कोरोना की दूसरी लहर से कैसे बचा भारत का शराब कारोबार

DW| पुनः संशोधित शनिवार, 31 जुलाई 2021 (12:07 IST)
कोरोनावायरस (Coronavirus) की पहली लहर के दौरान के कारोबार को भारी घाटा हुआ था लेकिन इस साल कोरोना की दूसरी लहर में लगे लॉकडाउन के दौरान शराब कारोबार को खास नुकसान नहीं झेलना पड़ा, बल्कि बीयर समेत कई अन्य शराबों की बिक्री बढ़ी।
साल 2020 में भारत के शराब निर्माताओं और दुकानदारों को करोड़ों लीटर शराब नाली में बहानी पड़ी थी। मार्च 2020 के अंत में लगे देशव्यापी लॉकडाउन के चलते ऐसा हुआ था। खासकर बीयर को लॉकडाउन की सबसे ज्यादा मार झेलनी पड़ी थी क्योंकि इसे लंबे समय तक स्टोर करके नहीं रखा जा सकता और इसकी सबसे ज्यादा बिक्री भी गर्मियों में ही होती है।

एक अनुमान के मुताबिक भारत में सालभर में बिकने वाली कुल बीयर की 60 फीसदी सिर्फ मार्च से सितंबर के बीच बिकती है। लेकिन पिछले साल इनमें से कई महीनों में लॉकडाउन लगा हुआ था और शराब की दुकानें और बार बंद थे। लेकिन साल 2021 में कोरोना की दूसरी लहर में लगे लॉकडाउन के दौरान शराब कारोबार को खास नुकसान नहीं झेलना पड़ा और बीयर सहित अन्य शराब की बिक्री भी बढ़ती रही।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पिछले साल के अंत में त्योहारों के दौरान शराब की मांग में बढ़ोतरी हुई, जो उसके बाद से ही बनी हुई है। इससे लॉकडाउन का भारी नुकसान झेलने वाली शराब कंपनियों को उबरने में बहुत मदद मिली है। बीयर की बात करें तो इसे बनाने वाली कंपनियों (यूनाइटेड ब्रुअरीज, बीरा 91 और सिंबा क्राफ्ट बीयर) जैसी सभी कंपनियों को इस दौरान फायदा हुआ है।

वित्त वर्ष 2021 की आखिरी दोनों तिमाहियों में सर्दियों के मौसम के बावजूद बीयर से कमाई पिछले साल के मुकाबले ज्यादा रही है। लेकिन यह हुआ कैसे? भारत में कोरोनावायरस की दूसरी लहर के दौरान जब ज्यादातर उद्योग-धंधों को पहली लहर की ही तरह या उससे भी ज्यादा घाटा देखना पड़ा, शराब उद्योग कैसे इससे बचा रह गया?

दूसरी लहर में नहीं झेलना पड़ा नुकसान
पिछली लहर में बीयर निर्माताओं ने सबसे ज्यादा नुकसान झेला। जानकार बताते हैं गर्मियों में बढ़ने वाली मांग को पूरा करने के लिए बीयर निर्माता इससे पहले ही अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ा देते हैं। एक बार पैक करने के बाद बीयर की उम्र 6 महीने ही होती है। जबकि बार और रेस्तरां के टैंक में तो इसे सिर्फ 14 दिन ही रखा जा सकता है। गर्मियों से तुरंत पहले खुदरा विक्रेता भी आने वाले बड़े बिक्री सीजन को ध्यान में रखकर काफी बीयर जमा कर लेते हैं।

पिछली गर्मियों में लॉकडाउन से इन सभी को झटका लगा। लॉकडाउन खुलने के बाद भी ज्यादातर जगहों पर सरकार ने शराब की होम डिलीवरी के लिए अनुमति नहीं दी। इसने भी शराब की बर्बादी को बढ़ाया था। लॉकडाउन के बाद जब शराब की दुकानें खुलीं भी, तो उन्हें सिर्फ कुछ घंटों के लिए ही खोला जाता था, जिससे ज्यादा लोग शराब नहीं खरीद पाते थे।

