Cancer Research in Germany: कैंसर शरीर में उस तरह नहीं फैलता, जैसा माना जाता है कैंसर के प्रसंग में मेटास्टेसिस प्राथमिक ट्यूमर से उत्पन्न होने वाले द्वितीयक ट्यूमर (अर्बुद) होते हैं। मेटास्टेसिस (Metastasis) वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा कैंसर कोशिकाएं अपने मूल स्थान से हटकर, रक्तप्रवाह या लसीका प्रणाली के माध्यम से, शरीर के अन्य अंगों में फैलती हैं और वहां नए (secondary) ट्यूमर बनाती हैं। जर्मन शोधकर्ताओं ने अब दिखाया है कि मेटास्टेसिस का प्रसार अब तक की धारणा से भिन्न प्रकार से होता है।
मेटास्टेसिस को लंबे समय से कैंसर का अंतिम चरण माना जाता था। माना जाता था कि एक बार किसी अंग में टिकने के बाद, वे वहीं बढ़ते रहते हैं। डॉक्टरों का मानना था कि वे वहीं रहेंगे, दोबारा नहीं फैलेंगे। लेकिन, जर्मनी के शोधकों की एक टीम अब एक अलग निष्कर्ष पर पहुंची है।
इस टीम ने पाया है कि कुछ मेटास्टेसिस अपने मूल स्थान तक ही सीमित नहीं रहते। वे कुछ कैंसर कोशिकाओं को फिर से मुक्त कर सकते हैं। ये कोशिकाएं उसी अंग के भीतर फैलती हैं और नए ट्यूमर बनाती हैं। कुछ मामलों में उनके बढ़ने की गति, मूल मेटास्टेसिस की गति से भी अधिक होती है। विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह प्रक्रिया कई बार बहुत जल्दी ही शुरू हो जाती है - अक्सर MRI (मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग) मशीन द्वारा मेटास्टेसिस का विश्वसनीय रूप से पता लगाने से पहले ही।
मेटास्टेसिस बनते हैं नए कैंसर स्रोत
कुछ मेटास्टेसिस शुरुआती अवस्था में ही नए कैंसर स्रोत बन जाते हैं। जर्मनी में रेगेन्सबुर्ग विश्वविद्यालय के अस्पताल का आंतरिक चिकित्सा विभाग इस अध्ययन में शामिल था। इस विभाग के एक डॉक्टर और एक प्रोफ़ेसर के साझे नेतृत्व वाली टीम, दस वर्षों से अधिक समय से इस बात की जांच कर रही है कि शरीर में पैर जमाने के बाद मेटास्टेसिस कैसे विकसित होते हैं। इन वैज्ञानिकों ने पाया है कि कैंसर के मेटास्टेसिस बढ़ने और फैलने के कई प्रकार हैं।
कुछ मेटास्टेसिस तो एक ही स्थान पर रहते हैं। अन्य बहुत अधिक आक्रामक रूप से व्यवहार करते हैं। वे शुरुआती अवस्था में ही ऐसी कैंसर कोशिकाएं मुक्त करने लगते हैं, जो फिर उसी अंग में बस जाती हैं। यह अध्ययन मस्तिष्क में बनने वाले मेटास्टेसिस पर केंद्रित था। अध्ययन ने स्पष्ट रूप से दिखाया कि मस्तिष्क में कैंसर के कुछ ट्यूमर कितने भिन्न प्रकार से विकसित हो सकतेहैं: कुछ एक ही स्थान पर सघन रूप से बढ़ते हैं, तो कुछ अन्य आरंभिक अवस्था में ही कैंसर की अलग-अलग कोशिकाएं मुक्त करने लगते हैं। ये कोशिकाएं मस्तिष्क में नए स्थानों पर जा कर वहां बस जाती हैं। आंकड़े अब तक की इस धारणा का खंडन करते हैं कि कैंसर के मेटास्टेसिस केवल स्थानीय रूप से बढ़ते हैं।
मस्तिष्क बहुत संवेदनशील है
