Childrens Day | नटखट बचपन, खटपट बचपन
सौंधा-सौंधा भोला बचपन
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बचपन वही तो होता है जो कंचे और अंटियों को जेबों में भरकर सो जाए, बचपन यानी जो पतंगों को बस्ते में छुपाकर लाए, बचपन मतलब जो मिट्टी को सानकर लड्डू बनाए, बचपन बोले तो जो बड़ों की हर चीज को छुपकर आजमाएँ। बचपन यानी पेड़ पर चढ़ने के बाद जो उतरने के लिए चिल्लाए, बचपन कहें तो वो जो अंदर से दरवाजा बंद कर बड़ों की परेशानी बन जाए, कुल मिलाकर बचपन यानी शरारत, शैतानी और मस्ती की खिलखिलाती पाठशाला।
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पालकों को लगता है इनके बिना बच्चों का मानसिक विकास अधूरा रह जाएगा। सच तो यह है कि पुराने और पारंपरिक खेलों से हमने और हमारे बड़ों ने जो सीखा-समझा है वह इन अत्याधुनिक खेलों के बस की बात ही नहीं है।
धूल और माटी में सनकर ही हमने जाना कि आँगन में कितने और कैसे-कैसे पौधे हैं। छुईमुई कैसी होती है? तुलसी को आँगन की रानी क्यों कहा जाता है? घोंघें कैसे अपने ही घर को सिर पर उठाए चलते हैं। हथेली के ऊपर रेत और मिट्टी चढ़ाकर घरौंदे बनाते हुए अपना घर बनाने की सीख ले ली। जब नन्हे शंख और सीपी से उसे सजाकर आत्मीयता से थपथपाया तो खूबसूरत घर की परिभाषा भी जानी।
गेहूँ, धान, ज्वार और मूँग के इधर-उधर बिखरे दाने भीगकर कैसे अंकुरित हो जाते हैं, यही प्रस्फुटित अंकुर पहले पौधे और बाद में पेड़ बन जाते हैं, यह सब हमने किताबों में बहुत बाद में पढ़ा हमारे भोले बाल-मन ने तो बगिया में घुमते हुए ही अनुभूत कर लिया था। हो सकता है उस वक्त का समझा वैज्ञानिक रूप से पूर्णत: सत्य और वास्तविक ना हो लेकिन मिट्टी में रच-बस कर प्रकृति से जो अनमोल रिश्ता और संवेगात्मक लगाव हमारे दिलों ने उस वक्त बनाया था वह आज तक कायम है।
WD
माँ के आटा गूँथते ही चहचहाती गौरेयों का समूह खिड़की पर मँडराने लगता तो माँ बताती, देखों इसे कहते हैं समय की पाबंदी। अक्सर सोचती हूँ कि यदि बचपन में ही सबकुछ सैद्धांतिक, तार्किक और वैज्ञानिक तरीके से सीख लिया होता तो आज किस भोली समझ और मासूम ज्ञानार्जन को याद करके मुस्कराती?
बचपन आज भी भोला और भावुक ही होता है लेकिन हम उन पर ऐसे-ऐसे तनाव और दबाव का बोझ डाल रहे हैं कि वे कुम्हला रहे हैं। उनकी खनकती-खिलखिलाती किलकारियाँ बरकरार रहें इसके ईमानदार प्रयास हमें ही तो करने हैं।
देश के ये गुलाबी नवांकुर कोमल बचपन की यादें सहेजें, इसलिए जरूरी है कि हम उन्हें कठोर और क्रूर नहीं बल्कि मयूरपंख-सा मुलायम मुस्कुराता बचपन दें। उनका नटखट रूप यूँ ही खटपट करता रहे, मीठे तुतलाते बोलों से पट-पट करता रहे, बचपन के हक में यह दुआ आज हमें माँगनी ही होगी।
