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Last Updated :वॉशिंगटन/तेहरान , मंगलवार, 17 मार्च 2026 (15:57 IST)

ईरान बना डोनाल्ड ट्रंप की सबसे बड़ी मुसीबत, क्या 'एस्केलेशन ट्रैप' में फंस गया है अमेरिका?

Donald trump Iran US war
Iran US war: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, जो अपनी 'बड़बोलेपन' और त्वरित फैसलों के लिए जाने जाते हैं, इस समय ईरान के साथ जारी युद्ध में एक ऐसे 'मुश्किल जाल' में फंसते नजर आ रहे हैं, जिससे निकलना उनके लिए नामुमकिन होता जा रहा है। ट्रंप खुद को विजेता घोषित कर रहे हैं, जबकि ईरान बिल्कुल भी झुकने को तैयार नहीं है। दरअसल, ट्रंप को लगा था कि वेनुजुएला की तरह वह ईरान में भी अपने मकसद में कामयाब हो जाएंगे, लेकिन यहां उनका पूरा दांव ही उलटा पड़ गया। ईरान युद्ध ने उनकी कार्यशैली के सामने एक दीवार खड़ी कर दी है।
 
यह युद्ध अब अपने तीसरे सप्ताह में प्रवेश कर चुका है और यह पहली ऐसी घटना है जहां ट्रंप की 'बातों से मामले को सुलझाने' या 'रातों-रात जादुई हल निकालने' वाली रणनीति पूरी तरह फेल साबित हुई है। ट्रंप को अमेरिका में भी विरोध झेलना पड़ रहा है। अमेरिका के प्रमुख शहरों- जैसे वॉशिंगटन डीसी (व्हाइट हाउस के पास), न्यूयॉर्क (टाइम्स स्क्वायर), शिकागो और लॉस एंजिल्स में हजारों लोग युद्ध के खिलाफ सड़कों पर उतरे हैं। प्रदर्शनकारी 'No War on Iran' और 'Bring Troops Home' जैसे नारे लगा रहे हैं। युद्ध के कारण तेल की कीमतें बढ़ने और शेयर बाजार में अस्थिरता के चलते भी आम अमेरिकी चिंतित हैं।

क्या है 'एस्केलेशन ट्रैप' और ट्रंप की चुनौती?

यह मुद्दा इसलिए अहम है क्योंकि राष्ट्रपति ट्रंप अपनी 'मनमानी' और युद्ध की कठोर वास्तविकताओं के बीच बुरी तरह फंस सकते हैं। उन्हें एक त्वरित जीत की उम्मीद थी, जैसा कि उन्होंने टैरिफ (शुल्क) के मामले में किया था, जिन्हें तुरंत लागू और रद्द किया जा सकता है। लेकिन युद्ध का परिणाम एकतरफा नियंत्रण और त्वरित समाधानों से परे है। इसमें ईरान का भी अपना दखल है।  यह एक ऐसी स्थिति है जहां एक अमेरिका को घटते फायदों के बावजूद अपना दबदबा दिखाने के लिए लगातार हमले करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। 
 
अमेरिकी समाचार वेबसाइट ‘एक्सियोस’ के मार्क कैपुटो से बात करते हुए ट्रंप प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने व्यावहारिक रूप से यह स्वीकार किया कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य में ईरानियों की हरकतों ने ट्रंप को अपने रुख पर और अधिक अड़ा दिया है।

बदलते समीकरण: इज़रायल vs ईरान vs दुनिया

वर्तमान स्थिति बेहद जटिल है:
  • इजराइल : ईरान में सत्ता परिवर्तन और व्यापक सैन्य तबाही चाहता है, क्योंकि वह लेबनान पर आक्रमण पर विचार कर रहा है। बेंजामिन नेतन्याहू ने बार-बार दिखाया है कि ईरान के मुद्दे पर वह ट्रंप को अपने पक्ष में करने की क्षमता रखते हैं।
  • ईरान : अपना अस्तित्व बचाना चाहता है और यह साबित करना चाहता है कि वह भविष्य के हमलों को रोकने के लिए सैन्य और आर्थिक रूप से 'दर्द' दे सकता है।
  • अन्य देश : मध्य पूर्व के जलमार्गों और हवाई क्षेत्र के माध्यम से तेल और व्यापार के मुक्त प्रवाह की उम्मीद कर रहे हैं।

समय-सीमा का खेल : अप्रैल या सितंबर?

