देश भर के गधे खुश हैं। उनका कहना है कि बदनाम तो बहुत हुए, पर चलो अब नाम तो हो रहा है। नेता और सरकार तो कम से कम हमारे बारे में सोच रहे हैं। अब इंसानों की तरह हमारे भी अच्छे दिन आने से कोई रोक नहीं सकता। पिछले कई वर्षों से हमारे अच्छे दिनों की ट्रेन रेड सिग्नल पर खड़ी थी, सरकार ने उसे ग्रीन सिग्नल दे दिया है।
हमारी पूछ बढ़ी है—वह भी घोड़ों और खच्चरों के बराबर। यह “सबका साथ, सबका विकास” नारे के बिल्कुल अनुरूप है। डेढ़ दशक पहले ही गधों को हो गया था अच्छे दिनों का अहसास गधों का मानना है कि हमें अच्छे दिनों का अहसास तो तभी हो गया था, जब करीब डेढ़ दशक पहले भाजपा के एक बड़े नेता ने गोरखपुर की एक सार्वजनिक सभा में कहा था— “घोड़ों को नहीं मिलती घास, गधे खा रहे च्यवनप्राश।”
चूंकि नेता और मंच दोनों बड़े थे, लिहाजा उनके बयान को अखबारों ने खूब छापा। वही हमारी किस्मत का टर्निंग पॉइंट था। इससे पहले हमारी लिमिट पंजीरी तक थी। च्यवनप्राश के बारे में तो हम सोच भी नहीं सकते थे।
अंगूरीबाग मुहावरे के बाद से ही अच्छे दिनों की प्रतीक्षा थी
ऐसा नहीं है कि यह सब अचानक हो गया। हमारे अच्छे दिनों की इबारत तो उसी दिन लिख दी गई थी, जब इंसान ने गधे को “अंगूरीबाग” (अपात्रों को सारी सुविधाएं देना) जैसे मुहावरे में ढाल दिया। उसके बाद हम समय की प्रतीक्षा करते रहे। कभी तो हमारी जैसी सोच वालों का राजनीति में प्रभुत्व बढ़ेगा। और जब प्रभुत्व बढ़ा, तो रुझान भी आने लगे। अब कोई “धोबी की जगह गधे का कान उमेठने” से पहले हजार बार सोचेगा।
गधों की घटती संख्या से सरकार चिंतित
गधों का कहना है कि हमारे पास जानकारी थोड़ी देर से आती है। सुना है कि लाइवस्टॉक सेंसस 2019 के अनुसार भारत में हमारी संख्या लगभग 61% घट गई है। 2012 में हमारी संख्या करीब 3.2 लाख थी। 2019 में हम घटकर लगभग 1.2 लाख रह गए। डर यह है कि कहीं अब तक हम एक लाख से भी नीचे न पहुंच गए हों। सुना तो यह भी है कि देश के कुछ राज्यों में हम लुप्तप्राय की श्रेणी में पहुंच चुके हैं। कई ऐसे जिले हैं जहां से हमारी प्रजाति लगभग खत्म हो चुकी है। किसी दौर में राजस्थान, गुजरात और उत्तर प्रदेश में हमारी अच्छी-खासी तादाद हुआ करती थी।
गुजराती गधों का कोई जोड़ नहीं, हिमाचल वाले भी कम नहीं
गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र की हमारी हलारी नस्ल की मजबूती की मिसाल दी जाती थी। गुजरात के कच्छ और राजस्थान में मिलने वाले कच्छी और काठियावाड़ी तथा हिमाचल के स्पीति गधों का भी कोई जोड़ नहीं था। वजन लादकर क्या कमाल की चढ़ाई चढ़ते थे हम! हमारी जैसी देसी नस्लों के गधे उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश में गांव-गांव, हर ईंट-भट्ठे पर मिलते थे।
थोड़े में गुजारा करने वाले हम गधों से इंसान को क्या बैर?
कम खाकर, थोड़े में गुजारा कर, अपने मालिक के लिए हाड़तोड़ मेहनत करने वाले हम गधों से इंसानों को आखिर इतनी चिढ़ क्यों है? हर जगह हमें घुसेड़ देते हैं। “गधे की तरह पीटना”, “गधे की तरह काम करना” जैसे मुहावरों का क्या मतलब है? क्या काम करना कोई बुराई है? आप कामचोर हैं तो क्या हम भी कामचोर हो जाएं? आप तो काम करने के बजाय हर वक्त दूसरों से काम लेने में लगे रहते हैं। क्या हमसे भी यही अपेक्षा करते हैं?
काश! सरकार हमारे सींग के बारे में भी सोचती
सरकार ने हमारे संरक्षण और संवर्धन के लिए 50 लाख रुपए तक की सब्सिडी देने की जो घोषणा की है, हम उसका स्वागत करते हैं। गधों के मुताबिक ज्ञान-विज्ञान ने बहुत तरक्की कर ली है। काश! सरकार हमारे सींग के बारे में भी कुछ सोचती। एक बार सींग आ जाती, तो “गधे के सिर से सींग” वाला मुहावरा भी खत्म हो जाता। और जो लोग हर जगह हमें प्रतीक बनाकर हमारा अपमान करते रहते हैं, हम भी उनकी थोड़ी खोज-खबर ले लेते। दुलत्ती के साथ अगर सींग भी होते, तो कितना अच्छा लगता! सुना है घोड़े और खच्चर सरकार के इस कदम से खास खुश नहीं हैं। (यह लेखक के अपने विचार हैं, वेबदुनिया का इससे सहमत होना जरूरी नहीं है)