जल, जंगल और जमीन की चिंता योगी के संस्कार

-गिरीश पांडेय
आबादी के लिहाज से देश के सबसे बड़े सूबे (उत्तर प्रदेश) के मुख्यमंत्री हैं। वह गोरखपुर स्थित उत्तर भारत की प्रमुख पीठ गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर भी हैं। इस पीठ की मान्यता नाथ संप्रदाय के मुख्यालय के रूप में है। संयोग से योगी का जन्मदिन विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून) को ही पड़ता है।

मूल रूप से प्राकृतिक रूप से बेहद संपन्न देवभूमि उत्तराखंड से ताल्लुक और पिता का वन विभाग से रिश्ता होने के नाते प्रकृति (जल, जंगल और जमीन) से प्रेम उनको विरासत में मिला है। इन सबके प्रति उनकी प्रतिबद्धता भी दिखती है। समग्रता में इन्ही से मिलकर पर्यावरण भी बनता है।

मुख्यमंत्री बनने के बाद हर साल रिकॉर्ड पौधरोपण और गोरखपुर के जिस गोरक्षनाथ पीठ के वह पीठाधीश्वर हैं, उसके 50 एकड़ से अधिक विस्तृत परिसर की लकदक हरियाली, पूरी तरह पॉलिथीन मुक्त परिसर, गोशाला में वर्मी कम्पोस्ट (केचुआ खाद की यूनिट), बारिश के पानी के हर बूंद को सहेजने के लिए आधुनिक सोखता (टैंक) और चढ़ावे के फूलों से बनने वाली अगरबत्ती की इकाई इसका सबूत है। इसमें से अगरबत्ती की इकाई को छोड़ दें तो प्रकृति संरक्षण के ये सारे काम तब के हैं जब वह गोरखपुर के सांसद, पीठ के उत्तराधिकारी और पीठाधीश्वर रहे। सीएम बनने के बाद भी जल, जंगल, जमीन से लगाव का यह सिलसिला जारी है।
हरियाली की चादर और बढ़े इसके लिए मुख्यमंत्री बनने के साथ ही हर साल जून जुलाई में आयोजित होने वाले वन महोत्सव में पौध रोपण का रिकॉर्ड लक्ष्य रखा। हर अगले साल अपने ही रिकॉर्ड को तोड़ा भी। इस क्रम में 2018-19 में 11 करोड़, 2019-20 में 20 करोड़, 2020-21 में 25 करोड़ पौधे लगाए गए। 2021-22 में 30 करोड़ पौधरोपण का लक्ष्य है।

मुख्यमंत्री का शुरू से मानना रहा है कि टीम वर्क के नतीजे अच्छे होते हैं। अगर जनता भी इससे जुड़ जाए तब तो और भी अच्छे। लिहाजा इस अभियान के लिए उन्होंने वन विभाग को नोडल एजेंसी बनाते हुए हर विभाग के लिए लक्ष्य तय कर दिए।
पौध रोपण का यह कार्यक्रम जन आंदोलन बने इसके लिए प्रदेश के कृषि जलवायु क्षेत्र (एग्रो क्लाइमेटिक जोन) की अनुकूलता के अनुसार संबंधित क्षेत्र में उन्हीं पौधों की नर्सरी तैयार करा कर लोगों को पौध उपलब्ध कराए गए। पहले की सरकारों की तरह यह अभियान रस्मी न बने इसके लिए हर लगने वाले पौध की जियो टैगिंग अनिवार्य कर दी गई। इस समयबद्ध अभियान का संचालन चुनाव की तर्ज पर किया गया।

