60 वर्ष की उम्र के बाद की जिंदगी की पारी को T-20 मैच की तरह बेखौफ खेलें। हर गेंद को बाउंड्री के बाहर भेजने का प्रयास करें। क्योंकि आप कब जिंदगी से आउट हो जाएं — क्या ठिकाना?
पिछले दिनों मित्र कुमार गिरीश की बेटे की शादी में दिल्ली जाना हुआ था। इत्तेफ़ाकन इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के मेरे अभिन्न मित्र पकंज उपाध्याय (जज) भी किसी विवाह समारोह में भाग लेने अहमदाबाद से दिल्ली आए थे। दो और अभिन्न इलाहाबादी मित्र ब्रिगेडियर आनंद तिवारी और आदर्श क्रमशः ग्रेटर नोएडा में ही रहते हैं। बातचीत हुई तो तय हुआ कि दिल्ली प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में मिलते हैं। वहां आदर्श के मित्र विक्रम उपाध्याय भी थे। उसके बाद बड़े भाई और यूनिवर्सिटी के सीनियर सुनील त्रिवेदी से मिलने राष्ट्रपति भवन चलते हैं।
तय प्रोग्राम के मुताबिक ताबिक दोपहर बाद सभी लोग प्रेस क्लब पहुंचे। काफी की चुस्कियों के बीच जैसे इलाहाबादी मित्रों में बातचीत होती है, वैसे ही होने लगी। बातचीत के दौरान ही एक मित्र ने +60 वाली ये बात कही। सुनने में यह एक सामान्य-सी टिप्पणी लगी, लेकिन भीतर कहीं गूंजती रह गई। लगा, सचमुच हम जीवन को उम्र के खांचों में क्यों बांध देते हैं?
+60 जिंदगी का अल्पविराम है, पूर्ण विराम नहीं
हमारे यहां 60 वर्ष की आयु को अक्सर “सेवानिवृत्ति” का पर्याय मान लिया जाता है। जैसे यह किसी सक्रिय जीवन का विराम चिह्न हो। जबकि सच्चाई यह है कि यह एक कामा है — पूर्ण विराम नहीं। यह वह पड़ाव है जहां अनुभव, धैर्य और समझ अपने चरम पर होते हैं। जिम्मेदारियों का बोझ अपेक्षाकृत हल्का हो चुका होता है और निर्णय लेने की स्वतंत्रता पहले से अधिक होती है। फिर भी, समाज और कभी-कभी हम स्वयं, इस उम्र के बाद अपने सपनों की उड़ान को सीमित कर लेते हैं। यह सोचकर कि अब क्या नया किया जा सकता है? लेकिन इतिहास इस सोच को बार-बार झुठलाता है।
जिन्होंने इस सच को समझा उन्होंने इतिहास रच दिया
कर्नल हारलैंड सांडर्स ने 65 वर्ष की उम्र में KFC की नींव रखी। उस उम्र में जब अधिकतर लोग विश्राम की सोचते हैं, उन्होंने संघर्ष की नई कहानी लिखी। फ्रैंक मैककार्ट ने 66 वर्ष की उम्र में अपनी पहली पुस्तक Angelas Ashes लिखी। यह पुस्तक इतनी चर्चित हुई कि उन्हें Pulitzer Prize से सम्मानित किया गया। ग्रैंडमा मोसेस ने 78 वर्ष की उम्र में पेंटिंग शुरू की। उन्होंने अपने ग्रामीण जीवन के दृश्यों को कैनवास पर उतारा और विश्वप्रसिद्ध कलाकार बन गईं। फौजा सिंह ने 89 वर्ष की उम्र में मैराथन दौड़ना शुरू किया और 100 वर्ष की आयु में भी मैराथन पूरी कर दुनिया को चौंका दिया।
उम्र जैविक होती है, जज्बे की कोई उम्र नहीं होती
ये उदाहरण बताते हैं कि उम्र शरीर की हो सकती है, जज़्बे की नहीं। असल सवाल यह है कि हम अपने भीतर के उस “पावर हाउस” को कितना सक्रिय रखते हैं। हौसला ही जीवन की वास्तविक ऊर्जा है। यह वही शक्ति है जो असफलताओं के बाद भी हमें खड़ा करती है। यह वही ईंधन है जो कहता है — अभी बहुत कुछ बाकी है। अपने इस हौसले पर भरोसा रखें। इनको स्थाई साथी बना लें। हर दिन का नई उम्मीदों का स्वागत करें। जिंदगी की पिच आपकी प्रतीक्षा कर रही है। यह सोचें कि +60 के बाद जीवन का अर्थ केवल समय बिताना नहीं, बल्कि समय को सार्थक बनाना होना चाहिए।
अपने तजुर्बे, संघर्ष के बूते इस उम्र में आप बहुत कुछ कर सकते
यह वह उम्र है जब आप वह कर सकते हैं, जिसे कभी जिम्मेदारियों ने रोक दिया था — लेखन, संगीत, यात्रा, सामाजिक सेवा, नया व्यवसाय, या कोई पुराना अधूरा सपना। जिंदगी की पिच अभी भी आपकी प्रतीक्षा कर रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब आप अनुभव के साथ खेल रहे हैं। आप जानते हैं कि कब रक्षात्मक खेलना है और कब आक्रामक। संभव है किसी दिन आप भी युवराज सिंह की तरह हर बाल पर छक्का मारकर इतिहास पुरुष बन जाएं। वैसे इस उम्र में एक ओवर में एक दो छक्के ही कई छक्कों के बराबर होता है।
कुल मिलाकर उम्र कैलेंडर पर दर्ज एक संख्या है। जीवन की असली पहचान आपका साहस, आपका दृष्टिकोण और आपका जज़्बा है। लिहाजा जिंदगी की दूसरी पारी को संकोच से नहीं, आत्मविश्वास से खेलिए। क्योंकि इतिहास सिर्फ युवाओं का नहीं होता — साहसियों का होता है। इतिहास इसका साक्षी है। उदाहरण आपके सामने है।