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Written By BBC Hindi
Last Modified: मंगलवार, 14 सितम्बर 2021 (08:33 IST)

राजा महेंद्र प्रताप सिंह की पूरी कहानी, पीएम मोदी जिनके नाम पर यूनिवर्सिटी का करेंगे शिलान्यास

राजा महेंद्र प्रताप सिंह की पूरी कहानी, पीएम मोदी जिनके नाम पर यूनिवर्सिटी का करेंगे शिलान्यास - Story of Raja Mahendra Pratap Singh
प्रदीप कुमार, बीबीसी संवाददाता
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अलीगढ़ में राजा महेंद्र प्रताप सिंह के नाम पर यूनिवर्सिटी का शिलान्यास करेंगे। उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने सितंबर, 2019 में अलीगढ़ में राजा महेंद्र प्रताप सिंह के नाम राज्य स्तरीय यूनिवर्सिटी खोलने की घोषणा की थी।
 
इस यूनिवर्सिटी के शिलान्यास कार्यक्रम के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अलीगढ़ पहुंचने और इस यूनिवर्सिटी को खोले जाने को लेकर राज्य सरकार और भारतीय जनता पार्टी जिन बातों को प्रचारित कर रही है उसमें कहा जा रहा है कि वह उन लोगों को सम्मान देने का काम कर रही है जिन्हें पिछली सरकारों में भुला दिया गया।
 
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुज़्ज़फ़्फ़रनगर से सांसद और केंद्र सरकार में राज्य मंत्री संजीव बाल्यान कहते हैं, "राजा महेंद्र प्रताप सिंह स्वतंत्रता संग्राम में शामिल रहे हैं, उन्होंने भारत की पहली निर्वासित सरकार बनाई। उन्होंने समाज के लिए कई तरह के संस्थान खोले थे। एएमयू जैसी यूनिवर्सिटी के लिए उन्होंने ज़मीन दी थी। लेकिन उनके योगदान को पूरी तरह भुला दिया गया। उनसे कम योगदान देने वालों का नाम पिछली सरकारों में हर दूसरे तीसरे दिन लिया जाता रहा, लेकिन जाट समुदाय के इतने महान नेता के योगदान को याद नहीं रखा गया।"
 
राजा महेंद्र प्रताप थे कौन?
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आख़िर राजा महेंद्र प्रताप सिंह थे कौन और उनका जाट समाज के लिए क्या योगदान रहा है। राजा महेंद्र प्रताप सिंह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हाथरस ज़िले के मुरसान रियासत के राजा थे। जाट परिवार से निकले राजा महेंद्र प्रताप सिंह की एक शख़्सियत के कई रंग थे। वे अपने इलाक़े के काफ़ी पढ़े-लिखे शख़्स तो थे ही, लेखक और पत्रकार की भूमिका भी उन्होंने निभाई। पहले विश्वयुद्ध के दौरान अफ़ग़ानिस्तान जाकर उन्होंने भारत की पहली निर्वासित सरकार बनाई। वे इस निर्वासित सरकार के राष्ट्रपति थे।
 
एक दिसंबर, 1915 को राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने अफ़ग़ानिस्तान में पहली निर्वासित सरकार की घोषणा की थी।
 
निर्वासित सरकार का मतलब यह है कि अंग्रेज़ों के शासन के दौरान स्वतंत्र भारतीय सरकार की घोषणा। राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने जो काम किया था, वही काम बाद में सुभाष चंद्र बोस ने किया था। इस लिहाज़ से देखें तो दोनों में समानता दिखती है।
 
हालांकि सुभाष चंद्र बोस कांग्रेसी थे और राजा महेंद्र प्रताप सिंह घोषित तौर पर कांग्रेस नहीं रहे। हालांकि उस दौर में कांग्रेस के बड़े नेताओं तक उनकी धमक पहुंच चुकी थी। इसका अंदाज़ा महेंद्र प्रताप सिंह पर प्रकाशित अभिनंदन ग्रंथ में महात्मा गांधी से उनके पत्राचार से होता है।
 