पौधे हरियाली बढ़ाने के साथ बहुउद्देशीय हों इसके लिए उन्होंने पोषक तत्त्वों का खजाना माने जाने वाले सहजन पर खासा जोर दिया। सीएम का साफ निर्देश था कि विकास की दौड़ में पिछड़ गए आकांक्षात्मक जिलों (बहराइच, बलरामपुर, चंदौली, फतेहपुर, चित्रकूट, सिद्धार्थनगर, सोनभद्र, श्रावस्ती) के हर परिवार को सहजन के पौधे उपलब्ध कराए जाएं। साथ ही इसकी खूबियों के बारे में भी उनको जागरूक किया जाए।
मालूम हो कि अपनी खूबियों के नाते सहजन को चमत्कारिक पौधे के रूप में भी जाना जाता है। इसकी पत्तियों एवं फलियों में 300 से अधिक रोगों की रोकथाम के गुण होते हैं। इसमें 92 विटामिन्स, 46 एंटी आक्सीडेंट, 36 दर्द निवारक और 18 तरह के एमिनो एसिड मिलते हैं। गाजर से चार गुना विटामिन ए, दूध से चार गुना कैल्शियम,केले से तीन गुना पोटेशियम, दही से तीन गुना प्रोटीन मिलता है। इसी नाते सहजन से उनका लगाव पुराना है। इसके अलावा गंगा के किनारे गंगा वन भी लगाए गए।
पर्यावरण संरक्षण में जल संरक्षण की भूमिका के मद्देनजर उनके कार्यकाल में बुंदेलखंड और विंध्य क्षेत्र में खेत तालाब योजना के तहत बड़ी संख्या में तालाब खुदवाए गए। अपने इस योजना को और विस्तार देते हुए गंगा के किनारे बड़े पैमाने पर गंगा तालाब योजना पर भी काम चल रहा है। भविष्य में इस योजना को सूबे के अन्य बड़ी नदियों के किनारे भी विस्तार दिया जाएगा। इससे कई लाभ होंगे। सूखे के समय इनका पानी स्थानीय किसानों के लिए सिंचाई के काम आएगा। बारिश के अतरिक्त पानी के संचयन से बाढ़ की समस्या भी कम होगी। इनके किनारों पर लगे पौध से मिलने वाले लाभ स्थानीय लोगों के लिए बोनस होंगे।
कुछ क्षेत्रों को छोड़ प्रदेश में पानी की नहीं उसके प्रबंधन की समस्या है। पानी का सर्वाधिक प्रयोग कृषि क्षेत्र में होता है। योगी सरकार कम पानी में अधिकतम सिंचाई हो इसके लिए सिंचाई की अपेक्षाकृत दक्ष विधा, स्प्रिंकलर और ड्रिप इरिगेशन पर 90 फीसद तक अनुदान दे रही है। बुंदेलखंड की कुछ सिंचाई परियोजनाओं को मॉडल के तौर पर स्प्रिंकलर और ड्रिप से भी जोड़ा गया है। भविष्य में इसे अन्य सिंचाई परियोजनाओं में भी जोड़े जाने की योजना है। अगर ऐसा हुआ तो यह खुद में चमत्कार होगा। इससे सिंचन क्षमता में 60 फीसद तक विस्तार होगा। साथ ही जरूरत भर पानी मिलने से उपज भी बढ़ेगी।
प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में पंपिंग सेट या नलकूप से सिंचाई होती है। डीजल से चलने वाले पंपिंग सेट से सिंचाई अपेक्षाकृत महंगी होती है। डीजल जलने से होने वाला प्रदूषण अलग से। इसके लिए सरकार बनने के साथ ही योगी ने भारी अनुदान पर मिलने वाले सोलरपंप का टारगेट कई गुना बढ़ा दिया। ये पंप लंबे समय में अपेक्षाकृत सस्ते पड़ते हैं। गर्मी में जब पानी की सर्वाधिक जरूरत होती है उस समय सूरज की भरपूर रोशनी के कारण सर्वाधिक सक्षम भी होते हैं।
रसायनिक खादों का अंधाधुंध प्रयोग जमीन, जल और लोगों के लिए खतरा बन चुका है। इसलिए सरकार का जोर जैविक खेती पर है। वर्मी कम्पोस्ट पर किसानों को अनुदान दिया जा रहा है। गो आश्रयो को आत्मनिर्भर बनाने के लिए लगातार उनसे वर्मी कम्पोस्ट की इकाई लगाने और आस पास की खेती को इसी के जरिए जैविक बनाने के लिए किसानों को जागरूक किया जा रहा है। सरकार जैविक खेती के क्लस्टर बनाकर इसे करने वाले किसानों को कृषि निवेश के रूप में अनुदान दे रही है। गंगा की निर्मलता और अविरलता के लिए उसके किनारों पर भी जैविक और औषधीय खेती को प्रोत्साहन दिया जा रहा है।
समग्रता में पर्यावरण के प्रति उनका यह नजरिया सीएम बनने के पहले से भी रहा है। गोरक्षनाथ मंदिर की गोशाला में गोबर से वर्मी कम्पोस्ट बनता है। स्थानीय अखबारों में पहले और उनके सीएम बनने के तुरंत बाद भी गोरखनाथ मंदिर में बनता है गोबर से सोना शीर्षक से छपी खबरें सुर्खियां बनी थीं। इसी तरह मंदिर परिसर में जल संरक्षण के लिए किए गए उपाय गोरखनाथ मंदिर में होती है पानी की खेती शीर्षक से सुर्खियां बनी थीं। सीएम बनने के बाद चढ़ावे के फूलों से बनने वाली अगरबत्ती से इसे और विस्तार मिला। यह देश के कुछ चुनिंदा मंदिरों में है जिसका परिसर पॉलिथीन मुक्त है। मंदिर परिसर की हरियाली और सफाई पर्यावरण संरक्षण के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का सबूत है। (लेखक यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं)



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