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बहुआयामी कविताएं

Updated: सोमवार, 23 फ़रवरी 2026 (17:05 IST)
कविताएं
केवल शब्दों का अनुशासन नहीं होतीं
वे चेतना की वह खुली खिड़की होती हैं
जहां से समय, समाज और आत्मा
एक साथ झांकते हैं।
 
कविता
लिखी नहीं जाती
क्योंकि लिखना तो केवल
कलम की गति है
कविता तो
मन के उन कोनों से बहती है
जहां स्मृतियां
अनकहे प्रश्नों से उलझी होती हैं
जहां पीड़ा
मौन साधे बैठी रहती है
और प्रेम
अपनी परिभाषा खोजता रहता है।
 
बहते हुए शब्द
कभी नदी नहीं बनते
वे तो धाराएं होती हैं
जो पाठक के हृदय में उतरकर
उसके अनुभवों से मिल जाती हैं।
यहीं
कवि का एकांत
पाठक की भीड़ में बदल जाता है
और कविता
संवाद बन जाती है।
 
यह संवाद
केवल सुनने का नहीं होता
यह भीतर तक
हिलोर मारता है
हृदय की सतह पर नहीं
उसके तलघर में जाकर
अनुभूतियों को जगाता है।
जहां
रेतीले कोने हैं
जहां भावनाएं
सूखी प्रतीत होती हैं
वहीं कविता
नमी छोड़ जाती है।
 
कविता
न तो उपदेश है
न प्रदर्शन
यह आत्मा की धीमी पदचाप है
जो पाठक के भीतर
अपना घर बना लेती है।
वह पाठक
जो स्वयं को कविता में खोजता है
और कविता में
स्वयं को पाता है।
 
इसलिए
बहुआयामी कविताएं
सार्थक संवाद लिए होती हैं
क्योंकि वे
कवि से निकलकर
पाठक में पूर्ण होती हैं
और समय के साथ
एक साझा अनुभूति बन जाती हैं।
 
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लेखक के बारे में
सुशील कुमार शर्मा
वरिष्ठ अध्यापक, गाडरवारा.... और पढ़ें

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