ब्रिटेन में कोविड वैक्सीन पर भारतीय समुदाय की हिचकिचाहट

DW| Last Updated: शनिवार, 13 फ़रवरी 2021 (12:28 IST)
के में को लेकर फैले अविश्वास और वैक्सीन लेने में आनाकानी की खबरें लगातार आ रही हैं। इसमें परिवारों और दोस्तों में व्हाट्सऐप के जरिए फैलने वाली फेक न्यूज और संदेह की बड़ी भूमिका है।
इन संदेशों में वैक्सीन में इस्तेमाल होने वाले पदार्थों पर शक जाहिर किया गया है, जैसे कि वैक्सीन शाकाहारी है या नहीं, उसमें किसी प्रकार के मीट या जानवरों का फैट इस्तेमाल हुआ है या नहीं। लगातार इस बात की कोशिशें हो रही हैं कि भारतीयों को वैक्सीन लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। हाल ही में हुए एक सर्वे के जरिए यह पता लगाने की कोशिश भी की गई कि भारतीयों पर महामारी का क्या असर हुआ और वैक्सीन को लेकर उनका नजरिया क्या है?
गौरतलब है कि कोविड महामारी के दूसरे चरण में दक्षिण एशियाई मूल के लोगों में मौत का खतरा कई गुना ज्यादा बताया गया है। यह बात पहले अश्वेत समुदाय के बारे में कही गई थी। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय समेत कई संस्थानों ने मिलकर हाल ही में एक सर्वे किया जिसके नतीजे ज्यादा उत्साहजनक नहीं रहे। 2,320 ब्रिटिश भारतीयों से हासिल किए गए इस सर्वे में केवल 56 फीसदी ने वैक्सीन लेने में दिलचस्पी दिखाई जबकि 44 फीसदी ने वैक्सीन ना लेने या फिर असमंजस में होने की बात कही। खासकर मर्दों के मुकाबले महिलाओं की दिलचस्पी वैक्सीन लेने में काफी कम दिखाई दी।
जो वजहें गिनाई गई हैं उसमें वैक्सीन पर जानकारी के अभाव को जिम्मेदार ठहराया गया जबकि कुछ लोगों का यह भी कहना था कि उन्हें वैक्सीन की उतनी जरूरत नहीं है जितनी शायद की परेशानियों से जूझ रहे लोगों को होगी, इसलिए अगर उन्हें बुलाया भी जाए तो वे वैक्सीन लेने से इनकार कर देंगे।

इस सर्वे में हिस्सा लेने वाले कुल लोगों में तकरीबन आधी संख्या पंजाबी समुदाय से है, जबकि एक चौथाई गुजराती समुदाय से हैं। गुजरात से संबंध रखने वाले जगदीश मेहता, उत्तर-पश्चिमी लंदन के सबसे विविधता वाले इलाकों में शामिल हैरो में रहते हैं। बातचीत में उन्होंने बताया कि जब एक के बाद एक कई वैक्सीन आ गईं और उनके इस्तेमाल की इजाजत मिल गई, तो मेरे सभी नजदीकी लोगों में एक डर था कि आखिर कौन सी वैक्सीन सही होगी। इस पर जानकारी नहीं मिल पा रही थी। मीडिया में आई रिपोर्टें भी स्थिति को साफ नहीं कर पाईं। इससे समझ ही नहीं आ रहा था कि हमें क्या करना चाहिए।
विश्वास पैदा करने की कोशिशें

शोधकर्ताओं ने इन आंकड़ों का इस्तेमाल इस बात पर जोर देने के लिए किया है कि वैक्सीन को लेकर फैली भ्रांतियां और फेक न्यूज के जाल को तोड़ने के लिए समुदाय केंद्रित अभियान चलाए जाने की जरूरत है। विश्वास पैदा करने की इसी मुहिम के तहत ब्रिटेन में मस्जिदों और मंदिरों को वैक्सीन अभियान में हिस्सेदारी के लिए जोड़ा गया है।

इन्हीं कोशिशों के तहत ऐसे कई वीडियो जारी किए जा रहे हैं जहां जाने-माने चेहरे वैक्सीन से जुड़े डर को कम करने की कोशिशें करते नजर आएंगे। इसमें टेलीविजन के मशहूर चेहरों के अलावा कॉमेडी की दुनिया से असीम चौधरी, संदीप भास्कर और रोमेश रंगनाथन जैसे नाम हैं, जो वैक्सीन पर गलतफहमियों को दूर करने के लिए आवाज बुलंद कर रहे हैं। दक्षिण एशियाई समुदायों में जहां वैक्सीन पर जानकारी और भ्रम के बीच लकीर खीचने की चुनौती है, वहीं जानकार मानते हैं कि अश्वेत समुदाय में अविश्वास की वजह नस्लीय भेदभावपूर्ण सामाजिक ढांचा और चिकित्सीय अनुसंधानों का इतिहास है जहां अश्वेतों को शोध के लिए इस्तेमाल किया गया।
गलत सूचनाओं का जाल

महामारी ने जहां ब्रिटेन के अश्वेत और दक्षिण एशियाई समुदायों की स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच के मामले में गैर-बराबरी की गंभीर स्थितियों को उजागर किया है, वहीं इन समुदायों में वैक्सीन को लेकर गलत सूचनाओं के प्रसार की काट ढूंढना भी अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। ब्रिटिश स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि वे स्थानीय काउंसिलों को अतिरिक्त धनराशि मुहैया कराई जा रही है ताकि वे सही सूचनाएं फैलाने के लिए पूरी कोशिश कर सकें।
ब्रिटेन में कोविड वैक्सीन उपलब्ध करवाने की जिम्मेदारी संभालने वाले मंत्री नदीम जहावी ने अपने लिखित बयान में कहा है कि ऐसा हर व्यक्ति जिसे वैक्सीन मिलनी चाहिए, उसे हम वैक्सीन देंगे चाहे वह किसी भी धर्म या समुदाय का हो। फेक न्यूज और फोन पर फैलने वाली गलत सूचनाएं, सरकारी कदमों पर अधूरी जानकारियों और तेजी से तैयार हुई वैक्सीन के प्रभावों पर भ्रम, ये सब मिलकर लोगों के भरोसे को हिला रहे हैं। जातीय समुदायों में विश्वास बहाली की चुनौती लगातार बनी हुई है, क्योंकि तमाम कोशिशों के बावजूद आंकड़े बार-बार इस बात की ओर इशारा करते हैं कि रास्ता अब भी लंबा है और लड़ाई अभी बाकी है।



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