भारत में विरोध प्रदर्शनों का इतिहास: भाषा आंदोलन से 'राम मंदिर, किसान और युवा प्रदर्शनों' तक, जानें कैसे बदला देश का सियासी नक्शा
History of protests in India: हाल के दिनों में चुनावी पारदर्शिता और निष्पक्षता की मांग को लेकर दिल्ली के मध्य भागों (जंतर-मंतर और कनॉट प्लेस) में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे युवा प्रदर्शनकारियों, छात्र संगठनों और विपक्षी दलों ने जब सड़कों का रुख किया, तो देश को एक बार फिर भारत के समृद्ध और संघर्षशील लोकतांत्रिक आंदोलनों के इतिहास की याद आ गई।
प्रशासन और सत्ता द्वारा अक्सर ऐसे आंदोलनों को "कानून-व्यवस्था का संकट" या "राष्ट्रविरोधी" करार देने की कोशिशें की जाती रही हैं। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि औपनिवेशिक काल से लेकर आज तक जन-आंदोलन भारतीय लोकतंत्र का 'लाइफब्लड' (प्राणतत्व) रहे हैं।
आइए एक नज़र डालते हैं भारत के उन ऐतिहासिक विरोध प्रदर्शनों पर, जिन्होंने न केवल नीतियां बदलीं, बल्कि सत्ता के समीकरण भी पलट दिए:
1973-74 में गुजरात और बिहार से शुरू हुआ छात्र आंदोलन जब वयोवृद्ध गांधीवादी नेता जयप्रकाश नारायण (JP) के हाथों में आया, तो यह तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ एक राष्ट्रीय जनाक्रोश बन गया।
UPA सरकार के कार्यकाल में बड़े भ्रष्टाचार विवादों के बीच सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने दिल्ली के रामलीला मैदान में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल की।
केंद्र सरकार ने 2020 में कृषि बाजारों को उदार बनाने के उद्देश्य से तीन कृषि कानून पारित किए। किसानों को आशंका थी कि इससे सरकारी मंडियों (APMC) और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की व्यवस्था कमजोर हो जाएगी।
प्रशासन और सत्ता द्वारा अक्सर ऐसे आंदोलनों को "कानून-व्यवस्था का संकट" या "राष्ट्रविरोधी" करार देने की कोशिशें की जाती रही हैं। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि औपनिवेशिक काल से लेकर आज तक जन-आंदोलन भारतीय लोकतंत्र का 'लाइफब्लड' (प्राणतत्व) रहे हैं।
आइए एक नज़र डालते हैं भारत के उन ऐतिहासिक विरोध प्रदर्शनों पर, जिन्होंने न केवल नीतियां बदलीं, बल्कि सत्ता के समीकरण भी पलट दिए:
दक्षिण भारत का 'हिंदी विरोधी आंदोलन' (1965): भाषा और अस्मिता की लड़ाई
संविधान के तहत 26 जनवरी 1965 से केंद्र सरकार के कामकाज में हिंदी को प्राथमिक आधिकारिक भाषा बनाने की योजना थी। तमिलनाडु के लोगों को आशंका थी कि इससे उनके रोजगार और प्रशासनिक अवसरों पर बुरा असर पड़ेगा।- नेतृत्व और असर : द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) के शीर्ष नेताओं—सी.एन. अन्नादुरई और एम. करुणानिधि—के नेतृत्व में तमिलनाडु में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए।
- क्या बदला? तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने आश्वासन दिया कि जब तक गैर-हिंदी भाषी राज्य चाहेंगे, तब तक अंग्रेजी का इस्तेमाल जारी रहेगा। इसका राजनीतिक नतीजा यह हुआ कि 1967 के चुनाव में DMK ने कांग्रेस को तमिलनाडु की सत्ता से उखाड़ फेंका और राज्य की राजनीति हमेशा के लिए बदल गई।
जेपी आंदोलन (1970 का दशक): 'संपूर्ण क्रांति' और पहली गैर-कांग्रेसी सरकार
1973-74 में गुजरात और बिहार से शुरू हुआ छात्र आंदोलन जब वयोवृद्ध गांधीवादी नेता जयप्रकाश नारायण (JP) के हाथों में आया, तो यह तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ एक राष्ट्रीय जनाक्रोश बन गया।- ऐतिहासिक प्रभाव : जेपी के 'संपूर्ण क्रांति' के आह्वान के जवाब में 25 जून 1975 को देश में आपातकाल (Emergency) लागू कर दिया गया।
- क्या बदला? 1977 में आपातकाल हटने के बाद पूरा विपक्ष एकजुट हुआ और लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की ऐतिहासिक हार हुई। भारत के इतिहास में पहली बार केंद्र में गैर-कांग्रेसी सरकार (जनता पार्टी) बनी।
मंडल आयोग का विरोध और उदारीकरण के खिलाफ आंदोलन (1990 का दशक)
1990 में प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह (V.P. Singh) ने अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए सरकारी नौकरियों में 27% आरक्षण लागू करने की घोषणा की।- मंडल बनाम कमंडल : इसके विरोध में जहां देश भर में सवर्ण छात्रों ने तीखे विरोध प्रदर्शन किए, वहीं सामाजिक न्याय के समर्थक इसके पक्ष में खड़े हुए। 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने 'क्रीमी लेयर' को बाहर रखते हुए आरक्षण को वैध ठहराया, जिसने भारतीय राजनीति में 'जातिगत समीकरणों' को केंद्र में ला दिया।
- आर्थिक सुधारों के खिलाफ हड़ताल (1991) : तत्कालीन पीएम पी.वी. नरसिम्हा राव और वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा लाए गए उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) का ट्रेड यूनियनों और वामपंथियों ने कड़ा विरोध किया। हालांकि, यह आंदोलन नीतिगत सुधारों को रोक नहीं सका और भारत आधुनिक अर्थव्यवस्था की राह पर बढ़ गया।