छोटे ट्यूमरों के जमघट भी विकार उत्पन्न कर सकते हैं। हमारा मस्तिष्क अपने भीतर अतिरिक्त स्थान घिरने के प्रति बहुत संवेदनशील होता है। छोटे ट्यूमर भी पक्षाघात (लकवा मार जाने), बोलने में कठिनाई होने या आधाशीशी (अधकपारी, माइग्रेन) के दौरे पड़ने जैसी समस्याएं पैदा कर सकते हैं। इसलिए, उपचार योजना में मेटास्टेसिस की संख्या महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पहले यह माना जाता था कि प्रत्येक दृश्यमान विकार सीधे प्राथमिक ट्यूमर के मूल फैलाव का परिणाम होता है। नए अवलोकन इस समझ को व्यापक बनाते हैं।
यदि मेटास्टेसिस स्वयं कैंसर कोशिकाओं को पुनः उत्पन्न करते हैं, तो बीमारी का स्वरूप और अधिक जटिल हो जाता है। जर्मनी के रेगेन्सबुर्ग विश्वविद्यालय अस्पताल में चल रहे अध्ययन के परिणाम 'नवीन उपचारों का आधार प्रदान करते हैं, हालांकि नैदानिक अनुप्रयोग के चरण में वे अभी नहीं हैं।' अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि 'हमारे परिणाम पूर्णतः नए दृष्टिकोणों और संभवतः उन नवीन उपचार रणनीतियों को आधार प्रदान करते हैं, जिन पर अन्य़था अब तक विचार नहीं किया गया है...हम विज्ञान के एक अनछुए क्षेत्र में प्रवेश कर रहे हैं।'
कैंसर के उपचारों में बदलाव
इन नए निष्कर्षों से मुख्यतः कैंसर के उपचारों में बदलाव आ सकता है। ये निष्कर्ष अभी उपचार संबंधी दिशा-निर्देशों को नहीं बदल रहे हैं। हालांकि, इनसे कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न उठते अवश्य हैं। यदि मेटास्टेसिस शुरुआती अवस्था में ही नई कैंसर कोशिकाएं फैलाते हैं, तो केवल MRI से दिखाई देने वाले विकारों का उपचार करना ही पर्याप्त नहीं हो सकता।
कैंसर के उपचार के लिए भविष्य में छोटे मेटास्टेसिस की भी गहन निगरानी, प्रणालीगत उपचारों का शीघ्र उपयोग तथा मस्तिष्क वाले मेटास्टेसिस के लिए अनुकूलित विकिरण चिकित्सा अवधारणाएं भी विकल्पों की सूची में शामिल हो सकती हैं। इसलिए, जर्मन शोधकर्ता अब कैंसर के रोगियों के लिए नए नैदानिक परीक्षणों की योजना बना रहे हैं। उनका लक्ष्य है, निष्कर्षों के प्रभावों की भलीभांति जांच करना और रोज़मर्रा के नैदानिक अभ्यास में उनकी प्रासंगिकता का मूल्यांकन करना। वे नए निष्कर्षों को प्रभावित लोगों के लिए जल्द से जल्द ठोस लाभों में बदलना चाहते हैं, ताकि कैंसर के उपचार के नए विकल्प विकसित किए जा सकें।
कैंसर के उपचार की जापानी जीवाणु चिकित्सा विधि
जापान में भी शोधकर्ता कैंसर के ऐसे अभूतपूर्व उपचारों पर काम कर रहे हैं जिनमें बैक्टीरिया सीधे कैंसर के ट्यूमर (अर्बुद) पर निशाना साध कर उसे नष्ट कर सकते हैं; कुछ मामलों में तो रोगी की प्रतिरक्षण प्रणाली से बिल्कुल स्वतंत्र रह कर भी। ये तरीके इस समय पूर्व-नैदानिक (प्री-क्लिनिकल) और नैदानिक परीक्षणों के विकास के चरण में हैं।
एयूएन थेरेपी : 'जापान एडवांस्ड इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी' और वहां के त्सुकुबा विश्वविद्यालय की एक शोध टीम ने मिलकर, UAN नाम की एक दोहरी जीवाणु चिकित्सा विधि विकसित की है। इस चिकित्सा विधि में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले दो ऐसे बैक्टीरिया का उपयोग किया जाता है, जो ट्यूमर (अर्बुद) के भीतर पहुंचने पर, आपस में मिलकर उसे रक्त की आपूर्ति को रोक देते हैं और कैंसर वाली कोशिकाओं को नष्ट कर देते हैं।
