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Last Updated : बुधवार, 11 मार्च 2026 (16:58 IST)

सीता परित्याग पर दोहे

माता सीता का फोटो
सन्नाटे में थी सभा, सम्मुख खड़ा समाज।
कठिन घड़ी थी राम को, चुनना धर्म-जहाज॥
 
धोबी तो बस नाम था, संशय था चहुं ओर।
मर्यादा की डोर थी, खींची दोनों छोर॥
 
त्याग नहीं परित्याग था, सुधि लेना यह बात।
जग के हित ही राम ने, सहे विरह के घात॥
 
लोक-लाज की कीच को, लेकर अपने अंग।
सीता को रक्षित किया, होकर के बदरंग।
 
शिक्षा,रक्षा साधना,सीता रहे अनाम।
वाल्मीकि गुरु की शरण, भेजा पावन धाम॥
 
सिया ओर जो बाण थे, रोके अपने अंग।
अपराधी सिय के बने, रहे नेह के संग॥
 
महल तपोवन है बना, त्यागे सब सुख-भोग।
राम भोगते हैं विरह, जैसे कोई रोग॥
 
अग्नि परीक्षा राम की, अब तक जारी मीत।
दुनिया बस लांछन गढ़े, समझे नहीं प्रतीत॥
 
मर्यादा थी सामने, रोये अंतस राम।
राजधर्म सर्वोपरि, रिश्ते सब निष्काम॥
 
सिंहासन के साथ ही, बंधा कठोर विधान।
राम हृदय अति कष्ट था, सुनकर निंदा गान॥
 
सीता जैसी पावनी, नहीं कभी थी त्याज्य।
राज्य लोक अपवाद से, दग्ध प्रेम अविभाज्य।
 
राम हृदय थी वेदना, आंसू रहे अघोष।
राजमुकुट ने ढंक लिया, अंतस पीड़ा कोष॥
 
प्रेम अनश्वर दीप था, जलता रहा अनाम।
राजधर्म को पाल कर, त्याग दिया निज धाम॥
 
वन पथ पर सीता चलीं, हृदय धीर विश्वास।
पति की पीड़ा जानतीं, मौन रहा इतिहास॥
 
राजधर्म की धार पर, रखा हृदय निष्प्राण।
निर्णय कठिन कठोर ही, करता पुरुष महान॥
 
त्याग बना संवाद तब, युग से करता बात।
नेता पहले लोक का, फिर निज सुख की रात॥
 
राम न थे निष्कंप मन, थे संवेदन शील।
चले राजपथ राम जी, हृदय चुभा कर कील॥
 
नाम सिया का अग्र है, पीछे राघव मान।
पत्नी के सम्मान को, त्यागा निज सम्मान॥
 
प्रेमी ऐसा कौन जग, सहे जगत की रार।
प्रिया-मान की ओट में, वार दिया संसार॥
 
प्रेम विरह की अग्नि में, तपकर हुआ उजास।
रामचरित में है छुपा, सत्य त्याग इतिहास॥
 
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लेखक के बारे में
सुशील कुमार शर्मा
वरिष्ठ अध्यापक, गाडरवारा.... और पढ़ें
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