खुर्शीद अयोध्या को छोड़ें, मक्का पर लिखें

Salman khurshid
सलमान खुर्शीद की किताब का शीर्षक अयोध्यापर है और इस्लामिक स्टेट और बोको-हराम जैसे आतंकी झुंडों की बराबरी पर हिंदू संगठनों को रखकर सुर्खियां बटोर ली गई हैं। ऐसा करना यूपीए-2 के अंतिम दिनों में गढ़ी गई हिंदू आतंक की नकली अवधारणा की ही अगली कड़ी है।

वे अब सत्ता में नहीं है सो किताब लिख सकते हैं। सत्ता में थे तो भारत में भारतीयों की घुटन बढ़ाने के लिए आतंक निरोधी एक्ट बना ही रहे थे। आप अपने घर में गंदगी साफ नहीं कर सकते तो जरूरी है कि पड़ोसी के साफ घर में कूड़ा बताकर एक झूठ फैलाएं और दोनों एक बराबर साबित करें।

जहां तक अयोध्या की बात है तो सलमान खुर्शीद को यह मसला केके मोहम्मद पर छोड़ना चाहिए और उन्हें कनाडा मूल के इतिहासविद् डैनियल डान गिब्सन से मिलकर उनकी ताजा रिसर्च पर बात करना चाहिए। इसके नतीजों पर अपने समुदाय के ज्ञानवर्द्धन के लिए एक ऐसी ही विचारोत्तेजक किताब जरूर लिखनी चाहिए। हिम्मत हो तो वे इस किताब की भूमिका वसीम रिजवी से लिखवा सकते हैं। गिब्सन की रिसर्च को भारतीय मीडिया ने पूरी तरह दबाया है, जिसने जाकिर नायकों से लेकर सलमान खुर्शीदों की जमीन हिला दी है।

के केंद्र में है सऊदी अरब का मक्का शहर। रिसर्च के नतीजे इस्लामी दुनिया के बुद्धिजीवियों के बीच चर्चा का विषय बने हुए हैं। जो नतीजे सामने आए हैं, उनसे इस्लाम के उदय की एक नई कहानी और नई लोकेशन दुनिया का ध्यान खींच रही है। खुर्शीद यह जानकर हैरान होंगे कि वह आज का मक्का बिल्कुल नहीं है।

डान गिब्सन ने 30 साल इस शोध में लगाए हैं। मिस्त्र से लेकर सऊदी अरब के विश्वविद्यालयों में हजारों दस्तावेजों से लेकर कई स्थानों की जमीनी छानबीन से जो हाथ आया है, वह दिमाग हिलाने वाला है। गिब्सन ने हर आधुनिक तकनीक से इस्लाम के मूल से जुड़े प्रचलित तथ्यों को जांचा-परखा। खुर्शीद को उनका यह निष्कर्ष चौंकाएगा कि ईस्वी सन् 810 के पहले मक्का का कोई वजूद ही नहीं था। कुरान में यह नाम सिर्फ एक बार आया है। उस समय के कारोबारी मार्ग पर यह था ही नहीं। जमीन की खोदबीन से हासिल पुरातात्विक प्रमाण भी उनके पक्ष में हैं।

इस्लाम के तेज रफ्तार फैलाव में #पैगंबर की मक्का से मदीना की हिजरत, मदीना में उनका ताकतवर होना और फिर मक्का लौटना कहानी के प्रमुख शुरुआती पड़ाव हैं। उनके बाद खलीफाओं की मारकाट और कत्लेआम की लंबी श्रृंखला है। इसी के बीच इस्लाम अरब को अपने आवरण में ढकते हुए तूफानी गति से अफ्रीका और एशिया की सरहदों तक फैलता है। मक्का को सभी शहरों की मां कहा गया। पुराने दस्तावेजी विवरणों के अनुसार तो यह हरी-भरी वादी, घास और पेड़ से लदी घाटियों का मनोरम इलाका होना चाहिए।