इसके अलावा कोरोना की पहली लहर के दौरान लोगों में शराब को लेकर कई अफवाहें भी थीं। कई लोगों को डर था कि वे शराब पीने पर कोरोना से संक्रमित हो जाएंगे। कोरोना की दूसरी लहर में यह समस्याएं नहीं रहीं। दूसरी लहर में भी कोरोना लगभग इन्हीं महीनों में चरम पर रहा, लेकिन परिस्थितियां पहली बार की तरह खराब नहीं हुईं। बीयर निर्माताओं ने पहली लहर से सबक लेते हुए प्रक्रियाओं में कई बदलाव किए, जिनसे उन्हें नुकसान से बचने में मदद मिली।

साथ ही शराब की ऑनलाइन डिलीवरी ने भी इस उद्योग को बचाने में काफी मदद की। जानकार बताते हैं कि भले ही अब शराब कंपनियों का मुनाफा बढ़ रहा हो लेकिन उनकी बिक्री अब भी कोरोना से पहले के दौर के मुकाबले कम है। अन्य सेक्टरों की तरह शराब कंपनियों का कारोबार चलाने और ऑफिस से जुड़ा खर्च फिलहाल कम हुआ है, जिससे उनके प्रॉफिट में बढ़त दिख रही है।

फिर भी घाटे में रहे रेस्तरां और बार
शराब की खुदरा दुकानों पर बीयर का स्टॉक हफ्ते भर से ज्यादा नहीं चलता, ऐसे में पिछले साल भी उन्हें उतना बड़ा घाटा नहीं हुआ था लेकिन बीयर निर्माताओं और रेस्टोरेंट्स को काफी नुकसान झेलना पड़ा था। जैसा बताया गया कि निर्माता तो घाटे से उबर गए हैं लेकिन रेस्टोरेंट और बार अब भी मार झेल रहे हैं। जून 2021 तक रेस्तरां, पब और बार में होने वाली शराब की बिक्री घटकर सिर्फ 11 फीसदी रह गई, जो साल 2019 तक 27 फीसदी हुआ करती थी।

इनका हिस्सा भी कटकर खुदरा व्यापारियों के पास चला गया है। जिससे शराब की सीधी खरीद साल 2019 के 73 फीसदी आंकड़े से बढ़कर अब 88 फीसदी से ज्यादा हो चुकी है। प्रोडक्ट्स की कंपनी रेडिको खेतान लिमिटेड के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर अमर सिन्हा भी मानते हैं, घरों में होने वाली शराब की खपत में बढ़ोतरी हुई है।

बार और रेस्तरां का बंद रहना बड़ी समस्या है। जानकार बताते हैं पिछले साल मार्च से सितंबर तक रेस्टोरेंट बंद रहे। साल के आखिरी में वहां थोड़ी-बहुत मांग बढ़ी लेकिन अब वे फिर से अप्रैल से ही बंद हैं। बार और रेस्टोरेंट मालिकों की शिकायत है कि सरकार उन्हें ही सबसे पहले बंद करती है और सबसे आखिरी में खोले जाने की अनुमति देती है। ब्रुअर वर्ल्ड के टेक्निकल एंड कंसल्टेंसी हेड अमर श्रीवास्तव बताते हैं, रेस्तरां और बार शराब के ब्रांड्स को नए प्रोडक्ट का प्रमोशन करने में मदद करते हैं। उनके बंद होने से एक पूरा सेगमेंट प्रभावित हुआ है। यहां कई नए ब्रांड भी प्रमोशन के लिए अपने प्रोडक्ट भेजते थे, अब ऐसा नहीं हो पा रहा है।

लोगों ने महंगी शराब पीनी शुरू की
इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स ने यह भी बताया कि कोरोना काल में लोगों ने महंगी शराब पीनी शुरू कर दी है। मसलन बीयर का उदाहरण लें तो लोग अब बड़े ग्रुप में बीयर नहीं पी रहे। या तो वे इसे अकेले पी रहे हैं या घर पर कुछ खास दोस्तों के साथ पी रहे हैं। ऐसे में वे ज्यादा पैसे खर्च कर प्रीमियम क्वालिटी की बीयर पी रहे हैं। यही वजह है कि बीयर निर्माता कंपनियां भी अपने प्रीमियम प्रोडक्ट का जोरशोर से प्रचार कर रही हैं और अपने प्रीमियम प्रोडक्ट को ज्यादा से ज्यादा राज्यों में पहुंचाने की कोशिश कर रही हैं। यह बातें अन्य शराब पर भी लागू होती हैं। अमर सिन्हा ने भी डीडब्ल्यू को बताया, कोरोना के दौरान महंगी शराब की खपत में बढ़ोतरी हुई है।

