बच्चे, मन के सच्चे
जिंदगी का खेल खेलना सिखाते हैं बच्चे
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बच्चे अपनी इस दुनिया को पूरी तरह भुलाकर खेलते हैं। अपनी एक अलग ही सुंदर दुनिया की रचना कर लेते हैं। वे जब खेलते हैं, उन्हें अपनी भूख-प्यास की कतई चिंता नहीं रहती। वे लगभग अपनी भूख-प्यास को भुलाकर खेलते हैं। यह मगन रहना है, अपनी दुनिया में। वे अपनी आड़ी-तिरछी लाइनों को बनाएँगे तो इतना मगन होकर कि वह उनके आनंद में बदल जाती है। उनमें कोई आकांक्षा नहीं, महत्वाकांक्षा नहीं, बल्कि बनाने का आनंद है। क्या हम मगन रहते हुए यह आनंद हासिल कर पा रहे हैं?
आप उन्हें देखिए। उनका खेल देखिए। वे एक-दूसरे का हाथ थामे खेलते हैं। कई ऐसे खेल हैं बच्चों के जो वे एक-दूसरे का हाथ थामकर खेलते हैं। उनमें सहज विश्वास होता है कि वे एक-दूसरे का हाथ थामे पकड़े रहेंगे। कभी छोड़ेंगे नहीं?
क्या हम एक-दूसरे का सहज ही हाथ थामे हैं?
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हम हैं कि या तो अतीत में जीते-मरते हैं या फिर भविष्य में जीते-मरते हैं। क्या हम वर्तमान में जीते हैं?
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