मेरे भईया को कोई दे दो संदेश...
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पुरानी पीढ़ी के लोग रिश्तों को जिस गहराई और भावुकता के साथ निभाते थे, आधुनिक पीढ़ी में कहीं-न-कहीं उस भाव का अभाव दिखता है। पहले शादियाँ जल्दी हो जाया करती थीं और बहनों का बचपन अपने भाइयों के साथ कम ही बीत पाता था। कम उम्र में ही लड़कियों को बाबुल का आँगन छोड़कर जाना पड़ता था। अगर उनकी शादियाँ कहीं दूर प्रदेश में हो जाती थीं तो बहुत कम ही ऐसे मौके आते थे, जब बहनें राखी पर अपने भाई के पास जा पाती हों। उनकी कितनी ही राखियाँ यूँ ही बीत जाती थीं। हर साल यह मौका आता है और हर बार उन बहनों के मन में टीस उठती है और हर बार वे अपने मन को समझाकर रह जाती हैं। ऐसी ही बहनों ने अपना दर्द कुछ यूँ बयाँ किया -
याद बहुत आती है
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(50 वर्षीय गृहिणी विजयलक्ष्मी)
आँसू छलक आए
चेहरे पर गहरी उदासी छा गई और कहते-कहते आँखों में आँसू छलक आए। चार सालों से राखी पर अपने मायके राजस्थान नहीं जा पाई हैं
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