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Last Modified: मंगलवार, 3 मार्च 2026 (13:50 IST)

खत्म होने वाला है US-इसराइली सुरक्षा कवच? पलट सकती है जंग की बाजी

Middle East Crisis
Iran Israel War: मध्य पूर्व (Middle East) सुलग रहा है। अमेरिका और इसराइल द्वारा ईरान पर किए गए चौतरफा हमलों के बीच अब एक ऐसी रिपोर्ट सामने आई है जिसने सैन्य विशेषज्ञों की नींद उड़ा दी है। खबर है कि ईरान की मिसाइलों को हवा में ही मार गिराने वाली 'इंटरसेप्टर मिसाइलों' का स्टॉक खत्म होने की कगार पर है। अगर ऐसा हुआ, तो ईरान के घातक ड्रोन और मिसाइलें सीधे इसराइली शहरों को निशाना बना सकती हैं।

4 दिन का स्टॉक और 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी'

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा घोषित "ऑपरेशन एपिक फ्यूरी" अपने चौथे दिन में है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि इसराइल और अमेरिका के पास अब मात्र 4 दिनों के इंटरसेप्टर बचे हैं। वहीं, खाड़ी देशों (UAE, कतर, कुवैत) के पास यह बैकअप केवल 2 से 3 दिनों का है।
 
28 फरवरी को शुरू हुई इस जंग में अब तक:
  • ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई समेत शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाया गया है।
  • ईरान ने जवाब में इसराइल और पड़ोसी खाड़ी देशों पर 250 से अधिक बैलिस्टिक मिसाइलें दागी हैं।
  • अमेरिका और इसराइल ने ईरान की परमाणु सुविधाओं और मिसाइल साइट्स पर 2,000 से अधिक हमले किए हैं।

क्या है इंटरसेप्टर संकट? क्यों खाली हो रहे हैं गोदाम?

  • युद्ध का गणित सीधा है : ईरान सस्ती मिसाइलें दाग रहा है, जबकि उन्हें रोकने वाली एक-एक THAAD या पैट्रियट मिसाइल की कीमत करोड़ों डॉलर में है।
  • खर्चीली सुरक्षा : जून 2025 के 12-दिवसीय युद्ध में अमेरिका ने 150 से अधिक THAAD इंटरसेप्टर दागे थे (एक की कीमत लगभग $15 मिलियन)। तब से स्टॉक पूरी तरह भर नहीं पाया है।
  • उत्पादन की धीमी गति : अमेरिकी सांसद मार्को रूबियो के अनुसार, अमेरिका महीने में जितने इंटरसेप्टर बनाता है, ईरान उससे कहीं ज्यादा मिसाइलें कुछ ही दिनों में तैयार कर लेता है।
  • थकाने की रणनीति : ईरान जानबूझकर अपनी पुरानी पीढ़ी की मिसाइलों का उपयोग कर रहा है ताकि दुश्मन के महंगे डिफेंस सिस्टम को खाली कराया जा सके।
 
विशेषज्ञ राय : अगर इंटरसेप्टर खत्म हुए, तो ईरान की 'असीमित युद्ध' (Asymmetric Warfare) की क्षमता कहर बरपा सकती है। यह केवल हथियारों की नहीं, बल्कि संसाधनों को थकाने की जंग है।"

ईरान की 'कार्पेट बॉम्बिंग' और मानवीय त्रासदी

तेहरान से आ रही खबरें विचलित करने वाली हैं। इसे 'कार्पेट बॉम्बिंग' का नाम दिया जा रहा है क्योंकि हमले निरंतर और व्यापक हैं।
  • मृतकों का आंकड़ा : ईरान की रेड क्रिसेंट सोसाइटी के अनुसार, अब तक 555 लोग मारे जा चुके हैं।
  • हृदय विदारक घटना : एक लड़कियों के स्कूल पर हुए हमले में 175 मासूमों की जान जाने की खबर है।
 
जवाब में ईरान के प्रॉक्सी ग्रुप्स (हिजबुल्लाह और हूती) भी सक्रिय हो गए हैं, जो युद्ध को और लंबा खींचने की ताकत रखते हैं।

ईरान का इतिहास : 'दर्द सहने की क्षमता' का इम्तिहान

ईरान के लिए यह केवल सैन्य युद्ध नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई है। शिया संस्कृति और ईरान के इतिहास में 'शहादत' और 'सहनशक्ति' का बड़ा महत्व है।
  • 1980-88 का युद्ध : इराक के साथ 8 साल चले युद्ध में लाखों ईरानी मारे गए, लेकिन देश नहीं झुका।
  • 47 साल के प्रतिबंध : 1979 की क्रांति के बाद से ईरान आर्थिक प्रतिबंधों के बीच जीने का आदी हो चुका है।
वर्तमान में 'करो या मरो' की स्थिति है। यदि खामेनेई के बाद शासन परिवर्तन का दबाव बढ़ा, तो ईरान अपनी पूरी सैन्य शक्ति झोंक सकता है, जिससे वैश्विक तेल कीमतें आसमान छू सकती हैं।

भारत पर क्या होगा असर?

भारत के लिए यह स्थिति चिंताजनक है। खाड़ी देशों में युद्ध का मतलब है कच्चे तेल (Crude Oil) की सप्लाई में बाधा और पेट्रोल-डीजल की कीमतों में भारी उछाल। सरकार को अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए वैकल्पिक रास्तों पर विचार करना होगा।
Edited by: Vrijendra Singh Jhala 
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