस्थाओं के आगे जाकर अपने होने की संभावनाओं को टटोल रहे हैं?
जैसे युद्ध की तैयारी, वैसी ही संवाद की तैयारी : कम्युनिकेश विशेषज्ञ अमन मदान ने संवाद के तरीकों, विवाद, सहमति, असहमति और संवाद में टकराव पर वैज्ञानिक और व्यवहारिक प्रैक्टिस करवाई। यह प्रैक्टिस एक तरह से पर्सनलिटी डेवलेपमेंट का हिस्सा रही। अपनी बात को बेहतर और प्रभावशाली तरीके से कहने के साथ ही उसमें कैसे गरिमा बनी रहे, कैसे बात टारगेट तक पहुंच जाए यह सीखना दिलचस्प रहा। एक जर्नलिस्ट और वकील के व्यवसाय में बेहतर और कामयाब कम्युनिकेश कितना जरूरी है यह अमन मदानजी की क्लास में सीखने को मिला। वे कहते हैं जैसे युद्ध की तैयारी होती है, वैसी ही संवाद की तैयारी होना चाहिए। बातों के तरीके, डांटना, स्नेह से बोलना, आक्रामक और विनम्र होना, शब्दों और भाषा का चयन, और बॉडी लैंग्वेज यह सारे एलिमेंट कितने महत्वपूर्ण और व्यवहारिक हैं यह जानना जरूरी था।
मीडिया के एजेंडे और जर्नलिस्ट के पूर्वाग्रह व एथिक्स : पत्रकार और विकास संवाद की पूजा सिंह ने जर्नलिज्म के एथिक्स से पत्रकारों को रूबरू कराया। उन्होंने भाषा, हैडिंग, खबर और खबरों इस्तेमाल किए जाने वाले धर्म, जाति सूचक और लिंग संबंधी भेद के बारे में बहुत ही अच्छी तरह से उदाहरणों के साथ अपने तर्क रखे जो किसी भी पत्रकार के लिए आंखें खोलने वाले थे। दरअसल खबरों में सटिकता और धारणा व पूर्वाग्रह के बीच बेहद ही महीन सी रेखा होती है, जिसे हम लिखते समय भूल जाते हैं,
पूजा सिंह ने उसी फर्क को महसूस करवाया। उन्होंने बताया कि खबरें लिखते समय कैसे हम धारणा और पूर्वाग्रहों का शिकार हो जाते हैं और कैसे उनसे बचना है। कैसे संविधान के दायरे में रहते हुए हमें जर्नलिज्म के एथिक्स का पालन करना है। उन्होंने समझाया कि कैसे मीडिया की भूमिका और उसमें पक्षपात लोगों को प्रभावित करते हैं। कैसे मीडिया के एजेंडे काम करते हैं और कैसे मीडिया महिलाओं की छवि को धूमिल करने का काम करता है।
पत्रकार और वकील के लिए संविधान का महत्व : एडवोकेट
प्रत्युष मिश्र ने संविधान, मौलिक अधिकार, कर्तव्य के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि संविधान की जानकारी एक पत्रकार और वकील दोनों के लिए कितने जरूरी हैं। इनके दायरे में रहकर क्या कुछ नहीं किया जा सकता है।
भोपाल गैस कांड पीड़ितों को मुआवजा दिलाने से लेकर नर्मदा यात्रा करने और आदिवासियों के साथ रहकर उनके जीवन को समझने वाले
विभुति नारायण झा का मार्गदर्शन सभी के लिए प्रेरित करने वाला था।
डॉ जतिन ललित ने पठन पाठन, किताबों के महत्व और नवाचार की कुछ एक्सरसाइज से कई तरीकों से सीख दीं।
पंकज शुक्ल का फिनिशिंग टच : अंत में इस पूरे संवाद सत्र को गढने, सहेजने, संभालने के बाद उसे कई जरूरी हिदायतों, सलाह और मार्गदर्शन से विराम देने में सबसे जरूरी भूमिका विकास संवाद के जरूरी किरदार पत्रकार और कवि- लेखक पंकज शुक्ल की रही। सारे सत्रों के बाद एक बेहतरीन सीख के साथ उनका अंतिम नोट किसी मंझे हुए कलाकार के फिनिशिंग टच की तरह रहा। उनका सभी साथियों को एक तार में पिरोए रखना और बातों- बातों में अनुशासन सीखा देना किसी कला से कम नजर नहीं आता है। अगर सीखना है कि संविधान के मूल्यों को अपने व्यवहार और चरित्र में कैसे शामिल करना है तो उन्हें काम करते हुए देखा जाना चाहिए।
शुक्रिया विकास संवाद।