थप्पड़ फिल्म समीक्षा : चोट करता है यह थप्पड़

समय ताम्रकर| पुनः संशोधित शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2020 (15:25 IST)
एक थप्पड़। बस इतनी सी बात। क्या इस पर कोई तलाक ले सकता है? क्या इसे भूल कर आगे नहीं बढ़ जाना चाहिए? लेकिन बात है थप्पड़ के पीछे छिपी मानसिकता की। एक थप्पड़ से शारीरिक चोट बहुत छोटी हो सकती है, लेकिन आत्मा पर लगी चोट बहुत गहरी होती है।

अमृता (तापसी पन्नू) का आत्म-सम्मान अपनी निगाह में गिर जाता है जब उसका पति विक्रम (पवैल गुलाटी) एक छोटी-सी बात पार्टी में सबके सामने उसे थप्पड़ जमा देता है।

अमृता के आत्म-सम्मान को उस समय और चोट पहुंचती है जब अगली सुबह विक्रम यह सोच कर थोड़ा परेशान होता है कि लोग उसके बारे में क्या सोचेंगे? अमृता के बारे में क्या सोचेंगे या अमृता क्या सोच रही है उसकी परवाह उसे है ही नहीं। अमृता का कोई वजूद है या उसकी भी कुछ सोच है, यह बात विक्रम के दिमाग में आती ही नहीं। उसकी जिंदगी सिर्फ खुद के इर्दगिर्द ही घूमती है।

विक्रम कहता है कि अपने ऑफिस में चल रही उठापटक से परेशान है और इसी वजह से उसका हाथ अमृता पर उठ गया है। शायद विक्रम अपने बॉस पर या ऑफिस के अन्य लोगों पर हाथ नहीं उठा सकता है इसलिए अमृता पर अपनी ताकत दिखा देता है। अपने किए पर वह शर्मिंदा नहीं है।

अमृता इसलिए भी परेशान है कि इस मामले में उसकी सास भी कुछ नहीं कहती। उल्टा वह सलाह देती है कि छोटी बात है भूल जाओ। सहन कर लो। अमृता अपनी मां को भी दोषी मानती है कि उसे ही सहने की शिक्षा उन्होंने दी है। अप्रत्यक्ष रूप से लड़के को लड़की की तुलना में बेहतर माना जाता है और यह मेल ईगो पति-पत्नी के रिश्ते में भी विवाद का कारण मानता है।

अमृता और विक्रम पढ़े-लिखे हैं। अमृता बाय चॉइस हाउसवाइफ है। उसने अपनी लाइफ को विक्रम की लाइफ में इनवेस्ट किया है। अपनी पसंद को भूला कर विक्रम की पसंद को ही अपनी पसंद माना, लेकिन इस थप्पड़ की वजह से वह वो देख लेती है जो अब तक उसे नहीं दिखाई दे रहा था।

भारत में 80 प्रतिशत पति, पत्नियों को पीटते हैं। निम्न वर्ग में यह बात ज्यादा पाई जाती है, लेकिन उच्च वर्ग भी अछूता नहीं है। स्त्री की तुलना में पुरुष का अपने को सर्वश्रेष्ठ मानने की भावना न चाहते हुए भी पुरुषों में आ जाती है क्योंकि भारतीय समाज का माहौल ही ऐसा है।

अनुभव सिन्हा द्वारा निर्देशित और लिखित फिल्म 'थप्पड़' कई सवाल पुरजोर तरीके से उठाती है। फिल्म कहती है कि ज्यादातर शादी महज समझौता या डील हो गई हैं। चूंकि महिलाएं आर्थिक रूप से सक्षम नहीं है इसलिए वे शादी तोड़ नहीं सकती। दूसरी ओर ऐसे लोगों की संख्या भी बढ़ती जा रही है जो मानते हैं कि प्यार के लिए शादी जरूरी नहीं है। थप्पड़ में तीन-चार कपल हैं जो निम्न, मध्यम और उच्च वर्ग से हैं और सभी में महिलाओं की स्थिति कमोबेश वही है।

फिल्म की कहानी से जरूर कुछ दर्शक असहमत हो सकते हैं कि एक थप्पड़ के बदले में कोई तलाक लेता है क्या? विक्रम 'सॉरी' कह कर बात खत्म कर सकता था। लेकिन अमृता के पाइंट ऑफ व्यू से यह बात सोची जाए तो सही प्रतीत होती है। विक्रम का मेल ईगो 'सॉरी' कहने के आड़े आ गया था और वह यह सोच कर ही आगे बढ़ रहा था कि अमृता का वजूद उससे अलग है ही नहीं।

निर्देशक अनुभव सिन्हा ने बहुत ही उम्दा तरीके से बातों को रखा है। दर्शकों को सोचने पर मजबूर भी किया है। कई अनकही बातें भी कही हैं। फिल्म में, खासतौर पर सेकंड हाफ में, कहानी और मुद्दे का साथ छूटता भी है और लगता है कि फिल्म को खींचा जा रहा है, लेकिन मुद्दा शक्तिशाली होने के कारण दर्शकों का ध्यान फिल्म से भटकता नहीं है। फिल्म के आखिर में दो-तीन इमोशनल सीन फिल्म को पॉवरफुल बनाते हैं।

अनुभव सिन्हा की फिल्मोग्राफी देखी जाए तो करियर की शुरुआत में उन्होंने दस (2005), कैश (2007), रा.वन (2011) जैसी कमर्शियल फिल्में बनाईं, लेकिन पिछले तीन वर्षों में उनकी फिल्मों के विषय और मेकिंग में जबरदस्त बदलाव आया है। मुल्क (2018), आर्टिकल 15 2019) के बाद थप्पड़ (2020) जैसी बेहतरीन फिल्म उन्होंने दी है।

तापसी पन्नू लगातार अच्छा काम कर रही है। थप्पड़ में उनके लिए संवाद कम हैं और उन्हें अपने चेहरे, हाव-भाव और आंखों से अपने अंदर घुमड़ रहे दर्द को बयां करना था और उन्होंने यह मुश्किल काम शानदार तरीके से किया है। तापसी के अभिनय का ही यह कमाल है कि उनके कैरेक्टर का दर्द दर्शक फील करते हैं।

पवैल गुलाटी ने अपना पार्ट ठीक से निभाया है। कुमुद मिश्रा एक बार फिर साबित करते हैं कि वे कितने बेहतरीन एक्टर हैं। उन्होंने गजब की स्वीटनेस अपने कैरेक्टर को दी है। रत्ना पाठक शाह, गीतिका वैद्य, दीया मिर्जा सहित तमाम कलाकारों की एक्टिंग ऊंचे स्तर की है।

कुल मिलाकर 'थप्पड़' सॉलिड है और देखी जानी चाहिए।

निर्माता : भूषण कुमार, अनुभव सिन्हा
निर्देशक : अनुभव सिन्हा
कलाकार : तापसी पन्नू, पवैल गुलाटी, कुमुद मिश्रा, रत्ना पाठक शाह, दीया मिर्जा
सेंसर सर्टिफिकेट : यू * 2 घंटे 21 मिनट 41 सेकंड
रेटिंग : 3.5/5




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