भारत भूषण सम्‍मान 2021: अपने अभीष्ट को देखते हुए उमगती हैं सुधांशु फ़िरदौस की कविताएं: अरुण देव

sudhanshu firdaus
Last Updated: मंगलवार, 16 नवंबर 2021 (13:23 IST)
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भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी कविता में पिछले चार दशकों से दिया जाने वाला सबसे प्रतिष्ठित और चर्चित सम्मान रहा है।

इसे कवि भारतभूषण अग्रवाल के सम्मान में प्रतिवर्ष कि‍सी युवा कवि की उसी वर्ष प्रकाशित किसी एक कविता पर दिया जाता रहा है। २०२१ से इसे पहले कविता संग्रह पर दिए जाने का निर्णय हुआ था, सम्मान स्वरूप 21 हजार रुपये और प्रशस्ति-पत्र दिया जाएगा।

14 नवम्बर २०२१ को इण्डिया इंटरनेशनल सेंटर के रज़ा फाउंडेशन के युवा समारोह में इस वर्ष के निर्णायक कवि आलोचक और समालोचन के संपादक ने २०२१ के लिए ३६ वर्षीय के राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित पहले कविता संग्रह- ‘‘अधूरे स्वांगों के दरमियान’ को’ देने का अभिमत देते कहा-
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२०२० में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित सुधांशु फ़िरदौस (जन्म: २ जनवरी, 1985, मुजफ्फरपुर- बिहार) के पहले कविता संग्रह अधूरे स्वांगों के दरमियानको मैं २०२१ के भारत भूषण सम्मान के लिए प्रस्तावित करता हूं।

किसी युवा के पहले कविता संग्रह का प्रकाशन जहां ख़ुद उसके लिए ख़ास अनुभव होता है, वहीं कविता की दुनिया में उसका वह पता बनता है, कवि के रूप में उसके फलने-फूलने की जड़े यहीं दबी-ढकी रहती हैं।

विस्मित करते हुए सुधांशु फ़िरदौस अपने पहले संग्रह से ही भाषा की शाइस्तगी और जनपदीय शब्दों के रचाव में कविता को संभव करने की शिल्पगत कुशलता के साथ सामने आते हैं।

देशज जीवन की धूसर मिट्टी में उनका कवि प्रकृति की समृद्धि को देखता है, जीवन को देखता है, रोज-रोज की चर्या को देखता है। इस बसेरे में नाना जीव-जन्तु, वनस्पतियां, नदी, ऋतुएं और रंग बिखरे हुए हैं। अधिकतर कविताएं अपने अभीष्ट को देखते हुए उमगती हैं।

सुधांशु दृश्य के कवि हैं। कहीं पीपल पर जुगनुओं द्वारा बुन दी गयी चादर है तो किसी कविता में अभी-अभी डूबे सूरज की लालिमा बादलों में उलझी रह जाती है।

शायद ही कोई कवि हो जिसने प्रेम के रंगों से अपनी कविता न रंगी हो। सुधांशु भी रंगते हैं। कहीं चटख पर अक्सर उदास। टूटना और बिखरना और यह सोचना कि ‘जब सारे तारे चले जाएंगे और न जाते-जाते रात भी चली जाएगी तो चांद क्या करेगा’, प्रेम में भी वह संयत हैं। वाचालता वैसे भी सच्चे प्रेमी को सांत्वना नहीं देती न ही शोभा।

कवि अपने पूर्वजों को पहचानता है, इस प्रगाढ़ता ने ही सुधांशु को संयमित किया है। मीर और कालिदास तो सीधे-सीधे आते हैं- कुमारसम्भवम्, ऋतुसंहारम्, और मेघदूत से कविताएं नि:सृत हुई हैं। हिंदी कविता अपनी समृद्ध अनेकता के साथ यहां उपस्थित है- ‘खिली है शरद की स्वर्ण-सी धूप’ जैसे। लम्बी कविताएं ख़ासकर- ‘कालिदास का अपूर्ण कथागीत’, और ‘मेघदूत विषाद’ अपनी सघनता और भारतीय काव्य-परम्परा के अक्षय औदात्त के रूप में देर तक टिकने वाली कविताएं हैं।

कवि कविता को ओझल नहीं होने देता, वैचारिक और राजनीतिक मंतव्य की कविताओं में भी। उसका मानना है कि- ‘कला-क्षेत्र में अधैर्य पाप नहीं महापातक है”, यह वह बात है जो कवि को अलग करती है और उसके कवि-भविष्य के प्रति विश्वास पैदा करती है। सजग-सचेत कवि की तरह सुधांशु वक्त को भी देखते चलते हैं।

वह पहले चूहा था
फिर बिलार हुआ
फिर देखते-देखते शेर बन बैठा
शहद चाटते-चाटते
वह खून चाटने लगा है
अरे भाई जागो,
तुम्हारे ही वरदान से
यह हुआ है.

इस कविता का शीर्षक है- तानाशाह।

मैं सुधांशु सुधांशु फ़िरदौस के उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूं और भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार समिति तथा रज़ा फाउंडेशन के प्रति हार्दिक आभार प्रकट करता हूं”

अरुण देव भारत भूषण सम्‍मान के इस वर्ष के निर्णायक हैं। वे कवि, आलोचक और समालोचनके संपादक हैं।



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