कांग्रेसी मंडप में एक पांच साला स्यापा
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खां, इस बार पूरी उम्मीद थी कि सियासत में दस साल बाद अपनी दुकान सजेगी। सरकार बनना तो ते था ई। चिंता तो खाली इस बात की थी के मंतरी बनेंगे के नई। महकमा कोन सा मिलेगा। मलाई कहां से निकलेगी। पुराना कमाया हुआ इन सालों में निकल गया। लोकल लेविल पे थोड़ी भोत सेटिंग करी थी। मगर उससे क्या होता हे। टिकट के वास्ते कित्ती जुगाड़ भिड़ाई थी। साब को सलाम करा था। भैया के पेर पड़े थे। दलालों को भेंट चढ़ाई थी। जो फार्मूला चले, उसी में फिट होने को जमीन आसमान एक करा था। मगर चला भी तो पब्लिक का फार्मूला चला। अब क्या करें। कोन को दोष दें।
आप यकीन मानो के पिरजा को सेट करने अपन महाराज तक को ले आए। खून-पसीना एक करा। शिवराज को पानी पी-पी के कोसा। बीजेपी को हर मुमकिन लतियाया। मोदी को नकारा। मंच पे हाथों में हाथ लेके, खींसे निपोरते फोटू खिंचवाए। हम सब साथ हे के बयान जारी करवाए। भीतर ई भीतर एक होने का हर मुगालता दूर करते रिए। इसको टांग मारी तो उसको धोबीपाट। दांव ये रिया के सरकार बनी तो अगला सीएम न बन जाए। राहुल भैया को बताते रिए के सब उम्दा चल रिया हे। सबने हवा यूं बनाई के बस सरकार बनने ई वाली हे। अफवाहबाजों को भी मेनिज करा। माहोल बना के कांटे की टक्कर हे। टक्कर तो थी, मगर हाथी ओर चूहे की। अरे, दगा तो इस पब्लिक ने करा हे, जो सब जान रई थी। मगर अपन ई पब्लिक के मन को ई नई पिचान रिए थे। अब पांच साल यूं ई कटेंगे।