क्या मक्का में यह सब था? यहां की मिट्‌टी के टेस्ट यह सबूत कहीं से कहीं तक नहीं देते। वहां कभी किसी तरह की वनस्पति थी ही नहीं। पुराने जमाने में एक भी पेड़ के प्रमाण नहीं है। पुरातत्व की खुदाई में किसी ऐसे शहर के अवशेषों का नामोनिशान नहीं है, जो दीवारों का शहर था।

इस्लाम पूर्व के अरब के नक्शों में मक्का कहीं नजर नहीं आया। पैगंबर के 120 साल बाद तक अरब के किसी भी पड़ोसी देश में मक्का के बारे में सुना भी नहीं गया था। जबकि दस्तावेजों में मक्का के नाम से दीवारें, खेत, बागीचे और पुराने मंदिरों के विवरण जरूर लिखे मिले।

अगर कथाएं काल्पनिक नहीं हैं तो गिब्सन का सवाल है कि तब ऐसा दिलकश शहर कहां होगा?

हज और उमरा जैसी तीर्थयात्राएं इस्लाम के पहले भी अरब की परंपरा में थीं। पैगंबर के दादा भी उमरा करते थे। वहां मंदिर थे, मूर्तियां थीं। यह काल्पनिक नहीं है। अगर वह जगह मक्का नहीं है तो कहां है? इस्लाम पूर्व के अरब में क्या हो रहा था? कारोबार और धार्मिक चहलपहल का केंद्र कौन सा था?

हम सब जानते हैं कि दुनिया भर की मस्जिदों में नमाज के लिए किब्ला की दिशा आज मक्का की तरफ है। गिब्सन की टीम ने अरब और अरब के आसपास की पुरानी 11 मस्जिदों की लोकेशन पर पड़ताल की। ये मस्जिदें मिस्त्र, लेबनान, यमन, इजरायल, सीरिया, इराक और जॉर्डन में हैं। ये सब इस्लाम के उदय के शुरुआती सवा सौ सालों के दौरान बनीं। गूगल अर्थ के जरिए इनकी किब्ला की दिशा की तरफ सीधी रेखा ग्लोब पर खींची गई। वे यह देखकर हैरान हुए कि यह मक्का की तरफ नहीं है। लेकिन चारों तरफ से इन सभी मस्जिदों का किब्ला एक नई लोकेशन की तरफ है और वह जगह है-पेट्रा (PETRA)। सारे विशेषज्ञों ने पेट्रा में डेरा डाला। हर पहाड़ी चट्‌टान को गौर देखा। जमीन के हर कोने की छानबीन की। मिट्‌टी के नमूने जांचे। जो नतीजे आए, उन्हें दस्तावेजी सबूतों से मिलाया। नतीजे देखकर अरब के दानिशमंद भी हैरान हैं।

दस्तावेजों में जिस हरी-भरी घाटी, पेड़-पौधों, पानी और नहर, दीवारों के भरपूर जिक्र हैं, वह हर चीज उसी व्यवस्था में पेट्रा में अपनी कहानी खुद कहती हुई मिली। मिट्‌टी ने बताया कि यहां हरियाली कम नहीं थी। मंदिर और मूर्तियों के ठोस सबूत पहाड़ों में आज भी देखिए। जिस हिरा पहाड़ (HIRA) को मक्का में माना जाता है, वह दरअसल यहां सही कोण पर है। उस गुफा का रहस्य भी यहीं खुला, जहां पैगंबर और फरिश्ते की मुलाकात के पक्के यकीन हैं।

गुलाबी-लाल चट्‌टानों पर चांद की आकृति एक मेहराब में आज भी है। इकट्‌ठा होने के लिए मस्जिद-अल-हराम कोई छोटी-मोटी इमारत नहीं थी। वह एक विशाल प्रांगण था, जो दो पहाड़ों के बीच 20 से ज्यादा चोकोर पत्थरों से कवर किया गया था। वे विशालकाय तराशे हुए चट्‌टानी चोकोर पत्थर आज भी उस नक्शे को पूरा करते हैं, जो एक ऐसे शहर का है, जिसे शहरों की माता कहा गया।