इस उपचार विधि की एक प्रमुख विशेषता यह है कि वह दुर्बल रोग प्रतिरक्षा प्रणाली वाले रोगियों के मामले में भी काफी प्रभावी है और तथाकथित 'साइटोकाइन रिलीज सिंड्रोम (CRS)' जैसे गंभीर दुष्प्रभावों से बचाती है। साइटोकाइन रिलीज सिंड्रोम, शरीर के भीतर प्रणालीगत सूजन संबंधी एक ऐसी प्रतिक्रिया है, जो रोगी के जीवन के लिए खतरा पैदा करने वाले दुष्प्रभाव के रूप में अभिव्यक्त होती है। इस सब को घ्यान में रखते हुए अगले कुछ वर्षों में एयूएन के नैदानिक परीक्षणों की योजना बनाई गई है।
फोटोबैक्टीरियम एंगस्टम : JAIST के शोधकर्ताओं ने यह भी पाया है कि प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला समुद्री जीवाणु फोटोबैक्टीरियम एंगस्टम, उसकी बनावट में बिना किसी आनुवंशिक संशोधन के, चूहों के साथ प्रयोगों में 'कोलन कैंसर' के खिलाफ एक मज़बूत एंटीट्यूमर (अर्बुद प्रतिरोधी) गतिविधि प्रदर्शित करता है।
इविंगेला अमेरिकाना : JAIST की ही एक अन्य टीम ने ज़मीन पर पड़ी पत्तियों की छांव में रहने वाले जापानी मेंढक की आंत से 'इविंगेला अमेरिकाना' नाम के बैक्टेरिया को पृथक किया। प्री- क्लिनिकल (उपचार पूर्व) अध्ययनों में सीधे अंतःशिरा इंजेक्शन द्वारा यह बैक्टेरिया दिए जाने पर उसने भी उल्लेखनीय रूप से शक्तिशाली कैंसर-रोधी गतिविधि प्रदर्शित की।
क्लोस्ट्रीडियम ब्यूटिरिकम (CBM588) : यह जीवाणु पहले से ही जापान में 'मियारिसन फार्मास्युटिकल' कंपनी द्वारा उत्पादित किया जा रहा है और एक जीवाणविक विकल्प के रूप में इसकी जांच-परख की जा रही है। अध्ययनों से पता चलता है कि यह फेफड़ों के कैंसर वाले रोगियों में कैंसर की तथाकथित 'कीमोइम्यूनोथेरेपी' की प्रभावकारिता को बढ़ा सकता है-- विशेष रूप से उन लोगों में, जिनमें PD-L1 अभिव्यक्ति कम है या जो प्रोटॉन पंप अवरोधक ले रहे हैं। PD-L1 एक ऐसा प्रोटीन है, जो कैंसर की कोशिकाओं के प्रसंग में सामान्य से अधिक मात्रा में पाया जाता है और उनकी रोग प्रतिरक्षण शक्ति को घटाता है।
बिफिडोबैक्टीरियम युक्त मुख कैंसर के टीके
बिफिडोबैक्टीरियम नामक जीवाणु का उपयोग करके ट्यूमर एंटीबॉडी (प्रतिजनों), जैसे कि WT1 प्रोटीन को आंतों की प्रतिरक्षण प्रणाली तक पहुंचाने वाले मुख-टीकों पर भी शोध चल रही है। पारंपरिक पेप्टाइड टीकों की तुलना में मुख-टीकों ने चूहों पर किये गए प्रयोगों में बेहतर ट्यूमर-रोधी गतिविधि प्रदर्शित की है। ये सभी उदाहरण शोधकार्य दर्शाते हैं कि जापान, जीवाणु-आधारित कैंसर उपचारों के अनुसंधान और विकास में अग्रणी भूमिका निभा रहा है और पारंपरिक उपचारों से परे नए रास्ते तलाश रहा है।
जापान में शोधकर्ता कैंसर के ऐसे अभूतपूर्व उपचारों पर काम कर रहे हैं जिनमें बैक्टीरिया सीधे कैंसर के ट्यूमर (अर्बुद) पर निशाना साध कर उसे नष्ट कर सकते हैं; कुछ मामलों में तो रोगी की प्रतिरक्षण प्रणाली से बिल्कुल स्वतंत्र रह कर भी। ये तरीके इस समय पूर्व-नैदानिक (प्री-क्लिनिकल) और नैदानिक परीक्षणों के विकास के चरण में हैं।