वीणा के मधु नाद से, जागे अंतःलोक।
मां शारद करुणा मयी, हर लो अज्ञान शोक।
हंसवाहिनी मातु तुम, वाणी की आधार।
अक्षर अक्षर में रचो, बुद्धि विवेक अपार।
पीत वसन में सज रहा, ज्ञान प्रभा का रूप।
मौन तिमिर में भर गई, बोध सुधा की धूप।
श्वेत कमल पर दिव्यतम, निखिल कला की धार।
मां तुमसे संवरें सदा, शब्द अर्थ संसार।
मति भ्रम की इस धूल में, सत्य करो संधान।
मां शारद प्रस्फुट करो, अंतस का विज्ञान।
ग्रंथ हृदय बसते सदा, जिनके उर मां आप।
वाणी मर्यादित करो, हर लो सारे पाप।
शुभ पूजन अर्पित करूं, पुष्प धूप फल कंद।
तुम बिन सूना शारदे, चिंतन का आनंद।
हृदय ज्ञान का तेज दो, दो संयम विस्तार।
शब्दों में उतरें सदा, सत्य सिद्ध आचार।
उर वसंत जब जागता, अंतस बहे प्रकाश।
मां शारद की कृपा से, जगता मन विश्वास।
मां शारद मन से हरो, अहम, द्वेष के दाग।
जड़ता के इस काल में, दो चेतन अनुराग।
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