नेशनल तौहीद जमात और श्रीलंका में पनपता कट्टरपंथ

पुनः संशोधित बुधवार, 24 अप्रैल 2019 (11:18 IST)
श्रीलंका में हुए बम धमाकों का आरोप पर है। ये नया कट्टरपंथी संगठन है। पिछले सालों में श्रीलंका में और मुस्लिमों में टकराव बढ़ा है जिससे कट्टरता बढ़ती जा रही है। क्या है इसकी पूरी कहानी, जानते हैं।

श्रीलंका में ईस्टर के मौके पर हुए बम धमाकों में 300 से ज्यादा लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है। मारे गए लोगों में 40 से भी अधिक विदेशी नागरिक हैं जिनमें कई भारतीय भी शामिल हैं। श्रीलंका सरकार का कहना है कि इन धमाकों में चरमपंथी समूह नेशनल तौहीद जमात का हाथ है। इसे किसी बाहरी आतंकी समूह से मदद मिली थी। इस्लामिक स्टेट ने भी इन धमाकों की जिम्मेदारी ली है। ऐसे में अनुमान लगाया जा रहा है कि तौहीद जमात और इस्लामिक स्टेट ने मिलकर ये धमाके किए हैं। आत्मघाती हमले करने वाले आतंकी श्रीलंकाई नागरिक थे। पुलिस ने करीब 40 संदिग्धों को गिरफ्तार किया है जिसमें एक सीरियाई नागरिक शामिल है।

क्या है नेशनल तौहीद जमात?
नेशनल तौहीद जमात श्रीलंका के लिए एक नया चरमपंथी संगठन है। इसको श्रीलंका तौहीद जमात से अलग हुआ एक उग्रवादी संगठन माना जाता है। श्रीलंका तौहीद जमात के सचिव अब्दुल राजिक को बौद्ध लोगों के खिलाफ भड़काऊ भाषण देने के मामले में 2016 में गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद उन्होंने इन भाषणों के लिए माफी मांगी थी। नेशनल तौहीद जमात में तौहीद शब्द का अर्थ ईश्वर सिर्फ एक है यानी बस अल्लाह है। जमात शब्द का अर्थ लोगों का समूह होता है। ऐसे में इसके नाम का मतलब सिर्फ अल्लाह को मानने वाले लोगों का समूह है। ये इस्लाम के कट्टरपंथी बहावी विचारधारा से जुड़ा हुआ है। नेशनल तौहीद जमात की विचारधारा इस्लामिक स्टेट से मिलती है।

पहली बार नेशनल तौहीद जमात (एनटीजे) का नाम 2017 में सामने आया था। 2015 के चुनावों में महिंदा राजपक्षे की हार के बाद सुस्त पड़ गए बौद्ध कट्टरपंथी संगठन बोदू बाला सेना ने फिर से अपना विरोधी अभियान शुरू किया। ऐसे में श्रीलंका तौहीद जमात से अलग होकर एक नया चरमपंथी धड़ा एनटीजे बना। 26 दिसंबर, 2018 को केगाले जिले के मवानेला में हथौड़ा और दूसरे औजार लेकर आए बाइकसवारों ने बुद्ध की कुछ मूर्तियां तोड़ी थीं। पुलिस ने तब सात लोगों को इस आरोप में गिरफ्तार किया जिन्होंने खुद को एनटीजे से जुड़ा बताया। इसी संगठन से जुड़े दो और लोगों की तलाश करते हुए पुलिस को कोलंबो के पुत्तलम जिले के एक नारियल के खेत में भारी मात्रा में विस्फोटक मिला था। पुलिस ने इसी संगठन से जुड़े चार और लोगों को इस जगह से गिरफ्तार किया था। तब से नेशनल तौहीद जमात को एक हिंसक चरमपंथी संगठन के रूप में पहचान मिली।

श्रीलंका में कैसे बढ़ रहा है मुस्लिम-बौद्ध संघर्ष
श्रीलंका की कुल जनसंख्या करीब 2 करोड़ 10 लाख है। इसमें लगभग 10 प्रतिशत मुस्लिम हैं। 70 प्रतिशत सिंघली-बौद्ध, 12।6 प्रतिशत तमिल हिन्दू और करीब सात प्रतिशत ईसाई हैं। 1990 के बाद वहाबी संप्रदाय का असर बढ़ने के साथ श्रीलंका में इस्लामी कट्टरपंथ बढ़ने लगा। पूर्वी श्रीलंका के मुस्लिम बहुतायत वाले बट्टीकलोआ और अंपारा जिलों में यह तेजी से फैला। श्रीलंका के मुस्लिम अधिकांशतः तमिलभाषी हैं। 1987 से पहले ये एलटीटीई का भी समर्थन करते थे। 1987 में भारतीय सेनाओं के श्रीलंका पहुंचने के बाद एलटीटीई को शक हुआ कि मुस्लिम भारतीय सेना के लिए मुखबिरी कर रहे हैं। ऐसे में एलटीटीई ने मुस्लिमों से संबंध खत्म कर लिए। एक रात में ही जाफना से लगभग 90,000 मुस्लिमों को बेघर कर दिया गया। इन लोगों को शरणार्थी कैंपों में रखा गया। कुछ लोग अभी भी इन कैंपों में रहते हैं।

