उपांग ललिता व्रत कब रखा जाएगा, क्या है इसका महत्व और कथा
शारदीय नवरात्रि के पंचम दिन 'उपांग ललिता व्रत' (ललिता पंचमी) का विधान है। यह दिन 10 महाविद्या देवियों में से एक 'देवी ललिता' को समर्पित है, जिन्हें त्रिपुरा सुंदरी, षोडशी और राजेश्वरी के नामों से भी जाना जाता है। यह व्रत मुख्य रूप से गुजरात और महाराष्ट्र के क्षेत्रों में अत्यधिक लोकप्रिय और प्रचलित है।
तिथियां एवं पंचमी काल (2026)
ललिता पंचमी का दिन: बृहस्पतिवार, 15 अक्टूबर 2026
पंचमी तिथि प्रारंभ: 15 अक्टूबर 2026 को दोपहर 01:13 बजे से
पंचमी तिथि समाप्त: 16 अक्टूबर 2026 को दोपहर बाद 03:25 बजे तक
व्रत एवं पूजा का धार्मिक महत्व
देवी का स्वरूप: माता ललिता सौंदर्य, शक्ति, समृद्धि और सौभाग्या की देवी हैं।
पौराणिक कथा: मान्यता है कि कामदेव के भस्म होने पर उसकी राख से 'भांडासुर' नामक दैत्य उत्पन्न हुआ था। भांडासुर का वध करने और देवताओं को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए ही मां ललिता का प्राकट्य हुआ था।
पूजन एवं फल: नवरात्रि के पांचवें दिन मां दुर्गा के स्कंदमाता स्वरूप के साथ-साथ देवी ललिता और भगवान शिव की संयुक्त आराधना की जाती है। यह व्रत नवविवाहित स्त्रियों, घर-परिवार की सुख-शांति, विद्या, सौभाग्य, दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है।
परंपरा एवं पूजन विधि
स्नान एवं संकल्प: उपांग ललिता व्रत के दिन प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें, स्वच्छ लाल या पीले वस्त्र धारण करें और देवी के समक्ष निष्ठापूर्वक व्रत का संकल्प लें।
प्रतिमा स्थापना: घर के ईशान कोण में पूजा की चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर मां ललिता की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
पूजन सामग्री: देवी को लाल पुष्प, लाल वस्त्र, रोली, कुमकुम, अक्षत, इत्र और नैवेद्य अर्पित करें।
पाठ एवं मंत्र जप: इस पावन दिन 'ललिता सहस्रनाम' अथवा 'ललिता त्रिशती' का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
आर्थिक समस्याओं से मुक्ति और समृद्धि के लिए इस विशेष मूल मंत्र का जाप करें:
मंत्र: ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौ: ॐ ह्रीं श्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सकल ह्रीं सौ: ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं नमः
उपांग ललिता व्रत कथा:
पौराणिक कथा के अनुसार देवी ललिता आदि शक्ति का वर्णन देवी पुराण से प्राप्त होता है। नैमिषारण्य में एक बार यज्ञ हो रहा था जहां दक्ष प्रजापति के आने पर सभी देवता गण उनका स्वागत करने के लिए उठे। लेकिन भगवान शंकर वहां होने के बावजूद भी नहीं उठे इसी अपमान का बदला लेने के लिये दक्ष ने अपने यज्ञ में शिवजी को आमंत्रित नही किया।
जिसका पता मां सती को चला और वो बिना भगवान शंकर से अनुमति लिए अपने पिता राजा दक्ष के घर पहुंच गई। उस यज्ञ में अपने पिता के द्वारा भगवान शंकर की निंदा सुनकर और खुद को अपमानित होते देखकर उन्होने उसी अग्नि कुंड में कूदकर अपने अपने प्राणों को त्याग दिया भगवान शिव को इस बात की जानकारी हुई तो तो वह मां सती के प्रेम में व्याकुल हो गए और उन्होने मां सती के शव को कंधे में रखकर इधर उधर उन्मत भाव से घूमना शुरू कर दिया।
भगवान शंकर की इस स्थिति से विश्व की संपूर्ण व्यवस्था छिन्न भिन्न हो गई ऐसे में विवश होकर अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। जिसके बाद मां सती के शरीर के अंग कटकर गिर गए और उन अंगों से शक्ति विभिन्न प्रकार की आकृतियों से उन स्थानों पर विराजमान हुई और वह शक्तिपीठ स्थल बन गए।
महादेव भी उन स्थानों पर भैरव के विभिन्न रूपों में स्थित है। नैमिषारण्य में मां सती का ह्रदय गिरा था। नैमिष एक लिंगधारिणी शक्तिपीठ स्थल है। जहां लिंग स्वरूप में भगवान शिव की पूजा की जाती है और यही मां ललिता देवी का मंदिर भी है। जहां दरवाजे पर ही पंचप्रयाग तीर्थ विद्यमान है। भगवान शंकर को हृदय में धारण करने पर सती नैमिष में लिंगधारिणीनाम से विख्यात हुईं इन्हें ललिता देवी के नाम से पुकारा जाने लगा।
एक अन्य कथा अनुसार ललिता देवी का प्रादुर्भाव तब होता है जब ब्रह्मा जी द्वारा छोड़े गए चक्र से पाताल समाप्त होने लगा। इस स्थिति से विचलित होकर ऋषि-मुनि भी घबरा जाते हैं, और संपूर्ण पृथ्वी धीरे-धीरे जलमग्न होने लगती है। तब सभी ऋषि माता ललिता देवी की उपासना करने लगते हैं। प्रार्थना से प्रसन्न होकर देवी जी प्रकट होती हैं तथा इस विनाशकारी चक्र को थाम लेती हैं। सृष्टि पुन: नवजीवन को पाती है।

