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'चंदू चैंपियन' के 2 साल: कैसे एक फिल्म ने बदल दी एक भूले-बिसरे हीरो मुरलीकांत पेटकर की किस्मत?

Chandu Champion impact
कुछ फिल्में सिर्फ मनोरंजन करती हैं, जबकि कुछ पर्दे से आगे बढ़कर लोगों के दिलों और समाज पर गहरी छाप छोड़ जाती हैं। रिलीज़ के दो साल बाद भी 'चंदू चैंपियन' सिर्फ एक प्रेरणादायक स्पोर्ट्स ड्रामा के रूप में ही नहीं, बल्कि उस फिल्म के तौर पर याद की जाती है जिसने लाखों भारतीयों को मुरलीकांत पेटकर की असाधारण कहानी से परिचित कराया। 
 
कबीर खान के निर्देशन में बनी और कार्तिक आर्यन अभिनीत इस फिल्म ने भारत के पहले पैरालंपिक गोल्ड मेडलिस्ट की कहानी को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया, जिनकी ऐतिहासिक उपलब्धियां लंबे समय तक आम लोगों से कोसों दूर थीं।

 
मुरलीकांत पेटकर का सफर संघर्ष, दृढ़ संकल्प और अटूट विश्वास की मिसाल है। भारतीय सेना में सेवा के दौरान गंभीर चोट लगने के बाद भी उन्होंने अपनी विषम परिस्थितियों को अपनी पहचान नहीं बनने दी, बल्कि उन्होंने 1972 के हीडलबर्ग पैरालंपिक्स में भारत के लिए पहला पैरालंपिक गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रच दिया। 
 
हालांकि, इतनी बड़ी उपलब्धि हासिल करने के बावजूद दशकों तक उनकी कहानी लगभग गायब थी। 'चंदू चैंपियन' ने इस कमी को दूर करते हुए उनकी प्रेरणादायक यात्रा को देशभर के दर्शकों तक पहुंचाया और भारतीय खेल इतिहास के इस नायक से नई पीढ़ी को परिचित कराया।
फिल्म का प्रभाव सिर्फ सिनेमाघरों तक सीमित नहीं रहा। मुरलीकांत पेटकर की उपलब्धियों को लेकर चर्चाएं बढ़ीं और लोगों का ध्यान उनकी कहानी की ओर गया। यह फ़िल्म का प्रभाव ही था कि जनवरी 2025 में उन्हें उनकी उपलब्धियों के मद्देनजर अर्जुन अवॉर्ड (लाइफटाइम) से सम्मानित किया गया, जो उनके पैरालंपिक गोल्ड जीतने के पांच दशक से भी अधिक समय बाद उन्हें मिला। 
 
खुद मुरलीकांत पेटकर ने भी माना कि इस फिल्म ने उनकी कहानी को लोगों तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने निर्माता साजिद नाडियाडवाला, निर्देशक कबीर खान और अभिनेता कार्तिक आर्यन का आभार व्यक्त किया कि उन्होंने ही उनकी जिंदगी की कहानी भारत के लोगों तक पहुंचाई।
 
पीछे मुड़कर देखें तो 'चंदू चैंपियन' की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक वह जागरूकता है, जो इसने पैदा की। ऐसे समय में जब फिल्मों की चर्चा अक्सर सिर्फ बॉक्स ऑफिस आंकड़ों तक सीमित रह जाती है, इस फिल्म ने साबित किया कि सिनेमा विरासत को संजोने और अनदेखी उपलब्धियों को सम्मान दिलाने का भी एक मजबूत माध्यम बन सकती है। 
 
दो साल बाद भी इसकी विरासत सिर्फ सिनेमाई सफलता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने यह सुनिश्चित किया है कि मुरलीकांत पेटकर के भारतीय खेलों में योगदान को वह सम्मान और पहचान मिले, जिसके वे लंबे समय से हकदार थे।
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