नवगीत: सुलग रहा है मन के भीतर
सुलग रहा है मन के भीतर
घाव पुराना
किसे दिखाएं।
होंठों पर
आकर बैठी है
गुमसुम तन्हाई।
विस्मित सा मन
रिश्ते सूखे ।
लुक्का छिप्पी
खेल रही है
ग़म की परछाई
कौन सम्हाले
सब हैं भूखे।
बिखरा जीवन टूटा सा मन
हाल ठिकाना
कहां बनाएं।
बीत गए
दिन वो सुख वाले
हँसते गाते रहते थे हम
स्वप्न लोक से
सुंदर थे वो।
आश-दीप
अब लगा है बुझने
छाया घोर अंधेरा हरदम
टूटे सपने
अंदर थे जो।
सदियों जैसा अब दिन लगता
मन वीराना
किसे जगाएं।