UN Climate Change Report: दिल्ली की झुलसाती गर्मी, मुंबई की बाढ़, हिमाचल के भूस्खलन और राजस्थान के सूखे को अगर आप अलग-अलग घटनाएं मानते हैं, तो शायद अब समय है तस्वीर को एक साथ देखने का। संयुक्त राष्ट्र (UN) और ब्रिटेन के मौसम विभाग मेट ऑफिस की नई रिपोर्ट कहती है कि अगले पांच वर्षों में पृथ्वी का तापमान रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच सकता है। यानी आने वाले सालों में दुनिया को और अधिक गर्मी, अनियमित बारिश, बाढ़, सूखा और चरम मौसम का सामना करना पड़ सकता है। यह कोई “भविष्य की कल्पना” नहीं है। भारत समेत दुनिया के कई देशों में इसके संकेत अभी से दिखाई देने लगे हैं।
आखिर रिपोर्ट में कहा क्या गया है?
रिपोर्ट के अनुसार, 2026 से 2030 के बीच किसी एक वर्ष में वैश्विक औसत तापमान औद्योगिक-पूर्व स्तर (1850-1900) से 1.5°C अधिक हो सकता है। साधारण भाषा में समझें तो — पृथ्वी पहले ही काफी गर्म हो चुकी है और अब वह उस खतरनाक सीमा के करीब पहुंच रही है, जिसके बाद मौसम का संतुलन तेजी से बिगड़ सकता है। इतना ही नहीं, वैज्ञानिकों का अनुमान है कि आने वाले पांच सालों में कोई एक वर्ष 2024 से भी ज्यादा गर्म हो सकता है। 2024 को अब तक का सबसे गर्म वर्ष माना गया था।
1.5°C का मतलब आम आदमी के लिए क्या है?
बहुत लोगों को लग सकता है कि “सिर्फ डेढ़ डिग्री” तापमान बढ़ने से क्या फर्क पड़ेगा? लेकिन जलवायु वैज्ञानिकों के अनुसार यही 'डेढ़ डिग्री' पूरी दुनिया की जीवनशैली बदल सकती है।
भारत के संदर्भ में समझिए:
1. दिल्ली-राजस्थान की जानलेवा गर्मी
2024 और 2025 में दिल्ली, राजस्थान और उत्तर भारत के कई हिस्सों में तापमान 48°C के करीब पहुंच गया था। सड़कें पिघलने लगीं, बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई और हीटस्ट्रोक से कई लोगों की मौत हुई। अगर वैश्विक तापमान लगातार बढ़ता रहा, तो ऐसी हीटवेव सामान्य बात बन सकती हैं।
2. हिमालय का खतरा
हिमाचल और उत्तराखंड में पिछले कुछ वर्षों में बादल फटना, ग्लेशियर झील फटना और भूस्खलन तेजी से बढ़े हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि हिमालयी ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इसका असर केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों के जलस्तर और करोड़ों लोगों की जल आपूर्ति पर पड़ेगा।
3. मुंबई और बेंगलुरु की शहरी बाढ़
कुछ घंटों की बारिश में मुंबई, चेन्नई और बेंगलुरु का डूब जाना अब आम खबर बन चुकी है। जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश कम दिनों में लेकिन बहुत ज्यादा मात्रा में हो रही है। यानी “कम समय में ज्यादा बारिश”।
4. किसानों पर सीधा असर
अगर मानसून अनियमित हुआ, तो सबसे बड़ा असर खेती पर पड़ेगा। कहीं सूखा, कहीं अचानक बाढ़, कहीं फसलें झुलसने की समस्या बढ़ेगी। इसका असर सीधे खाद्य कीमतों और आम आदमी की जेब पर पड़ेगा।
आर्कटिक क्यों पूरी दुनिया के लिए खतरे की घंटी है?
रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक हिस्सा आर्कटिक (उत्तरी ध्रुव) को लेकर है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि आर्कटिक क्षेत्र बाकी दुनिया की तुलना में 3.5 गुना तेजी से गर्म हो रहा है। जब वहां की बर्फ पिघलती है, तो समुद्र ज्यादा गर्मी सोखने लगता है। इससे पूरी पृथ्वी का तापमान और तेजी से बढ़ता है। सुनने में यह भारत से दूर की बात लग सकती है, लेकिन इसका असर भारतीय मानसून तक पर पड़ सकता है।
अल नीनो क्या है और भारत क्यों डरता है?
रिपोर्ट में एक मजबूत अल नीनो की भी आशंका जताई गई है। अल नीनो प्रशांत महासागर के गर्म होने की प्रक्रिया है, जिसका असर पूरी दुनिया के मौसम पर पड़ता है। भारत में अक्सर कमजोर मानसून, कम बारिश, और सूखे जैसी स्थितियों को अल नीनो से जोड़ा जाता है। यानी अगर अल नीनो मजबूत हुआ, तो किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव बढ़ सकता है।
क्या पेरिस समझौता अब सिर्फ कागज बनकर रह गया?
2015 में दुनिया के देशों ने पेरिस समझौते में वादा किया था कि तापमान वृद्धि को 1.5°C तक सीमित रखने की कोशिश की जाएगी। लेकिन वास्तविकता यह है कि:
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कोयले और तेल का उपयोग अभी भी बड़े पैमाने पर हो रहा है,
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कार्बन उत्सर्जन कम नहीं हो रहा,
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और विकासशील देशों को हरित तकनीक के लिए पर्याप्त आर्थिक मदद भी नहीं मिल रही।
यही वजह है कि वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि “समय तेजी से खत्म हो रहा है।”
क्या अभी भी स्थिति संभाली जा सकती है?
विशेषज्ञों का मानना है कि अभी पूरी तरह देर नहीं हुई है, लेकिन फैसले तुरंत लेने होंगे। भारत जैसे देशों के लिए जरूरी है कि:
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नवीकरणीय ऊर्जा (सोलर और विंड) को तेजी से बढ़ाया जाए,
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शहरों की बेहतर प्लानिंग हो,
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जल संरक्षण पर काम हो,
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और जलवायु अनुकूल खेती को बढ़ावा दिया जाए।
साथ ही आम लोगों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है — जैसे बिजली की बचत, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार व्यवहार। असली सवाल अब यही है... जलवायु परिवर्तन अब केवल वैज्ञानिक बहस नहीं रह गया है। यह हमारे घर, हमारी जेब, हमारी खेती, हमारी सेहत और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का सवाल बन चुका है। क्योंकि अगर पृथ्वी इसी रफ्तार से गर्म होती रही, तो आने वाले वर्षों में 'असामान्य मौसम' ही नया सामान्य बन सकता है।
Edited by: Vrijendra Singh Jhala