इस ग्रंथ में प्रकाशित महात्मा गांधी के विचारों को भी जगह दी गई है। गांधी ने महेंद्र प्रताप सिंह के बारे में कहा था, "राजा महेंद्र प्रताप के लिए 1915 में ही मेरे हृदय में आदर पैदा हो गया था। उससे पहले भी उनकी ख़्याति का हाल अफ़्रीका में मेरे पास आ गया था। उनका पत्र व्यवहार मुझसे होता रहा है जिससे मैं उन्हें अच्छी तरह से जान सका हूं। उनका त्याग और देशभक्ति सराहनीय है।"
 
बहरहाल, सुभाष चंद्र बोस निर्वासित सरकार के गठन के बाद स्वदेश नहीं लौट सके, लेकिन राजा महेंद्र प्रताप सिंह भारत भी लौटे और आज़ादी के बाद राजनीति में भी सक्रिय हुए। 32 साल तक देश से बाहर रहे राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने भारत को आज़ाद कराने की कोशिशों के लिए जर्मनी, रूस और जापान जैसे देशों से मदद मांगी। हालांकि वे उसमें कामयाब नहीं हुए।
 
1946 में जब भारत लौटे तो सबसे पहले वर्धा में महात्मा गांधी से मिलने गए। लेकिन भारतीय राजनीति में उस दौर की कांग्रेस सरकारों के ज़माने में उन्हें कोई अहम ज़िम्मेदारी निभाने का मौका नहीं मिला।
 
कांग्रेस ने नहीं दी ज़्यादा तरजीह
जवाहर लाल नेहरू की विदेश नीति में जर्मनी और जापान मित्र देश नहीं रहे थे और राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने इन देशों से मदद मांगकर आज़ादी की लड़ाई शुरू की थी। ऐसे में राजा महेंद्र प्रताप सिंह को कांग्रेस में बहुत ज़्यादा तरजीह नहीं मिली।
 
1957 में वे मथुरा से चुनाव लड़े और निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर उन्होंने जीत हासिल की। इस चुनाव की सबसे ख़ास बात यह थी कि जनसंघ के उम्मीदवार के तौर पर अटल बिहारी वाजपेयी भी यहां चुनाव मैदान में खड़े हुए थे।
 
उस चुनाव में राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने कांग्रेस के चौधरी दिगंबर सिंह को क़रीब 30 हज़ार वोटों से हराया था।

चौधरी दिगंबर सिंह के बेटे और विश्व हिंदी सम्मान से सम्मानित 'भारतकोश' नामक हिंदी समग्र ज्ञानकोश के संस्थापक और संपादक आदित्य चौधरी बताते हैं कि राजा महेंद्र प्रताप सिंह कैसी शख़्सियत थे, इसका अंदाज़ा आप लगाइए।

चुनाव प्रचार के दौरान एक दिन वे अपनी कार से हमारे घर पहुंचे और मेरे पिता जी से कहा कि मुझे यमुना खादर के जिस इलाके में प्रचार करने जाना है वहां रेत ही रेत है और कार से जाना मुश्किल है, तो तुम्हारी जीप मैं ले जा रहा हूं और तुम मेरी कार ले जाना। हालांकि ये बात दूसरी है कि जब मेरे पिता चुनाव प्रचार के लिए निकलने को तैयार हुए तो राजा साब के ड्राइवर ने कहा कि कहीं जाने की अनुमति तो राजा साहब ने दी ही नहीं है।
 
आदित्य चौधरी बताते हैं, "पांच लोग थे चुनावी मैदान में, पिता जी दूसरे स्थान पर रहे थे और अटल बिहारी वाजपेयी चौथे स्थान पर, उनकी ज़मानत ज़ब्त हो गई थी। लेकिन वे बलरामपुर से भी चुनाव लड़ रहे थे और वहां चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंच गए थे।"
 
वैसे चौधरी दिगंबर सिंह उस दौर में जाट समुदाय के बड़े कांग्रेसी थी और उन्होंने अपनी इस हार का बदला 1962 में राजा महेंद्र सिंह को क़रीब 30 हज़ार वोट से ही हराकर ले लिया था। लेकिन चौधरी दिगंबर सिंह और राजा महेंद्र प्रताप सिंह के रिश्ते हमेशा मधुरता भरे रहे।
 
शिक्षा के लिए मददगार शख़्स की छवि
राजनीतिक तौर पर राजा महेंद्र प्रताप सिंह की बहुत बड़ी पहचान भले नहीं बन पायी हो लेकिन ऐसे समाजसेवी के तौर बन गई थी जो शिक्षा के प्रचार प्रसार के लिए लगातार धन संपदा दान देते रहे।
 
