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  4. Can a son also be a guru, know The amazing life of Mother Devahuti
Written By WD Feature Desk
Last Updated : गुरुवार, 5 मार्च 2026 (16:21 IST)

क्या एक पुत्र भी गुरु हो सकता है? माता देवहूति का अद्भुत जीवन

Mother Devahuti
- लेखिका: सुखी देवी दासी (सुनीता)
 
दुनिया में मां और बेटे का रिश्ता ममता का होता है, लेकिन सतयुग में बिंदु सरोवर के तट पर एक ऐसा दिव्य संवाद हुआ, जिसने आने वाली समस्त पीढ़ियों को भक्ति और ज्ञान का मार्ग दिखाया। यह कहानी है राजकुमारी देवहूति की। 
 
एक सम्राट की भाग्यशाली बेटी होने के बावजूद उन्होंने बहुत सादगी भरा जीवन चुना। उनके जीवन की सबसे अद्भुत सच्चाई यह थी कि उनका अपना बेटा ही उनके कल्याण का आधार और गुरु बना। पर यह कोई साधारण बालक नहीं था, बल्कि स्वयं भगवान विष्णु ने संसार को सांख्य योग का ज्ञान देने के लिए 'कपिल मुनि' के रूप में अवतार लिया था। एक मां के लिए अपने ही पुत्र में साक्षात् ईश्वर को देखना और उन्हें गुरु स्वीकार करना, भक्ति की सबसे ऊंची अवस्था है।
 

वैभव का त्याग और अटूट समर्पण

महर्षि कर्दम ब्रह्मा जी के मानस पुत्र थे। ब्रह्मा जी की आज्ञा और दिव्य संकेत के अनुसार ही सम्राट मनु अपनी अत्यंत सुलक्षणा पुत्री देवहूति को लेकर कर्दम मुनि की कुटिया पर पहुंचे थे। देवहूति ने महलों के राजसी सुखों का त्याग किसी भारी मन से नहीं, बल्कि अपने पिता के वचनों और विधाता के विधान के प्रति पूर्ण निष्ठा के साथ किया।

उन्होंने कर्दम मुनि के तपोमय और कठोर जीवन को अपना सौभाग्य मानकर सहर्ष स्वीकार कर लिया। उनके हृदय में अपने पति के प्रति जो अटूट विश्वास और सेवा का भाव था, उसने कुटिया के अभावों को भी आध्यात्मिक आनंद में बदल दिया। उनका यह निस्वार्थ समर्पण आज भी शुद्ध भक्ति के एक अनुपम उदाहरण के रूप में याद किया जाता है।
 

बिंदु सरोवर: दिव्य प्राकट्य और भगवान का आश्वासन

बिंदु सरोवर के किनारे ही भगवान विष्णु ने महर्षि कर्दम और माता देवहूति की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिए थे। इसी पावन तट पर भक्तवत्सल भगवान ने माता देवहूति की निष्काम भक्ति को स्वीकार करते हुए एक अत्यंत दुर्लभ और करुणामयी वचन दिया। उन्होंने स्वयं यह आश्वासन दिया कि वे उनके घर पुत्र बनकर प्रकट होंगे:
 

तत्तस्य तेऽसदृशं वीर यत्त्वं मां निरपेक्षया।

भजस्वैकान्तभक्त्या मां सर्वगुह्याशय स्थितम्॥

 
भावार्थ: "तुम्हारी निस्वार्थ भक्ति ने मुझे जीत लिया है। अब मैं खुद तुम्हारे यहाँ जन्म लेकर तुम्हें वो मार्ग दिखाऊंगा जो तुम्हें संसार के बंधनों से आज़ाद कर देगा।" 
 
उसी दिव्य संकल्प के अनुसार, साक्षात् भगवान कपिल मुनि के रूप में प्रकट हुए।
 

ममता से शरणागति की ओर: जब पुत्र बना गुरु

समय बीतता गया और जब महर्षि कर्दम संन्यास लेकर वन की ओर प्रस्थान करने लगे, तब माता देवहूति के जीवन का वह दिव्य क्षण आया जिसके लिए स्वयं नारायण अवतरित हुए थे। यह माता देवहूति की अपनी पूर्णता और उनका अतुलनीय भाग्य ही था कि साक्षात् ईश्वर उनके पुत्र थे। उन्होंने अपनी ममता के मानवीय मोह को एक तरफ रखा और सत्य को जानने की तीव्र व्याकुलता के साथ अपने ही पुत्र के चरणों में शरण ली। 
 
माता देवहूति ने प्रार्थना करते हुए कहा:

तं त्वां गताहं शरणं शरण्यं स्वभृत्यसंसारतरोः कुठारम्।

जिज्ञासयाहं प्रकृतेः पूरुषस्य नमामि सद्धर्मविदां वरिष्ठम्॥

 
भावार्थ: "हे प्रभु! आप शरणागतों के एकमात्र आश्रय हैं और अपने भक्तों के संसार-रूपी वृक्ष को काटने के लिए कुल्हाड़ी के समान हैं। मैं प्रकृति और पुरुष के वास्तविक स्वरूप को जानने की जिज्ञासा के साथ आपकी शरण लेती हूं।"
 

भगवान कपिल की शिक्षाएं: मोक्ष का द्वार है मन

भगवान कपिल ने अपनी माता को जो ज्ञान दिया, वह श्रीमद्भागवतम् का सार है। उन्होंने सिखाया कि हमारी समस्याओं का समाधान बाहर की दुनिया में नहीं, बल्कि हमारी अपनी चेतना में है। उन्होंने बताया कि हमारा 'मन' ही हमारे बंधन और मोक्ष का असली कारण है:
 

चेतः खल्वस्य बन्धाय मुक्तये चात्मनो मतम्।

गुणेषु सक्तं बन्धाय रतं वा पुंसि मुक्तये॥

 
भावार्थ: यदि मन संसार की वस्तुओं और मोह-माया में फंसा है, तो वह बंधन (दुःख) का कारण है। लेकिन यदि वही मन परमात्मा की भक्ति और सेवा में लग जाए, तो वह स्वयं ही मोक्ष का द्वार बन जाता है। साथ ही भगवान कपिल ने यह भी स्पष्ट किया कि सच्ची भक्ति वही है जो बिना किसी स्वार्थ और बिना किसी भौतिक इच्छा के केवल भगवान की प्रसन्नता के लिए की जाए (अहेतुकी भक्ति)।
 

निष्कर्ष

धन्य हैं माता देवहूति, जिनके पुत्र स्वयं भगवान हैं। उनकी वास्तविक महानता इसमें है कि उन्होंने अपने पुत्र में साक्षात् ईश्वर को पहचाना और उनके प्रति पूर्ण शरणागति व्यक्त की। भगवान कपिल के उपदेशों को जीवन में उतारकर उन्होंने इस भौतिक संसार से पार जाकर भगवद-धाम को प्राप्त किया।
 
यह प्रसंग हमें सिखाता है कि गुरु चाहे पुत्र के रूप में हों या पिता के रूप में, यदि हमारे मन में उनके प्रति पूर्ण श्रद्धा है और हम उनके निर्देशों का पालन करते हैं, तो इसी जन्म में उस परम लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। सत्य तो यह है कि गुरु की देह नहीं, बल्कि उनकी वाणी और आज्ञा ही शिष्य के लिए साक्षात् भगवान का आशीर्वाद होती है, जो उसे भवसागर से पार ले जाती है। यही भक्ति की पूर्णता है।

(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। 'वेबदुनिया' इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती है।)

Edited BY: Rajshri Kasliwal