हिंदुओं का दावा रहा है कि इस्लाम पूर्व के काबा में कभी शिवलिंग था और सैकड़ों मूर्तियों में से एक इसकी भी पूजा होती थी। ताज्जुब है कि पेट्रा की सदियों पुरानी चट्‌टानों में शिवलिंग और उससे लिपटे नाग जैसी रचनाएं भी मिलीं हैं और उस पवित्र गुफा में वैसा ही चंद्र, जो शिव की जटाओं में शोभायमान है। हालांकि इस समानता को डान गिब्सन नहीं मानते। उनका कहना है कि नाग और शिवलिंग के संयोंग सदियों से हवाओं के कारण पत्थरों पर उभर आए। ऐसी समानताएं ग्रीक, रोमन और मेसोपोटामिया के स्थानीय देवताओं की भी पेट्रा में हैं, क्योंकि यहां इन सब इलाकों के लोग कारोबारी काफिलों में जाया करते थे। उनके साथ उनकी सांस्कृतिक विरासत को भी यहां फलने-फूलने के मौके मिले थे। #dangibson का यकीन है कि असल किब्ला यहीं था। पैगंबर यहीं थे। काबा यहीं था। इस्लाम का जन्म स्थान।

फिर मौजूदा मक्का कहां से और कब प्रकट हो गया?

इस सवाल का जवाब पैगंबर के अवसान के बाद हुई खूनी जंगों की धूल-धक्कड़ में खोया हुआ है। पैगंबर के अवसान के बाद पेट्रा के गवर्नर अब्दुल्ला इब्न जुबैर ने खुद को खलीफा घोषित कर दिया। दमिश्क से इस्लामी दुनिया पर राज कर रहे उम्मैद खलीफा ने जुबेर के खिलाफ फौज खड़ी कर दी। जुबैर ने इस शहर को ही तबाह कर दिया। मंदिर जमीन तक खोद डाले। पवित्र काले पत्थर को वह रेशमी कपड़े में बांधकर ले गया। यह अल-तबारी के विवरण हैं कि इस जंग के दौरान दमिश्क में खलीफा की मौत हो गई और उसके 13 साल के बेटे की ताजपोशी हुई। 40 दिन बाद उसे भी कत्ल कर दिया गया। फौज को दमिश्क लौटने का हुक्म हुआ।

गिब्सन अब दूरी का आकलन करते हैं। मक्का से दमिश्क की दूरी 1400 किलोमीटर है। कम से कम 43 दिन का लंबा सफर। सियासी मारकाट और उठापटक के उस भीषण दौर में एक फौज को इतनी लंबी दूरी लांघना नामुमकिन था। अगर वह शहर पेट्रा है तो यह गुत्थी सुलझी हुई ही है। दस्तावेजों में इसी दौरान दर्ज है कि पवित्र शहर में इब्न जुबैर घोड़े और ऊंट लेकर आया। यह बरबाद हो चुके पवित्र शहर को खाली कराने का इंतजाम था।

नया काबा अब सऊदी अरब में बनना था। अल-तबारी सबसे भरोसेमंद सूत्र माना गया है, जिसने इस दौरान हर साल के ब्यौरे लिखे। जहां हर साल के ब्यौरे काफी विस्तृत और कई पन्नों में हैं। वहीं 70 वें साल के इस अहम घटनाक्रम को कुछ पंक्तियों में ही समेट दिया गया है। विशेषज्ञों का सवाल है कि क्या जानबूझकर बाद में इतिहास से कुछ गायब किया गया? 6 माह और 17 दिन की जंग में अल अज्जाज से इब्न जुबैर हार गया।