आदित्य चौधरी बताते हैं, "राजा साहब में लीडरशिप क्वालिटी नहीं थी, वे जाटों में बहुत लोकप्रिय भी नहीं थे लेकिन उनमें एजुकेशन को आगे बढ़ाने के लिए विलक्षण संकल्प था। आप कह सकते हैं उन्होंने अपनी सारी संपत्ति शैक्षणिक संस्थाओं को खड़ा करने में लगा दी।"
 
हालांकि राजा महेंद्र प्रताप सिंह जब शैक्षणिक संस्थानों के लिए दान दे रहे होंगे तो शायद उन्होंने कभी नहीं सोचा होगा कि एक समय ऐसा भी आएगा जब यह एक राजनीतिक मुद्दा बन जाएगा। राजा महेंद्र प्रताप सिंह यूनिवर्सिटी खोले जाने के दौरान सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स पर लगातार अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की चर्चा भी हो रही है। यह भी बताया जा रहा है कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के लिए राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने ज़मीन दान दी थी और यूनिवर्सिटी कैंपस में उनके योगदान का कहीं ज़िक्र नहीं है।
 
इस पहलू पर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के प्रवक्ता उमर पीरज़ादा कहते हैं, "देखिए राजा महेंद्र प्रताप सिंह हमारे यूनिवर्सिटी के ही छात्र रहे हैं, ऐसे में हम सब के लिए उनके नाम पर एक शैक्षणिक केंद्र का खुलना गर्व की बात है।"
 
पिता सर सैय्यद अहमद ख़ान के दोस्त थे
दरअसल राजा महेंद्र प्रताप सिंह के पिता राजा घनश्याम सिंह सर सैय्यद अहमद ख़ान के दोस्त थे और उनके परिवार ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पहले यहां चलने वाले स्कूल और कॉलेज के निर्माण में वित्तीय मदद की थी। राजा महेंद्र प्रताप सिंह के एएमयू के निर्माण में उनके योगदान का ज़िक़्र करने पर उमर पीरज़ादा ने कहा, "राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को 1929 में 3।8 एकड़ की ज़मीन लीज़ पर दी थी। यह ज़मीन मुख्य कैंपस से अलग शहर की ओर है जहां आज आधे हिस्से में सिटी स्कूल चल रहा है और आधा हिस्सा अभी ख़ाली है।"
 
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का कैंपस 467 एकड़ से ज़्यादा हिस्से में फैला हुआ है और इसके लिए राजा महेंद्र प्रताप सिंह के अलावा दूसरे लोगों ने भी ज़मीन दी थी। राजा महेंद्र प्रताप सिंह के योगदान को यूनिवर्सिटी कैंपस में किस तरह से संजोया गया है, इस बारे में पूछने पर उमर पीरज़ादा ने बताया, "हमलोगों की सेंट्रल लाइब्रेरी, मौलाना आज़ाद लाइब्रेरी में उनकी बड़ी तस्वीर लगी है, उनपर कई किताबें हमलोगों ने ख़ास तौर पर रखी हैं और समय-समय पर उनके सम्मान में सेमिनार और संगोष्ठियां होती रही हैं।"
 
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में कई हस्तियों मसलन सर सैय्यद हॉल, मौलाना आज़ाद लाइब्रेरी, सरोजनी नायडू हॉल, ध्यानचंद हॉस्टल, इंदिरा गांधी हॉस्टल जैसे नामों की सूची में राजा महेंद्र प्रताप सिंह का नाम शामिल भले न हो, लेकिन विश्वविद्यालय कैंपस उन्हें भूल गया हो, यह नहीं माना जा सकता है क्योंकि 1977 में एमएओ कॉलेज अलीगढ़ के शताब्दी समारोह के आयोजन में राजा महेंद्र प्रताप सिंह मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल हुए थे।
 