राम मंदिर आंदोलन (1990 ) आडवाणी की राम रथयात्रा
लालकृष्ण आडवाणी की राम रथयात्रा 25 सितंबर 1990 को गुजरात के सोमनाथ से शुरू हुई थी। इसका उद्देश्य अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए जनसमर्थन जुटाना था। यह यात्रा 10 हजार किलोमीटर की दूरी तय करते हुए 30 अक्टूबर 1990 को अयोध्या पहुंचने वाली थी, लेकिन 23 अक्टूबर 1990 को बिहार के समस्तीपुर में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के आदेश पर आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया गया।
- इस यात्रा से क्या बदला? : इस यात्रा के बाद राम मंदिर आंदोलन ने और तेजी पकड़ी साथ ही आडवाणी की इस यात्रा का भाजपा को चुनावी फायदा मिला। भाजपा के सत्ता में पहुंचने की बड़ी वजह आडवाणी की इस रथयात्रा को भी माना जाता है। हालांकि राम मंदिर आंदोलन का इतिहास काफी पुराना है। 1853 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद परिसर के आसपास पहली बार धार्मिक हिंसा दर्ज की गई थी, जिसके बाद ब्रिटिश प्रशासन ने परिसर के बाहर हिंदुओं को पूजा के लिए चबूतरा (राम चबूतरा) बनाने की अनुमति दी थी।
अन्ना हजारे का 'भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन' (2011): इंडिया अगेंस्ट करप्शन
UPA सरकार के कार्यकाल में बड़े भ्रष्टाचार विवादों के बीच सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने दिल्ली के रामलीला मैदान में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल की।- जन-आक्रोश और नतीजा : इस आंदोलन से अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी और प्रशांत भूषण जैसे चेहरे उभरे। दिसंबर 2013 में संसद ने जन लोकपाल कानून पारित किया। बाद में केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी (AAP) का गठन किया और दिल्ली की सत्ता हासिल की।
'निर्भया' आंदोलन (2012): महिलाओं की सुरक्षा और सख्त कानूनी सुधार
16 दिसंबर 2012 को दिल्ली में हुए भीषण सामूहिक दुष्कर्म और हत्या कांड के बाद पूरा देश उबल पड़ा। इंडिया गेट से लेकर देश के हर कोने में युवाओं और महिलाओं ने स्वप्रेरित होकर विरोध जताया।- क्या बदला? जनता के भारी दबाव में सरकार ने जस्टिस वर्मा समिति का गठन किया। संसद ने क्रिमिनल लॉ (अमेंडमेंट) एक्ट 2013 पारित किया, जिसके तहत यौन अपराधों की कानूनी परिभाषाओं को विस्तृत किया गया और कड़ी सजा का प्रावधान किया गया।
CAA, NRC और NPR विरोधी आंदोलन (2019-20)
दिसंबर 2019 में पारित नागरिकता संशोधन कानून (CAA) ने पड़ोसी देशों से आए गैर-मुस्लिम शरणार्थियों के लिए नागरिकता का रास्ता आसान किया, जिससे इसके संवैधानिक और धर्मनिरपेक्ष स्वरूप पर देशव्यापी बहस शुरू हुई। NRC और NPR को लेकर भी आंदोलन हुआ।-
प्रतीक और असर : दिल्ली के शाहीन बाग में हुआ आंदोलन नागरिकता संशोधन कानून (CAA), राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (NPR) का विरोध करने के लिए आयोजित किया गया था।
इस दौरान 'शाहीन बाग' महिलाओं के नेतृत्व वाले धरने का प्रमुख प्रतीक बना। हालांकि, आंदोलन कानून को निरस्त नहीं करा सका, लेकिन इसके क्रियान्वयन में देरी हुई और सरकार ने मार्च 2024 में इसके नियम अधिसूचित किए।
किसान आंदोलन (2020-21) : कृषि सुधारों के खिलाफ ऐतिहासिक घेराबंदी
केंद्र सरकार ने 2020 में कृषि बाजारों को उदार बनाने के उद्देश्य से तीन कृषि कानून पारित किए। किसानों को आशंका थी कि इससे सरकारी मंडियों (APMC) और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की व्यवस्था कमजोर हो जाएगी।- ऐतिहासिक वापसी : संयुक्त किसान मोर्चा के नेतृत्व में हजारों किसान दिल्ली की सीमाओं (सिंघू, टिकरी, गाजीपुर) पर महीनों तक कड़े मौसम के बावजूद डटे रहे।
- क्या बदला? लगभग एक वर्ष तक चले इस आंदोलन के बाद नवंबर 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की। यह स्वतंत्र भारत के इतिहास में जन-दबाव द्वारा सरकार से बड़ी नीतिगत रियायत हासिल करने का सबसे प्रमुख उदाहरण बना।
'कॉकरोच' और युवा आंदोलन (2026): परीक्षा धांधली से प्रशासनिक जवाबदेही तक
हालिया दौर में छात्रों और युवाओं का असंतोष एक नए स्वरूप में सामने आया है। बेरोजगारी पर प्रशासनिक बयानों और राष्ट्रीय पात्रता व प्रवेश परीक्षा (NEET/मेडिकल परीक्षाओं) में हुई कथित अनियमितताओं के विरोध में युवाओं ने 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) नाम का दबाव समूह बनाया।- क्या बदला? जुलाई 2026 में व्यापक छात्र प्रदर्शनों के चलते केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपना पद छोड़ना पड़ा। वर्तमान में यही युवा और विपक्षी दल चुनाव आयोग की पारदर्शिता और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे को लेकर अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं।