पिछले डेढ़ सालों में शराब से जुड़ी लोगों की आदतों में कुछ और बदलाव भी देखने को मिले हैं। अब लोग एक बार में ज्यादा से ज्यादा शराब खरीद रहे हैं ताकि उन्हें बार-बार भीड़ के बीच ठेके पर न जाना पड़े। यह बात बीयर निर्माताओं और बीयर विक्रेताओं के लिए समस्या बन गई है क्योंकि अन्य एल्कोहल पेय के मुकाबले इसकी खपत ज्यादा होती है और लोगों के ऐसा करने से बीयर दुकानों पर तेजी से खत्म हो रही है।

बीयर उपभोक्ताओं में एक और बदलाव देखने को मिला है। चूंकि वे घर पर ही इसे पी रहे हैं इसलिए वे कांच की बोतलों के बजाए कैन को ज्यादा वरीयता दे रहे हैं। कैन ज्यादा हल्के होते हैं, इन्हें कहीं ले जाना और स्टोर करना आसान होता है और इन्हें आसानी से फेंका जा सकता है। इन्हीं बदलावों को ध्यान में रखते हुए बीरा बीयर बनाने वाली बी9 बेवरेजेस ने ऐसा मल्टीपैक लांच किया है जिसे लोग आसानी से घरों में इसे स्टोर कर सकें।

भविष्य का रास्ता ऑनलाइन
पिछले साल निर्माता, रेस्तरां मालिक और उपभोक्ता तीनों ही सरकार से एल्कोहल बिक्री को ऑनलाइन करने की मांग करते रहे थे लेकिन इसे बहुत देर से और बहुत कम राज्यों में शुरू किया जा सका था। अब न सिर्फ इसके लिए कई ऐप आ गए हैं बल्कि कई खुदरा विक्रेता भी इनकी होम डिलीवरी करने लगे हैं।

रेडिको के अमर सिन्हा कहते हैं, ऑनलाइन डिलीवरी बढ़ी है और आगे भी इसके बढ़ते रहने का अनुमान है। यह आगे चलकर गेमचेंजर साबित हो सकती है क्योंकि इससे महिला ग्राहक भी आसानी से शराब खरीद सकती हैं, जबकि भारत में भीड़भाड़ वाली शराब दुकानों और ठेकों से वे खरीददारी नहीं कर सकतीं।

शराब में सरकार को प्रभावित करने की ताकत
भारत में शराब पर कानून बनाने का अधिकार राज्यों को है। ऐसे में पिछले साल राज्य सरकारों ने इन पर कोविड-19 सेस भी लगाया, जबकि पहले ही शराब पर कई टैक्स लगते हैं। कई राज्यों में तो यह कोविड-19 सेस 70 फीसदी तक रहा। जिससे इनके दामों में तेज बढ़ोतरी हुई और पहले से ही महामारी से जूझ रही शराब की खपत और घटी। हालांकि अब ज्यादातर राज्यों में इसे खत्म किया जा चुका है। बीयर की बात करें तो एल्कोहल की मात्रा कम होने के बावजूद इस पर अन्य शराब के मुकाबले 2.5 गुना ज्यादा टैक्स वसूला जाता है।

फिर भी अमर श्रीवास्तव भविष्य को लेकर आश्वस्त हैं। वे कहते हैं, भारत एक बड़ी युवा आबादी वाला देश है और यहां पर धीरे-धीरे शराब से जुड़े पूर्वाग्रह खत्म हो रहे हैं। आज से पंद्रह साल पहले इसकी सालाना प्रति व्यक्ति खपत 0.75 लीटर हुआ करती थी जो अब करीब 3 लीटर हो चुकी है। शराब की खपत के मामले में भारत अब दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश बन चुका है।

रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2020 में भारत की सरकारों को शराब पर टैक्स से 17 खरब रुपए का राजस्व मिला था, जो सेल्स टैक्स और जीएसटी से मिले टैक्स के बाद सबसे ज्यादा था। ये आंकड़े बताते हैं कि भले ही भारतीय समाज में आज भी शराब को नीची नजरों से देखा जाता हो, लेकिन इसमें सरकारों पर भी बड़े दबाव बनाने की ताकत है।
रिपोर्ट : अविनाश द्विवेदी



और भी पढ़ें :