वे सर्वधर्म समभाव के लिए जाने जाते थे
एक और दिलचस्प बात यह है कि राजा महेंद्र प्रताप सिंह कभी हिंदू-मुसलमान के पचड़े में नहीं पड़े। उन्हें आर्य पेशवा त्याग मूर्ति के तौर पर भी जाना जाता रहा। आदित्य चौधरी कहते हैं, "सच्चाई तो यह है कि राजा महेंद्र प्रताप सिंह सर्वधर्म समभाव के लिए जाने जाते रहे थे। वे कहते भी थे कि एक ही धर्म होना चाहिए प्रेम धर्म। और तो और वे लोगों को अपना नाम 'पीर पीटर प्रेम प्रताप' तक बताया करते थे। ऐसे में उन्हें हिंदू या केवल जाट तक केंद्रित करना उचित नहीं होगा।"
 
राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने अफ़ग़ानिस्तान में जो निर्वासित सरकार बनायी थी, उसमें वे ख़ुद तो राष्ट्रपति बने थे जबकि प्रधानमंत्री उन्होंने मोहम्मद बरकतुल्लाह भोपाली को बनाया था। ख़ास बात यह है कि स्वतंत्रता संग्राम से पहले ना तो कांग्रेस के नरम दल में ही वे रहे और ना ही गरम दल में और आज़ादी के बाद ना तो कांग्रस के साथ रहे और ना ही जनसंघ के साथ।
 
आदित्य चौधरी यह भी बताते हैं कि राजा महेंद्र प्रताप ने वृंदावन में प्रेम महाविद्यालय की स्थापना की थी और उनका यक़ीन था कि शिक्षा के ज़रिए ही समाज में प्रेम और सद्भाव को स्थापित किया जा सकता है। यह प्रेम विद्यालय मौजूदा समय में वृंदावन पॉलीटेकनिक संस्थान के तौर पर उम्दा संस्थान माना जाता है। शांति-सद्भाव और शिक्षा के लिए कोशिशों को देखते हुए ही 1932 में राजा महेंद्र प्रताप सिंह को शांति के नोबल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था।
 
वैसे यह सच है कि 1962 में मथुरा लोकसभा से चुनाव हारने के बाद वे सार्वजनिक जीवन में बहुत सक्रिय नहीं रहे और उनका निधन 29 अप्रैल, 1979 को हुआ था। उनके निधन पर तत्कालीन केंद्र सरकार ने डाक टिकट भी जारी किया था।
 
आज की पीढ़ी राजा महेंद्र प्रताप सिंह से अनजान
नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ की सरकार ने इस यूनिवर्सिटी की शुरुआत करके राजा महेंद्र प्रताप सिंह का परिचय आज की पीढ़ी से करा दिया है।
 
केंद्रीय मंत्री संजीव बाल्यान कहते हैं, "देखिए हम लोगों की पीढ़ी को तो राजा महेंद्र प्रताप सिंह के बारे में मालूम था, लेकिन आज की युवा पीढ़ी को जानकारी नहीं थी, अब उनतक जानकारी पहुंचेगी तो उन्हें भी सम्मान का बोध होगा कि हमारे समुदाय का व्यक्ति कितना बड़ा आदमी था।"
 
मौजूदा समय में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जिस तरह से जाट किसान तीन नए क़ानून को लेकर मोदी सरकार का विरोध कर रहे हैं, उसे देखते हुए इसे जाट समुदाय को मनाने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है। हालांकि संजीव बाल्यान इन दोनों पहलुओं को अलग-अलग बताते हुए कहते हैं, "राजा महेंद्र प्रताप सिंह के नाम पर यूनिवर्सिटी निर्माण की घोषणा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने तब की थी जब किसान आंदोलन नहीं था। यूनिवर्सिटी बनाने के लिए ज़मीन अधिग्रहण इत्यादि में समय लगता है। इसलिए अभी शिलान्यास हो रहा है।"
 
आदित्य चौधरी कहते हैं, "जाट को आप ऐसा इकलौता समुदाय मान सकते हैं जो अपना नेता चुनते वक़्त बहुत दिमाग़ नहीं लगाता है। इसलिए वह अपना समर्थन कब किसको देगा, इसका आकलन थोड़ा मुश्किल है।"
 
वहीं जाट किसानों के आंदोलन को लेकर संजीव बाल्यान ने कहा, "हमलोग बातचीत कर रहे हैं, फ़सलों का समर्थन मूल्य बढ़ाने को लेकर काम हो रहा है। हमारी लगातार कोशिश है कि हम इस आंदोलन का समाधान निकालें।"
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