श्रीलंका में श्रीलंकन मुस्लिम कांग्रेस नाम की पार्टी ने मुस्लिमों के लिए अलग राज्य की मांग की। लेकिन बाकी तमिल लोगों ने इसका समर्थन नहीं किया। इसके चलते ही एलटीटीई ने 90 के दशक की शुरुआत में कट्टनकुड़ी की दो मस्जिदों पर हमला कर सैंकड़ों लोगों को मार दिया था। इसके बाद वहां कई नई मस्जिदें बन गईं। कहा जाता है इन्हें बनाने का पैसा सऊदी अरब से आया था। इसके साथ ही पूर्वी श्रीलंका के मुस्लिमों की बोली में अरबी के शब्द भी आने लगे। यहां से वहाबी संप्रदाय का असर बढ़ना शुरू हुआ। 2009 में एलटीटीई के खात्मे के बाद बौद्ध कट्टरपंथियों ने तमिलों पर अपना बर्चस्व बनाने की कोशिश की। इस कोशिश में बौद्ध और मुस्लिमों के बीच टकराव शुरू हुआ। 2013 के बाद श्रीलंका में हर साल कई बड़ी मुस्लिम विरोधी घटनाएं होने लगी। पिछले साल मार्च में सोशल मीडिया पर फैली अफवाहों के बाद बड़ी संख्या में बौद्ध और मुस्लिमों के बीच टकराव हुआ। इसके चलते श्रीलंका में एलटीटीई के खात्मे के बाद पहली बार इमरजेंसी लगाई गई।

फिर पनपता गया एनटीजे
ऐसी घटनाओं के बाद मुस्लिमों में भी चरमपंथियों की संख्या बढ़ती गई। श्रीलंका की सरकार के मुताबिक 32 युवक अब तक आईएस में शामिल हो गए हैं। इनमें से अधिकतर अच्छे परिवारों से थे। श्रीलंका के पड़ोसी देश मालदीव से 200 युवक दिसबंर, 2015 तक आईएस में शामिल हो चुके थे। सिर्फ साढ़े चार लाख जनसंख्या वाले मालदीव से इतनी बड़ी संख्या में युवाओं का जाना दक्षिण एशियाई देशों के लिए चिंताजनक है। भारत से भी करीब 100 युवक जाकर आईएस से जुड़े थे। हालांकि एनटीजे का विरोध श्रीलंकाई मुस्लिमों में भी है। पीस लविंग मुस्लिम्स इन श्रीलंका (PLMMSL) नाम के संगठन ने यूएन और श्रीलंका के राष्ट्रपति को पत्र लिखकर कहा था कि यह संगठन देश में असहिष्णुता फैलाने का काम कर रहा है। ऐसे में इस पर प्रतिबंध लगना चाहिए।

क्या इसका तमिलनाडु तौहीद जमात से कोई रिश्ता है
तमिलनाडु में नेशनल तौहीद जमात से मिलते जुलते नाम का तमिलनाडु तौहीद जमात का एक संगठन है। श्रीलंका में हुए विस्फोटों के बाद भारतीय मीडिया में इस संगठन का नाम भी उछला। इस संगठन के महासचिव ई मोहम्मद ने कहा कि यह संगठन 30 साल से सक्रिय है और इसका रजिस्ट्रेशन 15 साल पहले 2004 में किया गया। इसके संस्थापक पी जैनुबलादीन थे लेकिन उन्हें सिद्धांतो से भटकने के कारण पद से हटा दिया गया। इस संगठन के आठ लाख सदस्य हैं।

मोहम्मद के मुताबिक उनका संगठन लोगों को आतंकवाद के खिलाफ लड़ने की शिक्षा देता है। इसके लिए वो छह महीने से तमिलनाडु में क्लास चला रहे हैं। उनका कहना है कि श्रीलंका में हुए धमाके उनकी विचारधारा के खिलाफ हैं। नेशनल तौहीद जमात से उनका कोई लेना देना नहीं है। श्रीलंका तौहीद जमात उनका साथी संगठन है जो वहां की सरकार के साथ काम करता है। इन धमाकों के बाद भी इस संगठन ने घायलों के लिए रक्तदान किया था। तमिलनाडु तौहीद जमात बच्चों को पढ़ाने और जरूरतमंदों की मदद का काम करता है। चेन्नई में आई बाढ़ में संगठन के लोगों ने पीड़ितों की मदद की थी।

रिपोर्ट ऋषभ कुमार शर्मा

 

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