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देवी सीता की पूजा का महत्व
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माता सीता की जन्म कथा
देवी सीता की पूजा का महत्व
फाल्गुन कृष्ण अष्टमी तिथि पर माता सीता की पूजा का बहुत महत्व माना गया है। हिन्दू धर्म के अनुसार माता सीता भारतीय संस्कृति में त्याग, पतिव्रता धर्म, सहनशीलता, करुणा और नारी शक्ति की सर्वोच्च प्रतीक मानी जाती हैं। साल 2026 में जानकी जयंती फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाएगी।
इस दिन श्रद्धालु विशेष पूजा, व्रत, रामायण पाठ और दान-पुण्य कर माता सीता की कृपा प्राप्त करते हैं। मान्यता है कि सीताष्टमी का व्रत करने से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति, सौभाग्य और पारिवारिक समृद्धि आती है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार माता सीता को लक्ष्मी का अवतार माना जाता है जिनका विवाह अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र और स्वंय भगवान विष्णु के अवतार भगवान श्रीराम से हुआ था।
आइए अब यहां जानते हैं माता सीता की जन्म कथा...
1 पौराणिक कथा: वाल्मिकी रामायण के अनुसार एक बार मिथिला में पड़े भयंकर सूखे से राजा जनक बेहद परेशान हो गए थे, तब इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए उन्हें एक ऋषि ने यज्ञ करने और धरती पर हल चलाने का सुझाव दिया। ऋषि के सुझाव पर राजा जनक ने यज्ञ करवाया और उसके बाद राजा जनक धरती जोतने लगे। तभी उन्हें धरती में से सोने की खूबसूरत संदूक में एक सुंदर कन्या मिली। राजा जनक की कोई संतान नहीं थी, इसलिए उस कन्या को हाथों में लेकर उन्हें पिता प्रेम की अनुभूति हुई। राजा जनक ने उस कन्या को सीता नाम दिया और उसे अपनी पुत्री के रूप में अपना लिया।
2 पौराणिक कथा: एक अन्य कथा के अनुसार कहा जाता है कि माता सीता लंकापति रावण और मंदोदरी की पुत्री थी। जिसके अनुसार सीता जी वेदवती नाम की एक स्त्री का पुनर्जन्म थी। वेदवती विष्णु जी की परमभक्त थी और वह उन्हें पति के रूप में पाना चाहती थी। इसलिए भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए वेदवती ने कठोर तपस्या की। कहा जाता है कि एक दिन रावण वहां से निकल रहा था जहां वेदवती तपस्या कर रही थी और वेदवती की सुंदरता को देखकर रावण उस पर मोहित हो गया। रावण ने वेदवती को अपने साथ चलने के लिए कहा लेकिन वेदवती ने साथ जाने से इंकार कर दिया।
वेदवती के मना करने पर रावण को क्रोध आ गया और उसने वेदवती के साथ दुर्व्यवहार करना चाहा, पर रावण के स्पर्श करते ही वेदवती ने खुद को भस्म कर लिया और रावण को श्राप दिया कि वह रावण की पुत्री के रूप में जन्म लेंगी और उसकी मृत्यु का कारण बनेंगी।
कुछ समय बाद मंदोदरी ने एक कन्या को जन्म दिया। लेकिन वेदवती के श्राप से भयभीत रावण ने जन्म लेते ही उस कन्या को सागर में फेंक दिया। जिसके बाद सागर की देवी वरुणी ने उस कन्या को धरती की देवी पृथ्वी को सौंप दिया और पृथ्वी ने उस कन्या को राजा जनक और माता सुनैना को सौंप दिया। जिसके बाद राजा जनक ने सीता का पालन पोषण किया और उनका विवाह श्रीराम के साथ संपन्न कराया। फिर वनवास के दौरान रावण ने सीता का अपहरण किया जिसके कारण श्रीराम ने रावण का वध किया और इस तरह से वे लंकापति रावण के वध का कारण बनीं।
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