जब संकट दस्तक देता है तो सबसे पहले मदद के लिए दाइयां खड़ीं होती हैं
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हर साल करोड़ों ज़िन्दगियां, दाइयों की महारत और देखभाल पर निर्भर होती हैं, मगर फिर भी दुनिया भर में दाइयों की क़िल्लत के कारण इस पेशे का आकार व दायरा अभूतपूर्व रूप से सिकुड़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र की प्रजनन स्वास्थ्य एजेंसी – UNFPA ने 5 मई को मनाए जाने वाले अन्तरराष्ट्रीय दाई (Midwife) दिवस के अवसर पर रविवार को इस मुद्दे पर ध्यान आकर्षित किया है।खासतौर से जलवायु संकट के दौरान, इस वर्ष दाइयों की महती भूमिका की तरफ़ ध्यान खींचा गया है। हर दो मिनट पर, दुनिया भर में कोई महिला या लड़की की ज़िन्दगी, गर्भ सम्बन्धी जटिलताओं के कारण ख़त्म हो जाती है।Samar Nazmi Muwafi is a staff #midwife & head nurse at the Al-Emarati hospital in #Gaza.
— World Health Organization (WHO) (@WHO) May 5, 2024
Watch her story of resilience and hope.
"I hope that all the world and all the Palestinian women and midwives live in peace."#DayOfTheMidwife pic.twitter.com/lMxCjH2anO
UNFPA का कहना है कि इस संख्या में जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ोत्तरी होने का जोखिम है। एजेंसी ने इन जोखिमों को कम करने में दाइयों की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया है।
UNFPA की मुखिया डॉक्टर नतालिया कैनेम ने इस दिवस के अवसर पर एक सन्देश में कहा है, “जब संकट दस्तक देते हैं तो दाइयां ही सबसे पहले घटनास्थल पर मौजूद होती हैं, विशेष रूप से दूर-दराज़ के इलाक़ों में रहने वाले समुदायों में"
नर्स समर नाज़मी मुवाफ़ी कहती हैं, “मैंने अपनी मुस्कुराहट बरक़रार रखना सीखा है। मैं हमेशा अपने मरीज़ों को बेहतर महसूस कराने के लिए अपनी मुस्कुराहट बरक़रार रखती हूं।
भारी क़िल्लत: दुनिया भर में लगभग 10 लाख दाइयों की भारी क़िल्लत है। चुनौतीपूर्ण कामकाजी परिस्थितियों, लैंगिक भेदभाव के कारण कम पारिश्रमिक और उत्पीड़न की ख़बरों ने, बहुत से लोगों को, दाइ के पेशे में दाख़िल होने से हतोत्साहित किया है।
UNFPA के वर्ष 2023 के आंकड़ों के अनुसार, हर साल लगभग 2 लाख 87 महिलाओं की मौत, अपने शिशुओं को जन्म देने के दौरान हो जाती है। लगभग 24 लाख बच्चे जन्म के समय अपनी ज़िन्दगी खो देते हैं और उनके अलावा क़रीब 22 लाख बच्चे मृत जन्म लेते हैं।
यूएन यौन व प्रजनन स्वास्थ्य एजेंसी का कहना है कि दुनिया भर में दाइयों की समुचित सेवाएं मिलने से, जच्चा-बच्चा की ऐसी मौतों को रोकने में मदद मिलती है, जिन्हें सही चिकित्सा देखभाल मिलने से रोका जा सकता है।
दाइयों की संख्या और ज़रूरत के अन्तर को पाटने से, जच्चा-बच्चा की दो तिहाई मौतों को रोका जा सकता है, जिससे वर्ष 2035 तक लगभग 43 लाख ज़िन्दगियां बचाई जा सकेंगी। UNFPA ने पहले अनेक देशों में जागरूकता बढ़ाई है और अन्तरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप, लगभघ साढ़े तीन लाख दाइयों को प्रशिक्षित किया है।

