दशहरा 2026: रावण दहन का प्रचलन कब से हुआ प्रारंभ, सबसे पहले किसने जलाया पुतला
प्रतिवर्ष हिंदू मास आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को रावण दहन करके दशहरा मनाया जाता है। रावण दहन कब से किया जा रहा है और क्या है इसका इतिहास? रावण दहन की परंपरा का इतिहास काफी दिलचस्प है और धार्मिक मान्यताओं तथा ऐतिहासिक संदर्भों दोनों में इसके अलग-अलग पहलू देखने को मिलते हैं।
1. पौराणिक एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
विजय उत्सव की शुरुआत: त्रेतायुग में भगवान श्री राम द्वारा आश्विन शुक्ल दशमी को लंकापति रावण का वध करने की खुशी में पहली बार यह उत्सव मनाया गया था। यह पर्व असत्य पर सत्य और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है।
प्रतीकात्मक पुतला दहन: प्राचीन समय में मिट्टी या लकड़ी से रावण की छोटी आकृतियां बनाकर दहन करने की परंपरा थी।
रामलीला का प्रभाव: 16वीं-17वीं शताब्दी में स्वामी रामानंद और गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रामचरितमानस की रचना के बाद उत्तर भारत में 'रामलीला' का प्रचलन शुरू हुआ।
विशाल पुतला दहन: 19वीं शताब्दी के बाद रामलीला के अंतिम दिन विजयादशमी की कथा को जीवंत करने के लिए घास-फूस, कागज और पटाखों से विशाल पुतले बनाने और जलाने का रिवाज शुरू हुआ।
2. आधुनिक भारत में रावण दहन की शुरुआत
सामूहिक परंपरा: किसी एक व्यक्ति विशेष द्वारा पुतला जलाने का ऐतिहासिक रिकॉर्ड नहीं है। यह रामलीला मंडलियों और स्थानीय रियासतों द्वारा शुरू की गई एक सामूहिक सांस्कृतिक परंपरा है।
विस्थापन और सार्वजनिक रूप: 1947-48 के विभाजन के बाद देश के विभिन्न हिस्सों में शरणार्थी परिवारों के आगमन के साथ यह आयोजन बड़े सार्वजनिक सांस्कृतिक पर्व के रूप में स्थापित हुआ।
प्रमुख शहर व शुरुआत वर्ष:
रांची 1948: आधुनिक भारत में बड़े स्तर पर पहला रावण दहन पाकिस्तान से आए शरणार्थी परिवारों द्वारा किया गया।
दिल्ली 1953: ऐतिहासिक रामलीला मैदान में 17 अक्टूबर 1953 को पहली बार कपड़ों से बने रावण का दहन हुआ।
पटना 1955: गांधी मैदान में इसकी नींव 1954 में पड़ी और 1955 से विस्थापित सिख परिवारों द्वारा आयोजन शुरू किया गया।
नागपुर: यहाँ पहली बार लगभग 35 फीट ऊंचे पुतले को रस्सियों और सीढ़ियों की मदद से खड़ा कर दहन किया गया था।
3. क्षेत्रीय विविधताएं और उत्सव के रूप
उत्तर भारत
हिमाचल प्रदेश (कुल्लू): हफ्ते भर चलने वाले इस उत्सव में पारंपरिक वेशभूषा और वाद्ययंत्रों के साथ ग्राम देवताओं की झांकियां निकाली जाती हैं और रघुनाथ जी की वंदना से पर्व का शुभारंभ होता है।
पंजाब: 9 दिन के उपवास के बाद पारंपरिक मिठाइयों व उपहारों से अतिथियों का स्वागत किया जाता है और मैदानों में मेले व रावण दहन का आयोजन होता है।
उत्तर प्रदेश (सहारनपुर): शाकम्भरी देवी शक्तिपीठ पर विशाल आश्विन मेला लगता है और शिवालिक घाटी माता के जयकारों से गूँज उठती है।
पूर्वी भारत (दुर्गा पूजा)
बंगाल, ओडिशा और असम: यहाँ यह मुख्य रूप से दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है। भव्य पंडालों में माँ दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर षष्ठी से दशमी तक विशेष पूजन होता है।
विशेष परंपराएं: विजयादशमी पर पुरुष 'कोलाकुली' (आलिंगन) करते हैं और महिलाएं 'सिंदूर खेला' कर देवी को अश्रुपूरित विदाई देती हैं। इस दिन नीलकंठ पक्षी का दर्शन शुभ माना जाता है।
दक्षिण भारत (द्रविड़ प्रदेश)
तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक: यहाँ रावण दहन नहीं होता। नौ दिनों में तीन देवियों (3 दिन लक्ष्मी, 3 दिन सरस्वती और 3 दिन दुर्गा) का पूजन होता है। यह समय बच्चों के विद्यारंभ के लिए शुभ माना जाता है।
मैसूर का दशहरा (कर्नाटक): पूरे मैसूर महल को रोशनी से सजाया जाता है और अलंकृत हाथियों के साथ शहर में भव्य जुलूस निकाला जाता है।
पश्चिमी भारत
गुजरात: मिट्टी का अलंकृत 'गरबो' (घड़ा) देवी का प्रतीक माना जाता है। गरबा और डांडिया रास मुख्य आकर्षण हैं और इस अवसर पर आभूषण खरीदना शुभ माना जाता है।
महाराष्ट्र: 9 दिन माँ दुर्गा की पूजा के बाद दशमी को ज्ञान की देवी सरस्वती की वंदना होती है। बच्चे विद्यारंभ के लिए पूजन करते हैं और यह दिन गृह-प्रवेश व खरीदारी के लिए शुभ मुहूर्त माना जाता है।
मध्य भारत
छत्तीसगढ़ (बस्तर): यहाँ दशहरा राम की विजय पर नहीं, बल्कि कुलदेवी माँ दंतेश्वरी को समर्पित है। यह पर्व पूरे 75 दिनों तक चलता है, जिसकी शुरुआत 'काछिन गादि' से होकर 'मुरिया दरबार' व 'ओहाड़ी पर्व' पर समाप्त होती है।
उत्तर-पश्चिम भारत
जम्मू और कश्मीर: यहाँ 9 दिनों तक केवल जल पीकर कठिन व्रत रखा जाता है और झील के बीच स्थित प्रसिद्ध 'माता खीर भवानी' मंदिर के दर्शन करने की प्राचीन परंपरा है।