ट्रंप प्रशासन को उम्मीद थी कि यह एक गहन सैन्य अभियान होगा जो लगभग 4 से 6 सप्ताह तक चलेगा। इस लिहाज से 1 अप्रैल (युद्ध का 33वां दिन) एक वास्तविक चुनौती का क्षण बन जाता है। लेकिन वॉशिंगटन और दुनिया भर की राजधानियों में अधिकारी अब एक बहुत लंबे संकट की तैयारी कर रहे हैं।
 
‘एक्सियोस’ की रिपोर्ट के अनुसार, प्रशासन और सहयोगी देशों के सूत्रों का मानना है कि मध्य पूर्व में अस्थिरता और अमेरिकी संलिप्तता सितंबर तक जारी रह सकती है। इजराइल ने भी पत्रकारों को बताया है कि वह ईरान में हजारों अतिरिक्त लक्ष्यों पर कम से कम तीन और सप्ताह के हमलों की योजना बना रहा है।

दावे vs हकीकत : व्हाइट हाउस के अंदर का घमासान

राष्ट्रपति ट्रंप ने रविवार को दावा किया कि उन्होंने मूल रूप से ईरान को तबाह कर दिया है। उनके पास कोई नौसेना, विमान भेदी प्रणाली या वायुसेना नहीं बची है। उनके मुताबिक, ईरान केवल पानी में बारूदी सुरंगें बिछाकर थोड़ी परेशानी पैदा कर सकता है। व्हाइट हाउस की प्रमुख उपप्रेस सचिव एना केली ने जोर देकर कहा कि ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ महीनों की सावधानीपूर्वक योजना का परिणाम है।
 
लेकिन, पर्दे के पीछे की सच्चाई कुछ और ही कहानी बयां करती है। ट्रंप प्रशासन के भीतर कुछ लोगों को अब लगने लगा है कि ईरान पर हमला करना एक बड़ी गलती थी। प्रशासन के करीबी एक सूत्र ने कहा कि ट्रंप ने यह मानकर भारी गलती की कि वह जमीनी सेना भेजे बिना ही ईरान की सत्ता को उखाड़ फेंकेंगे।

सैन्य जीत, लेकिन कूटनीतिक हार?

  • सैन्य दृष्टिकोण से देखें तो अमेरिका-इज़रायल का वर्चस्व है।
  • ईरान के मिसाइल और ड्रोन लॉन्च में भारी कमी आई है।
  • वायु सेना के पास बमबारी करने का पूर्ण वर्चस्व है।
  • ईरानी नौसेना का बड़ा हिस्सा तबाह हो चुका है।
  • अयातुल्ला व वरिष्ठ नेता मारे गए हैं (इस कार्रवाई में कम से कम 13 अमेरिकी सैनिक भी मारे गए हैं)।
 
लेकिन पेंच यह है कि अगर ट्रंप कल वापस भी हट जाएं, तो ईरानी होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद रख सकते हैं और तेल की कीमतों को इतना बढ़ा सकते हैं कि अमेरिका को फिर से युद्ध में उतरना पड़ेगा। ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि वह केवल एक अस्थायी युद्धविराम नहीं, बल्कि युद्ध के पूर्ण अंत की गारंटी चाहता है।

टिके रहना ही ईरान की जीत!

ट्रंप को अब एक महत्वपूर्ण सैन्य विस्तार पर कड़ा निर्णय लेना पड़ सकता है। ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर कहा कि ईरान पूरी तरह से हार गया है और एक सौदा चाहता है, लेकिन ऐसा सौदा नहीं जिसे वह स्वीकार करेंगे। इस पूरे मामले का सबसे बड़ा निष्कर्ष यह है कि इस युद्ध में अपनी जीत का दावा करने के लिए, ईरानी शासन को कुछ बड़ा करने की जरूरत नहीं है, उसे केवल टिके रहने की आवश्यकता है।

ईरान के विदेशमंत्री अरागची ने कहा भी है कि उनका देश सीजफायर की मांग नहीं कर रहा है। ट्रंप ने यूरोपीय संघ के देशों से भी मदद भी मांगी थी, लेकिन उन्हें निराशा ही हाथ लगी। ऐसे में ट्रंप को समझ नहीं आ रहा कि वे करें तो क्या करें। 
Edited by: Vrijendra Singh Jhala 
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