उम्मैया खलीफाओं के समय किब्ला की दिशा पेट्रा की तरफ है। अब्बासी खलीफाओं के आते ही बदलाव होते हैं। किब्ला की दिशा मक्का की तरफ की जाती है। पुरानी मस्जिदों में किब्ला की नई दिशा बताने के लिए दिशा सूचक दीवारों पर टांगे जाते हैं। नई मस्जिदों का नक्शा नई दिशा के मुताबिक बनने लगता है। इनमें किबला की दिशा स्पष्ट करने के लिए ताक के निर्माण की प्रथा 79 साल बाद शुरू होती है। कूफा और मदीना वाले मक्का की तरफ मुंह करने लगे। बागियों के मुंह पेट्रा की तरफ रहे। इस्लाम की दूसरी सदी में बनी बसरा और कुछ सीरियन मस्जिदों के निर्माता भ्रम में रहे। उनका किब्ला आप गूगल सर्च करेंगे तो पेट्रा और मक्का के बीच भटका हुआ पाएंगे। पुराने मुसलमानों की आस्था पेट्रा में रही। कई टुकड़ों में बट चुके इस्लामी धड़ों में नए लोगों ने मक्का की तरफ मुंह किया।

सन 754 में खलीफा अल मंसूर ने बगदाद को अपना ठिकाना बनाया। गोलाकार आकृति में एक नया शहर बसा, जो दो किमी के घेरे में 767 में बनकर तैयार हुआ। यहां मस्जिदों का किब्ला मक्का की तरफ किया गया।

दिलचस्प यह है कि उम्मैयदों और अब्बासी खलीफाओं के राज में जो हमलावर लुटेरे स्पेन, अफ्रीका से लेकर भारत में सिंध तक इस्लामी परचम लेकर कब्जा जमाने गए, वहां की समकालीन मस्जिदों में किब्ला की दिशा उस दौर के इस बड़े बदलाव की कहानी बयान करती है। आज के पाकिस्तान में एक पुरानी मस्जिद के अवशेष मक्का में अपना किब्ला दर्शाते हैं। खलीफाओं की आपसी लड़ाई में पुराने दस्तावेज जला डाले गए। अरब में यह साहित्यिक शून्यता का समय कहा गया। अब्बासियों ने अपने ढंग से लिखवाया। इस्तांबुल से लेकर समरकंद में अब्बासियों के समय की कुरान की प्रतियां मिलती हैं, जो पैगंबर के दो सौ साल बाद वजूद में आईं।

गिब्सन के शोध के मुताबिक सन् 713 के आसपास मुसलमानों का पवित्र केंद्र मक्का हो जाता है। पेट्रा इतिहास के अंधेरे में खो जाता है। पेट्रा को पुरानी भाषा में भी कहा जाता था। अरबी लिपि में एक बेहद मामूली बदलाव से मूल शब्द बनता है। इस्लाम की युवा पीढ़ी के चर्चित व्याख्याकार हारिस सुल्तान और गालिब कमाल भी इस्लामी अतीत से जुड़ी इस अहम खोज पर अपने यूट्यूब चैनलों पर बहस कर रहे हैं। जो भी हो, लेकिन 713 के आसपास का यह वही मनहूस समय है, जब मुहम्मद बिन कासिम नाम का एक हमलावर लुटेरा सिंध पर धावा बोलता है। सिंध के मालामाल शहर कुछ ही महीनों के अंतराल से अरब के जाहिलों के हाथों बरबाद कर दिए गए। यह भारत भूमि पर एक लंबे ग्रहण की शुरुआत का समय है...
गिब्सन के शोध पर केंद्रित यह सवा घंटे की डॉक्युमेंटरी देखकर ही विचार करें

(आलेख में व्‍यक्‍त विचार लेखक के निजी अनुभव हैं, वेबदुनिया का इससे कोई संबंध नहीं है।)



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